आत्महत्या ! रैप गायक किस मानसिक त्रासदी से गुजर रहा था कभी सोचा है ? बिम्मीशर्मा

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बिम्मीशर्मा , वीरगंज,7 माघ |कोई जिदंगी से लाचार हो कर आत्महत्या करता है तो उसे संवेदना या सहानुभूति देने के बजाय सब उस मर चूके ईंसान की खिल्ली उडाते हैं । उसे कायर कह कर निंदा करते हैं पर कोई ईसकी वजह जानना नहीं चाहता कि उसने आखिर आत्महत्या क्यों की ? उसके दिमाग में क्या चल रहा था या वह कितने तनाव में था । सब उसकी लाचारी पर तरस खाते हैं पर साथ और हौसला कोई नहीं देता ।
अपनी जदंगी अपने हातों खत्म कर लेना कोई छोटी बात नहीं है । जिदंगी जैसी भी हो जब तक जिंदा हैं या सांस चल रही तभी तक है । पर कोई क्यों अपनी जान लेने को तयार हो जाता है । ईस के पिछे मनो चिकित्सक अलग, अलग बताते हैं । पर सबसे बडा कारण है अकेलापन । सब जिंदा होते हुए भी और सांस के चलते रहने के बाबजुद जब रिश्तों में कोई गर्माहट या संवेदना नहीं रहती । जब अपने बेगान हो जाते हैं और मूंहमोड लेते हैं तब कोई भी ईंसान हताश हो जाता है ।
और ईसी हताश मनोदशा में ईसान को अपने जीवन का कोई उद्धेश्य नजर नहीं आता । उसे चारो तरफ अधंकार, असफलता और निराशा ही नजर आती है । तब वह एक भयानक निर्णल लेता है और उसे अमल में लाता है जिसे समाज आत्महत्या कहता है । क्या परिवार और समाज दोषी नहीं है ? किसीको आत्महत्या के लिए वाध्य बनाना क्या अपराध नहीं है ? जब तक वह आत्महत्या करने के लिए वाध्य ईंसान जिंदा था तब क्यो उसकी परेशानी या दुखको किसी ने नहीं सुना या महसुस किया । क्यों अपने ही सु में मशगु रहे उसको अपना नहीं माना । तब तो ध्यान नहीं दिया बाद में अफशोच जताने से क्या फायदा ? मरने के बाद की मातमपुर्सी तो सभी कर लेते हैं पर जिंदा रहते कोई सहेजता नहीं । सभी को लगता है आत्महत्या करने वाले पागल या कायर होते हैं ।
पर आत्महत्या करने वाले भावुक और संवेदनशील होते हैं । यह जिंदगी के थपेडों से घबरा कर कहीं दूर चले जाना चाहते हैं जहां कोई शिकवा, शिकायत न हो । न खुदको किसी से उम्मिद न किसीका खुद से उम्मिद । जहां सारी भावनाएं खत्म हो जाती है और रह जाता है सिर्फ शून्य । और उसी शून्यता को पाने के लिए लोग  आत्महत्या जैसा बडा कदम उठा कर अपने ही जीवन से घात कर लेते हैं । वह पाना बहुत कुछ चाहते थे । अपनों का प्यार, दुलार, बिश्वास, सम्मान और सफलता पर असफलता की सिंढी से जब लुढ्कने लगते हैं तब उन्हे आत्महत्या ही सर्वोतम विकल्प लगता है ।
दुनिया में जिने के लिए बहुत से पेशा, व्यवसाय और काम है पर कोई औरत क्यों वेश्यावृति ही करती है ? जो जबरजस्ति या धोखे से ईस पेशे में जाती है उनकी बात अलग है उनसे सहानुभूति है । पर जो जल्दि पैसे कमाने के लोभ में खु दही यह पेशा अपना कर बैठी है उन्हे क्या कहेगें ? क्या उनके पास और कोई विकल्प नहीं था ? सिलाई करती, सब्जि बेचती या चौका बर्तन करती पर क्यों उन औरतों ने वेश्यावृति या कालगर्ल का पेशा ही चूना ? ठीक वैसी ही बात है आत्महत्या करनेवालों के साथ भी । जब उन्हे जिंदगी और जिंदा रहने का कोई विकल्प नहीं दिखता तब वह खुद को मारने जैसा घातक कदम उठाते हैं । जिससे उनी ईहलीलातो खत्म हो जाती है पर उनके जाने के बाद उनके बारे में लोग फालतु में रामलीला और रासलीला जैसा बात करनें लगते हैं ।
