आखिर हुलाकी मार्ग की नियति कब बदलेगी ? मालिनी मिश्र

मालिनी मिश्र, काठमांडू ,१ जून |
विकास की सुई क्यों अटक गयी रु नेपाल में एक कहावत है, ‘हाथी आयो हाथी आयो फुस्स ।’ एकदम चरितार्थ है खास तौर से हमारे राजनीतिक नेताओं के लिए । अभी अभी बजट आया है अब देखना है कि यह कितना असर दिखाता है । क्या हमारी जनता संतुष्ट है रु शायद नही, न होना लाजमी भी है । जब तक पुराने चोट का इलाज न हो जाए हमे नये यंत्रो के लाने का वादा एक छलावा ही लगता है ।
किसी भी देश के विकास के लिए कुछ आधारभूत तत्वों का होना बहुत आवश्यक है । जैसे कि वहां के समुदाय की मानसिक स्तर, आर्थिक स्थिति, सामाजिक अवस्था, भौगोलिक स्थिति आदि, इन्ही भौगोलिक स्थिति में सडकों का क्रम भी आता है । नेपाल के सन्दर्भ में यदि देखा जाय तो यह बताना कि यहाँ कुछ विशेष राज मार्गों का निर्माण क्यों नहीं हो पा रहा है, कठिन है । राजमार्गों में हुलाकी राज मार्ग हमारी चिन्ता का विषय है । इस अवस्थिति का कारण क्या हैरु तराई मधेश, भारत का सहयोग न होना, या नेपाल सरकार की मनः स्थिति ।

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नेपाल के साथ भारत का सम्बन्ध इतना गहरा है कि छोटी बड़ी सभी समस्याओं में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से वह जुड़ा है । हुलाकी राजमार्ग के सम्बन्ध में भी इसकी एक कहानी ही है, भारतीय प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने नेपाल भ्रमण९२०४७० के क्रम में राज मार्ग के लिए सहयोग के लिए प्रतिबद्धता दिखाई थी । तब से अब तक एक दो सममmौते भी हुए ,जैसे कि भारत सरकार ने सैद्धान्तिक रूप से सहयोग की सहमति संवत् २०६१ साल में की थी । भारत सरकार व नेपाल सरकार में एक अन्य समझौता यह भी हुआ कि भारत कुछ निश्चित सीमा तक सड़क का निर्माण करेगा परंतु एक छोटी सी जिम्मेदारी नेपाल के हिस्से में भी आयी वो थी बीच में आने वाले पेड़ पौधे व बिजली के पोल का व्यवस्थापन । समय बीता फिर बातों में परिवर्तन आया , पता चला कि नियमानुसार ठेके का काम भारत ने लिया परंतु आपसी सहयोग ९ नेपाल भारत०, वही पोल, सामग्री का न मिलना आदि को काम की असफलता का कारण बताया गया । ठेके में परिवर्तन हुआ, नये समझौते हुए परंतु काम में परिवर्तन नहीं आया है । इतनी बड़ी परियोजना कार्य असफल क्यों हो रहा है ये अनिश्चित है, समंवय का न होना कोई विशेष कारण नहीं माना जा सकता है हम इसे आंशिक कारण कह सकते हैं, चूकि समन्वय तो एक परिवार में, कार्यालय में या संस्था में न होने से भी अपना असर दिखाता है । ।
दूसरी तरफ हम यह आशंका व्यक्त कर सकते हैं कि क्या यह मधेस की अवहेलना है रु वह तराई जो अनाज व अन्य खाद्य सामग्री का स्त्रोत है, नेपाल में कृषि का आधार है । पूर्व पश्चिम में अवस्थित सभी औद्योगिक क्षेत्र जो अच्छी सड़क के अभाव में शायद और विकास नहीं कर पा रहें है । आने जाने का मार्ग ही यदि सरल व सुगम न हो तो व्यापार की उन्नति किस प्रकार हो रु यदि यह हुलाकी राजमार्ग की योजना शीघ्र ही सुचारु रूप से प्रारम्भ हो जाय तो न केवल तराई मधेस वरन् सम्पूर्ण नेपाल का विकास सम्भव है । हम उचित व्यापार से जुड़ सकते हैं । यातायात की सुविधा बढ़ने से जन सामान्य की आधी से ज्यादा समस्या समाप्त हो जायेगी । विकास के नये साधनों को आमंत्रण मिलेगा । इसके साथ ही मधेस, देश की आधी जनसंख्या का निवास स्थान के साथ साथ सम्पूर्ण नेपाल को नये अवसर मिलेंगे । यदि कागज में लिखे गये सभी योजनाओं को संचालित कर दिया जाय तो हम भी शायद विकास की सीमा के करीब आ सकते हैं । हमारा देश भी उन्नत व समुन्नत होगा । यह सड़क योजना कहीं न कहीं से नेपाल के विकास को पूर्ण रूप से प्रभावित कर रही है और क्या कहा जाय यहाँ दिन प्रति दिन के व्यापार पर असर पड़ रहा है ।
इस तरह की योजना का क्रियान्वयन किसी व्यक्तिगत संस्था या व्यक्ति का काम नही है । हमारी सरकार यदि स्वयं इस सन्दर्भ में आगे नही आयेगी तो सिर्पm अनुदान के आने से, राज कोष में सजाने से काम नहीं चलेगा । मधेस पहाड़ अलग नहीं वरन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा है । देश को अनुदान से ज्यादा सही सोच की आवश्यकता है ।

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