आन्तरिक उपनिवेशवाद के कुचक्र को निस्तेज करना होगा : नरसिंह चौधरी

नरसिंह चौधरी सांसद तथा सद्भावना पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष है

नरसिंह चौधरी सांसद तथा सद्भावना पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष है

नरसिंह चौधरी , काठमांडू , ९ फरवरी | यूं तो विश्व में दूसरे देश से आए लोगों के द्वारा राज्य व्यवस्था के माध्यम से मूल देश वासियों को ही नियंन्त्रित कर उसे ही उपनिवेश का जीवन बीताने के लिए परिस्थितियां निर्माण करना तथा मूल नागरिकों के द्वारा विद्रोह कर उपनिवेशकर्ताओं का बहिर्गमन कराकर अपने अधिकारों की प्राप्ति करना समय चक्र के द्वारा परिभाषित होती रहती हैं । परन्तु वर्तमान नेपाल के निर्माण के साथ ही अपने ही देश के कुछ खास वर्ग के कुछ लोगों के द्वारा अपने ही देश के नागरिकों को अपने ही देश में उपनिवेश का जीवन जीने की परिस्थितियों का निर्माण होती रही है, जिसके विरोध में वर्तमान संघर्ष की निरंतरता हैं ।
हालिया में संघर्ष के कुछ कार्य एवं अनेक प्रभावों की गहरी छाप हमारे दिल और दिमाग में हैं, जिन्हें संस्मरण कर इस देश की दशा और दिशा के बारे में चिंतन करना आज की आवश्यकता है ।
नेपाल के दक्षिणी भाग की चुरिया क्षेत्र से दक्षिण की समतल उर्वरा भूमि जनघनत्व से भी समृद्ध है । और यहाँ के नागरिकों का अपने सभीपस्थ देश भारत के नागरिकों से मिलते नाक–नक्शा, भाषा, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं वैवाहिक रिश्तों तथा समय–समय पर राज्य सत्ता संचालन के कारण नेपाल के खस लोगों ने अपने शासन को मजबूत करने तथा मधेश के मूल निवासियों को कमजोर करने की नीति का निर्माण किया ।
इसी के अनुसार इस समतल भूमि का नाम तराई–मधेश रखा और भूमि व्यवस्था एवं राज्य व्यवस्था का भी निर्माण किया । फलतः खसवादी इस व्यवस्था में हिमाल, पहाड़ से लोगों को तराई–मधेश में प्रवासन कराकर मधेश की उर्वरा भूमि को अपने कब्जे में करने की नीति के साथ मधेश के मूल वासियों को अपनी ही धरती पर दूसरे देश के नागरिकों की तरह व्यवहार आरंभ कर दिया, जिसे हम आन्तरिक उपनिवेशवाद भी कह सकते हैं ।
एकल जातीय खस शासक वर्ग के इस घिनौने कार्य में हम धीरे–धीरे पिसते जा रहे हैं । इसके विरोध में हमने शहादत भी दी हैं । फलतः राणा शासन का अंत, शाहवंशीय एकात्मक शासन का अंत, बहुदलीय व्यवस्था में खसवादी दलों के द्वारा संघीयताविहीन अवधारणा का अंत आदि हमने संघर्षों को तेज करने की दिशा में व्याप्त किया है । परन्तु अन्तरिम संविधान– २०६३ में प्राप्त उपलब्धियों के आधार पर संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण के प्रस्थान विन्दु को खस शासकों की कुटिल चाल के द्वारा निस्तेज कर दी गई और १६ सूत्री निर्देशों के आधार पर मधेशी, थारु, जनजाति, दलित के विरोध एवं बहिष्कार के बावजूद नेपाल के संविधान २०७३ का जबर्दस्ती अवतरण कर हमारे संघर्षों को विफल करने का प्रयास खस ब्राह्मणवादी कुछ लोगों का प्रयास जारी है ।
संघीय व्यवस्था में स्वशासन की नीति को विफल करने के लिए प्रांतों के गैर राजनीतिक सीमांकन द्वारा खस ब्राह्मणवादी सरकार आगे बढ़ रही है, जिसके सापेक्ष उत्पीड़ित एवं बहिष्कृत वर्ग एवं समुदाय में भी तरह–तरह के अधिकारों के स्थापनार्थ संघर्षों को आकार देने का विचार भी जड़ जमाता जा रहा है । स्वाभाविक रुप से क्रिया का प्रतिक्रिया तो होती ही है । शासक वर्गों के अपनी शासकीय आकांक्षाओं में आपसी विमती के बावजूद हम बहिष्कृत वर्ग के विरुद्ध समय–समय पर एकजुट कर अपने वर्ग एवं समुदाय का आफजाई और हमें कमजोर करने का प्रयास करते आ रहे हैं ।
अतः संघर्ष के इस पावन अवसर पर एकजुट होकर अपनी रणनीति को प्रदर्शित करना आज की आवश्यकता है । कथम्कदाचित बहिष्करण में पड़े दरिद्र मानसिकता के नेतृत्व पंक्ति के द्वारा इसे साकार होने नहीं दिया जा पा रहा है, तो बहिष्करण में पड़ी जनता को स्वयं जागृत होकर आन्तरिक उपनिवेशवाद के कुचक्र को निस्तेज करना होगा और हम इस दिशा में आगे बढ़ भी रहे हैं । विगत का आंदानेलन और प्रदर्शन इसका साक्षी है ।
(नरसिंह चौधरी सांसद तथा सद्भावना पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हैं ।)
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