आत्महत्या को अपराध की श्रेणी में रखा जाता है । जब किसी दुसरे के साथ मारपिट की जाती है या किसीकी हत्या करते हैं तब अपराध होता है । पर जब परिवार और समाज मूंह मोड ले, बेगानों का जैसा व्यवहार करे तब कोई लाचार हो कर खुद को खत्म कर ले तो वह अपराध कैसे हुआ ? यह किसी और को तो नहीं मार रहा था । दुसरों को दुख दे कर रुलाने वाले, धोखा देने वाले बाहर मजे में घूम रहे है । और दुसरों के दिए दुख और धोखे से तगं आ कर खुद को स्वाहा कर ले तो अपराध हो गया ? जब जिंदा थे तो जिने नहीं दियाऔर अब मर गए तो उस ईंसान को अपराधीमान रहे हो ?
कोई भी ईंसान शौक या खुशी से आत्महत्या नहीं करता । जब जिंदा था तो उसने खाया की नहीं, वह रात भर सोया था की नहीं कोई पूछता नहीं । पर जब मर जाता है तो सब शोसल मीडिया में पर उपदेश कुशल बहु तेरे बन कर उसको कायर और डरपोक जैसे खिताबों से नवाजते हैं । खदु तो किसीको सुखी नहीं कर सकते पर जब किसी ने तमाम समस्याओं से हार मान कर अपने लिए कोई विकल्प चून लिया तो ईसमे ईतना हाय तौबा क्यों ? भले ही वह विकल्प घातक था पर उसको मानसिक अवसाद के उस चरम पल में वही ठीक लगा हो तो ? किसी के जिंदा रहते उसके आंख से बहने वाले आंसूओं को तो रोक या पोंछ नहीं सकते पर उसके आत्महत्या करने पर घडियाली आसूं बहा कर अपना मगरम्चछ का रुप क्यों दिखा रहे हो । सब के सब बर्षाती मेढक की तरह टर्राने क्यों लगते है ।
अभी कुछ दिन पहले एक नेपाली रैप गायक ने लंदन में लटक कर आत्महत्या कर ली । अब शोसल मीडिया में सभी ने उस गायक की बखिया उधेड कर रख दिया । किसी के मरने के बाद वह चाहे जैसे भी मरा हो उसे सहानुभूति या श्रद्धाजंली देना तो दूर की बात सब उसे भगोडा, कायर और डरपोक कह कर अपनी भढास निकालने लग गए । कम से कम किसी को संवेदना नहीं दे सकते तो उसको गाली तो मत दो । वह किस मजबुरी या पारिवारिक, सामाजिक़ व मानसिक त्रासदी से गुजर रहा था कभी सोचा है ? किसीको फुर्सद हो दुसरों के बारे में सोचने के लिए तभी न कुछ सोचेगा?
वहकिन कठीन परिस्थितियों से गुजर रहा था कि उससे निजातपाने के लिए अपनी जिंदगी खुद के हाथों गवाने जैसा कठोर निर्णय लिया । ठीक है आप सुखी हैं, मस्त है पर हर कोई आपकी तरह भाग्यशाली तो नहीं होता ? अपने अकेलेपन, असफलता और परिवार दोस्तों के नजर अंदाज करने के कारण ही बहुत से लोग आत्महत्या करते है । आत्महत्या करना या करने का प्रयास करने का मतलब ही यही है कि वह ईसान प्यार और अपनेपन का भूखा है । ईसी लिए किसी भी ईंसान को प्यार और अपनापन दीजिए घृणा या तिरस्कार नहीं । तब देखिएआत्महत्या करने वालों कि संख्या में कितनीकमीआती है । हम खुशीं और प्यार बाटंने में ईतनी कजुंसी क्यों करते हैं ? (  ब्यंग )

 

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