Aliexpress INT

आज का दिन मधेश राजनीति का काला दिन के रुप मे माना जायेगा : रणधीर चौधरी

रणधीर चौधरी, महोत्तरी, १८ जून | स्थानिय चुनाव का पहला चरण सम्पन्न और दुुसरा चरण का आगाज ने आज के दिन मे मधेश राजनिती का काले दिन के रुप मे चित्रित होना तय है । इस बात को पढते हुये किसी को ये न लगे कि मधेश लोकतन्त्र मे चुनाव का बिरोधी है । मधेश आज के दिन मे भी देश को लोकतान्त्रिक लिक पे कायम रखने के लिये इस चुनाव के बिरोध मे उतरे है ।
त्क यह है की ये चुनाव गैरसंबैधानिक तो था ही । आ जिस तरह लहुलौहान के बिच मधेश मे चुनाव का आगाज हुवा है उससे साफ पता चलता है कि यह चुनाव अवैधानिक भी है । सबाल उठता है आखिर एसा हुवा क्यूँ ? हरेक मधेशी आज इस सबाल का जवाव ढुंढते नजर आ रहे है । परंतु क्या इस प्रश्न का जवाव उतना मुस्किल है ? बिल्कुल नही । मधेश पे चुनाव के बहाने लादा जा रहा नश्लीय संबिधान का कारण है मधेशीयो मे एकता का कमी । जी हाँ । जातिगत से बँटे मधेशी राजनितिक हिसाब से इतना ज्यादा बँट चुके है की काठमाण्डौ को मधेश मे हरेक प्रकार का प्रयोग करने मे आसान होता नजर आ रहा है ।
काँग्रेश,एमाले, माओवादी मे लगे मधेशीयो की अपनी मजबुरी है । वेलोग वेतन पे आधारित रह कर राजनिती करने को ठान चुके है । तभी तो मधेशीयो के लास के ढेर पे लाया गया संबिधान को सर आँखो पे रख कर मन्त्रालय तलासने में लगे हैं । परंतुु उस वक्त भी एकबड़ी उम्मीद थी मधेशीयो को की सायद नेपाल मे उनको संबैधानिक अधिकार मिल सकता था । और उस उम्मीद का दिया था संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा । उस वक्त वह एसा मोर्चा था जिस के बैनर तले हरेक मधेशी जन नेपाल के स्थाइ सत्ता को चुनौती देता आया था । परंतु वर्तमान समय मे हालात ने कुछ एसा रुख बदला कि संबिधान मे पुर्नलेखन की आवश्यकता का वकालत करने बाले संघिय समाजवादी फोरम नेपाल के उपेन्द्र यादव का “राष्ट्रियकरण” हो गया । और ये तब हुवा जब ६ मधेशवादी दलो का एकिकरण हुवा । मानो वो बौखला सा गये। राजनितिक रुप से असुरक्षीत महसुस करने लगे । हाला की असुरक्षीत होने का कोइ वजह नही था । क्यूँ की कोई दल वा नेता खास कर के चुनाव से असुरक्षीत महसुस करते हैं। और मधेशवादीयो को तो संबिधान मे बगैर संसोधन के चुनाव मे जाना ही नही था । खासकर राष्ट्रिय जनता पार्टी नेपाल को तो जाना ही नही था । और राजपा ने यह प्रमाणित कर दिखाया है । मसक्कते हलाकि बहुत उठाने पडे हे राजपा को ।
आज जिस तरह मधेश अप्हेलित महसुुस कर रहा है उसका प्रमूख कारण अगर कुछ है तो वो है संघिय समाजवादी फोरम नेपाल का राष्ट्रियकरण होना । राजपा नेपाल ने तो अपना उर्जा और निष्ठा दोनो दिखा दिया है आन्दोलन करके । मधेश को कुछ भी आजतक प्रप्त हुआ है तो उसका माध्यम है सडक का संघर्ष । चाहे कोई अपनी मिटी के पुकार पे गैर संबैधानिक चनाव को स्विकारे या स्थाई सत्ता के चंगुल मे फस कर राजनिती के लयताल से भटक जाये ।
ससफो नेपाल के कुछ प्रवक्ता है जो दलिल देने मे लगे है कि २०३६ के चुनाव मे विपी के साथ रहे एक क्रान्तिकारी खेमा चुनाव बहिष्कार किया तो उसकी राजनिती खत्म हो गई। २०७० के चुनाव मे माओवादी से जुटे मोहन वैद्य किरण चुनाव मे न जाने के कारण वो भटक गये । बात सही है । परंतु क्या उन लोगो की राजनिती और मधेश के राजनिती मे कोई तात्विक भिन्नता नही है ? २०३६ मे बहुदल और नाम मात्र का ही सही प्रजातन्त्र लाना था । माओवादी का एजान्डा गणतन्त्र और धर्म निर्पेक्षता भी माओवादीयो ने हासिल कर लिया । परंतु मधेशीयो को न संघियता सुरक्षीत देखाई दे रही है , न तो समावेशी समानुपातिक का मुद्दा ही । सबसे अहम तो जनसंख्या के आधार पे निर्वाचन क्षेत्र स्थानिय तह निर्धाराण । राजनितिक विष्लेशक सिके लाल के भाषा मे ‘यह जो स्थानिय तह का निर्वाचन है ये महज सौचालय साफ करने के लिये प्रतिनिधी निर्वाचन करने की तैयारी है ‘ ।
आाज मधेश हाराहार सा महसुस कर रहा है परंतु जजबा मे कमी नही है । थकित भी नही है । लडाइ लम्बा है । मधेश के अधिकार राजनिती का जिम्मेवारी अभी राजपा के कांधे पे आ टिका है । जनता का सहयोग भी है । अगर राजपा भी पिछे हटगया, फरक तबभी नही परने जा रहा है क्यूँ की मधेश मे तराई मधेश राष्ट्रिय परिषद, मधेश अधिकार संघर्ष समिती, यूइनाइटेड मधेशी अफ नेपाल जैसै तमाम संस्था मधेश के असंबोधित मुद्दो को संबोधन कराने के लिये संघर्ष के मैदान मे कुद परे है ।

 

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz