आगे बढ़ता मधेस आन्दोलन ?

kap andolanविनय कुमार, काठमाडौं ।
मधेस आन्दोलन को चारदलों के चार नेताओं ने ‘ननसेन्स’ के रुप में ले रहा है ।
६ प्रदेशीय सिमांकन का देशभर में विरोध आन्दोलन होने के बाद नेताओं ने परिमार्जन होने की बात बताई है । लेकिन अब सिमांकन पर प्रमुख दल के नेताओं ने मुह मोर लिया है । कहता है की, हो चुकी सिमांकन पर कुछ भी भेरबदल नहीं कीया जा सकता । नेताओं ने मधेस और थारु आन्दोलन को गम्भिर रुप में नहीं ले रहा है सत्तापक्ष के एक नेता ने ऐसा खुलासा भी किया है । तकरीवन १० दिनों से यह सिमांकन के विरोध में बन्द÷हड़ताल लगातार होता आ रहा है ।
सद्भावना पार्टी संविधानसभा छोड़ने के बाद आन्दोलन का माहौल मधेस में और भी भयाबह बन रहा है । यह आन्दोलन आरपार की आन्दोलन बनने की दिसा में परिवर्तीत होने का संकेत दे रहा है । कल्ह मंगलवार सप्तरी के भारदह में राजीव राउत का निधन होने के बाद व्यापक प्रदर्शन का रुप ले लिया । इस का प्रभाव सिर्फ सप्तरी से पर्सा तक ही नहीं बल्की सुनसरी और मोरङ में भी काफी जोर पकड़ लिया है ।
मधेस में हो रहे भिषण आन्दोलन क्या सफल हो सकता है ? हिमालिनी के सवाल का जवाफ देते हुए नेपाल सद्भावना पार्टी के केन्द्रीय नेता डिजे मैथिल नें सत्ता में रहे मधेस के कुछ नेता वार्गेनिङ की ‘मुढ’ में होने का आरोप लगाया है । मेरा चिन्ता है की मधेस आन्दोलन कहीं बिच में ही खत्म न होजाए । नेता डिजे मैथिल का बात अगर सच हो जाता है तो मधेसी जनताओं के साथ बहुत बड़ी अन्याय होगा । मधेस के साथ फिर से धोखा होगा । वैसे भी मधेसवादी दलों ने पहला मधेस आन्दोलन में सहादत को प्राप्त किए सहिद का माग पुरा नहीं किया है । मधेसबादी नेतागण पर जनता का विश्वास ना होने का यह भी एक आधार माना जा सकता है । लेकिन मधेस में हो रही आन्दोलन का नेतृत्व में नयीं फेस के रुप में कोइ आगे नहीं आ पाया है । इसलिए यह आन्दोलन का फाइदा पुराने मधेसवादी नेता को ही होगा ऐसा विशलेसनकार का मानना है ।
हर आन्दोलन को व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए सम्झौता होता रहा तो मधेस अपनी अधिकार से बञ्चित रह जाएगा । इस आन्दोलन से अधिकार स्थापित होगा या नहीं यह कहना मुश्किल है । नेता मैथिल का जिकिर था की मधेस को अपना पूरा अधिकार प्राप्त करने में १०÷२० वर्ष भी लग सकता है ।

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