आगामी संविधानसभा निर्वाचन और मधेश

दिलीप शाह:प्रमुख चार दल एकीकृत नेकपा माओवादी, नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले और मधेशी मोर्चा के बीच प्याकेज में हर्ुइ राजनीतिक सहमति के आधार पर प्रधानन्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी सरकार को पर्ूण्ाता दी गई और चुनावी चहल-पहल बढÞ गई। यद्यपि कुछ छोटे दल इस का विरोध कर रहे हैं। लेकिन चुनाव का विकल्प नहीं है। आगामी निर्वाचन में मधेश निर्ण्ाायक भूमिका में रहेगा, ऐसा प्रायः निश्चित है। लेकिन विगत में संविधानसभा में मधेशी जनता ने जिस उद्देश्य से नेताओं को भेजा था, क्या वे नेता अपना दायित्व ठीक से निर्वाह कर सके – इस विषय की समीक्षा अब मधेशी जनता जरूर करेगी।

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आगामी संविधानसभा निर्वाचन और मधेश

विगत केे चुनाव की समीक्षा
विगत संविधानसभा चुनाव में मधेश केन्द्रित दलों में मधेशी फोरम मधेश शक्ति के रुप में आगे आया। तत्कालीन नेकपा माओवादी के नेतृत्व में चल रहे जनयुद्ध के क्रम में मधेशी जनता, जो सदियों से सामन्ती राजतन्त्र के उत्पीडÞन में जिने के लिए बाध्य थी, उसके विरोध में बुलन्द आवाज उठाते हुए मधेशी जनता को माओवादी नेतृत्व प्रशिक्षित कर रहा था। उत्पीडित मधेशी जनताको मुक्ति दिलाने का भरोसा एक मात्र केन्द्र तत्कालीन केन्द्र माओवादी बना था। लेकिन अन्तरिम संविधान में नेपाली कांग्रेस, एमाले के विरोध करने पर मुख्यतः संघीयता रखना मुश्किल होने से मधेश आन्दोलन बाद में व्रि्रोह में परिणत हो गया। मधेश व्रि्रोह किसी के कमाण्ड में नहीं रहा। तत्कालीन प्रधानमन्त्री गिरिजाप्रसाद कोइराला द्वारा सम्बोधन किए जाने पर आन्दोलन शान्त हुआ। उसके बाद मधेशी एकता के नाम में खूंखार पञ्चायती कांग्रेस और एमाले के मधेशी नेता को आगे लाकर निर्वाचन में खडÞा किया गया। यहीं से मधेश व्रि्रोह में अभिव्यक्त भावना पर प्रहार शुरु हुआ।
संविधान सभा में मधेशी हक हित में संविधान निर्माण के लिए पहुँचे मधेशी दल नेतृत्व और मन्त्री पद को हथियाने के लिए विभिन्न टुकडÞों में बँट गए। वे इतने बँटे कि जनता का उन पर कोई विश्वास न रहा। मधेशी जनता ने जिस महत्त्व के साथ नेताओं को संविधानसभा में भेजा था, उस बात को भूलते हुए उन लोगों ने व्यक्तिगत पद प्रतिष्ठा, आर्थिक लेनदेन, और भ्रष्टाचार को प्राथमिकता दिया। यहां तक कि कुछ सभासद तो मधेशी जनता को ही कलंकित करते हुए ‘रेड पासपोर्ट’ काण्ड में संलग्न देखने को मिला। इसके बारे में यहाँ कुछ सवाल खडÞा होता है। वह यह है कि अधिकांश मधेशी नेता संविधान बनाने के लिए, सत्ता और सम्पत्ति के लिए हीं संविधानसभा में पहुँचे थे। सभासद किसी भी पार्टर्ीीे क्यों न हों, जनता की आवाज को भूल कर उन लागों ने जो कुछ भी किया, उसे माफ नहीं किया जा सकता। दूसरी बात क्या सभी मधेशी नेता मधेशी जनता के पक्ष में नहीं है – यह तो कदापी नहीं हो सकता। मधेश व्रि्रोह से मधेशी को जो पहचान मिली, वह अभी निर्ण्ाायक जगह पर है। जिस को नकारा नहीं सकता। बात इतनी सी है कि विगत संविधानसभा में मधेशी ने जिन को चुन कर भेजा था, वे आदमी गलत थे। मधेश एकता के नाम पर जिस कसी को भी चुनाव में जितना मधेशी जनता की बहुत बडÞी भूल थी। इसके कारण विगत में मधेशी जनता ने धोखा खाया है, मधेशी जनताका ऐसा कटु अनुभव है। ऐसी ही अवस्था में चुनाव होने जा रहा है। इस समय कोई संघीयता विरोधी है तो कोई संघीयता के पक्षधर। ऐसी अवस्था में हम लोगों को र्सतर्क तो रहना ही होगा। विशेष कर मधेश पर केन्द्रित दल और नेता को इस मामले में विशेष र्सतर्कता अपनानी होगी।
संविधान क्यों नहीं बना –
नेपाल के इतिहास में ही पहली बार हुए संविधानसभा के माध्यम से मुलुक में रहे विभेदकारी नीति को हटाया जाएगा, ऐसी उम्मीद की गई थी। लेकिन वह नहीं हो पाया। विशेषतः नेपाली कांग्रेस, एमाले जैसे दल और उनके नेताओं के कारण बिना उपलब्धि हीं संविधानसभा ने मृत्यु वरण कर लिया। उस समय संविधान निर्माण के लिए संविधानसभा में विशेषतः दो प्रक्रिया को प्राथमिकता देनी चाहिए थी। एक- संविधान के सभी बूँदों को सहमति के आधार पर निर्ण्र्ााकिया जाए, दूसरा- अगर सहमति नहीं होती तो विवादित विषय और बूँदों को मतदान में लेजाकर निर्ण्र्ााकिया जाए। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अर्थविहीन ‘सहमति’ अडान में सभी दल और नेता उलझे रहे। इसके फलस्वरुप संविधानसभा में संघीयता के पक्षधर दो तिहाई की संख्या में होते हुए भी संविधान निर्माण नहीं हो पाया। और, संविधानसभा ही विघटन हो गया।
इस दुःखद घटना के कारण किसी को क्षति पहुँची है तो वह है- मधेशी समुदाय। उस समय संविधानसभा में मधेशी समुदाय का प्रतिनिधित्व निर्ण्ाायक रुप में रहा था। पहिचान सहित की संघीयता चाहने वाली शक्ति एकीकृत नेकपा माओवादी ही है। इसके अलावा अन्य पार्टर्ीीे भीतर रहे कुछ मधेशी, जनजाति नेता भी पहिचान सहित की संघीयता के पक्ष में थे। अगर उस समय विवादित विषय को  मतदान की प्रक्रिया मंे ले जाया गया होता तो संघीयता के पक्ष में अवश्य ही बहुमत हासिल होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिसके कारण भी संविधान जारी नहीं हो पाया। संविधानसभा के अन्दर गठित राज्यपर्ुनर्संरचना आयोग और राज्यशक्ति विभाजन समिति ने तो संघीयता को बहुमत से पारित किया था। लेकिन कांग्रेस-एमाले ने इसको स्वीकार नहीं किया। समग्र में संविधान में संघीयता और पहिचान के पक्षधर और पहिचान को न स्वीकार करनेवाले बीच हुए संर्घष्ा के कारण ही संविधान निर्माण नहीं हो पाया। इसीलिए आगामी निर्वाचन में भी इस विषय को कैसे सम्बोधन किया जाए – इस पर भी अभी से र्सतर्क रहना होगा। और संघीयता विरोधी को कैसे पराजित किया जाए, संघीयता पक्षधर को इस पर विशेष जोडÞ देना होगा।
आगामी संविधानसभा का निर्वाचन
संविधानसभा का दूसरा निर्वाचन अगामी आषाढ महीने के पहले हफ्ते में और किसी कारणवश यह सम्भव नहीं हुआ तो मार्गशर्ीष्ा महीने में चुनाव सम्पन्न करने की सहमति प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच हर्ुइ है। सहमति अनुसार मधेश में नागरिकता की समस्या जन्म के आधार में नागरिकता पानेवाले की सन्तान को वंशज के आधार में नागरिकता मिलनी चाहिए, ऐसी सहमति हर्ुइ है। ऐसा होते हुए भी वास्तव में उत्पीडित मधेशी जनता अभी भी इस लाभ से वञ्चित है। और साथ ही विभिन्न जगहों में पैसा देकर गलत तरिके से नागरिकता लेनेवाले भी मिले हैं। यह मधेशी जनता के हित में विल्कुल नहीं है। संविधानसभा का चुनाव होने से पहले ही नागरिकता समस्या को वैज्ञानिक ढंग से समाधान करना चाहिए, उसी में मधेशी जनता का हित है। दूसरी समझदारी तीन दल और मधेशी मोर्चा के बीच में समानुपातिक सिट संख्या घटाने के बारे में हर्ुइ है। लेकिन यह मधेशी जनजाति के हक में अच्छा नहीं होगा। जनयुद्ध, जनआन्दोलन, मधेश आन्दोलन और विभिन्न जानजातियों के आन्दोलन के परिणाम स्वरूप समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली अख्तियार की गई है। उत्पीडिÞत वर्ग, जाति, क्षेत्र, लिंग, को समान प्रतिनिधित्व कराने के लिए समानुपातिक सिट संख्या को घटाना उचित नहीं होगा। इस मसले का यथाशीघ्र समाधान कर निर्वाचन के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना चाहिए।
आगामी निर्वाचन में संविधानसभा के पहले निर्वाचन से प्राप्त शिक्षा को लेकर आगे बढÞना अच्छा रहेगा। पहले निर्वाचन में मधेशी एकता के लिए जोडÞ दिया गया था, जो एक हद तक जायज भी था। लेकिन मधेशी अधिकार के नाम में जो एक शब्द नहीं बोल सकता है, वैसे आदमी को सिर्फमधेशी होने के कारण जिताया गया। मधेशी जनता के हित पर विगत से ही शासन करते आ रहे कतिपय भ्रष्ट नेताओं को जिताकर ऊपर भेजा गया। और उन लोगों से बहुत अपेक्षा की गई। जो हम लोगों की बहुत बडÞी भूल थी। वे अपने स्वार्थ में जुटे रहे। मधेशी एकता सही बात है। एकजूट होने पर ही अधिकार मिल सकता है। लेकिन अधिकार लेते वक्त यदि कोई धोखा देता है तो उससे सचेत रहना भी जरुरी है। जिससे विचार मिलता है, उससे एकता होगी, और जिससे विचार नहीं मिलता, उससे एकता करने का कोई अर्थ नहीं। आत्मनिर्ण्र्ााका अधिकार और स्वशासन की ग्यारन्टी देनेवाली शक्तियों के बीच में एकता होनी चाहिए। अर्थात् पहिचान सहित की संघीयता, धर्म निरपेक्षता, आत्मनिर्ण्र्ााके अधिकार, स्वशासन के पक्ष में लडÞते हुए जो आगे आई हैं, उन शक्तियों को अगामी संविधानसभा में आगे लाना होगा। त्र

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