आन्तरिक तनाब में मधेशी मोर्चा

बिरेन्द्र के एम

मधेश आन्दोलन के बाद जनता से अनुमोदित होकर जिस समय मधेशी दल संविधानसभा तक पहुँचे थे, उस समय संविधानसभा की पहली बैठक में ही पूरे नेपाल का स्वरुप देखने को मिला था। देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्रतिनिधित्व करते हुए संविधानसभा तक पहुँचे नेपाल के तत्कालीन २४ दल अभी ३१ दल में विभाजित हो चुके हैं। उस समय जिस तरह सोचा था, अभी वैसी पृष्ठभूमि नहीं है। अपने परिवेश अनुसार की भेषभूषा में दिखनेवाले तत्कालीन जनप्रतिनिधि गण अभी सिर्फअपने निहित स्वार्थ में सीमित हो चुके हैं।

madheshi neta

आन्तरिक तनाब में मधेशी मोर्चा

नेपाल में हुए जनआन्दोलन-२ के बाद निर्माण किए गए अन्तरिम संविधान में ही विभेद हो जाने के कारण मधेश आन्दोलन हुआ था। मधेश आन्दोलन का एक ही उद्देश्य था, देश के हरेक क्षेत्र में मधेशी को बराबर की उपस्थिति मिलना। मधेश आन्दोलन के बाद ही सदियों से पिछडा हुआ मधेशी समुदाय ने थोडÞी सी अपनी पहचान और थोड सा अधिकार भी प्राप्त किया। मधेश आन्दोलन के बाद मधेशी जनता ने अपनी सम्पर्ूण्ा जिम्मेवारी मुख्यतः मधेश के ही तीन शक्ति सद्भावना पार्टर्ीीतर्राई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीौर मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल को सौंपी थी। मधेश केन्द्रित इन दलों में जिसका जितना पहुँच था, उसी अनुसार मधेशी जनता ने अपना मत देकर इन तीन दलों के प्रतिनिधियों को अपना प्रतिनिधि बनाकर संविधानसभा में भेजा। वैसे तो मधेशी जनता ने सिर्फमधेश केन्द्रित पार्टर्ीीो ही मत दिया था, यह कहना अनुपयुक्त होगा । क्योंकि मधेश से प्रतिनिधित्व होनेवाली सीट संख्या का आकलन करें तो मधेशी दल के अलावा अन्य दलों ने भी उसमें अपना प्रभाव जमाया है। नेपाली कांग्रेस, एनेकपा माओवादी और एमाले का भी प्रतिनिधित्व मधेश से होना इसका उदाहरण है, जहाँ मधेशी प्रतिनिधि ही ज्यादा हैं। इस तरह मधेश ने अपनी उपस्थिति और शक्ति सम्पर्ूण्ा रुप में दिखा दिया है। साथ में यह भी दिखाया है कि आवश्यकता होने पर सब के साथ हिसाब-किताब किया सकता है।
अभी आकर मधेश केन्द्रित पाँच दलों का संयुक्त मोर्चा बना है। सद्भावना पार्टर्ीीौर मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल सहित दो दलों के पहल में बने इस मोर्चा में अभी पाँच दल सम्मिलित हो चुके हैं। लेकिन मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल इस समय उक्त मोर्चा में नहीं है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि मोर्चा के संस्थापक सदस्य ही इस समय मोर्चा में नहीं हंै। निर्वाचन के आगे ही मोर्चाबन्दी कर रहे इन दो दलो में से पिछली बार तमलोपा नामक पार्टर्ीीमावेश हर्ुइ थी। लेकिन निर्वाचन के समय इन दो दलों के बीच मोर्चाबन्दी नहीं हो सकी। इसलिए सभी दल अलग-अलग होकर निर्वाचन के लिए मैदान में उतरे और अपनी-अपनी क्षमता अनुसार चुनाव जीतकर आए।
कोई खास मिसन लेकर राजनीति में सक्रिय होने की बात बतानेवाले मधेशी दल अभी अपने मिसन पर निष्त्रिmय दिखाइ देते हैं। कहा जाय तो संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा इस समय सिर्फसत्तालिप्सा में ही सीमित हो चुका है। मजबूत और शक्तिशाली कहलानेवाले मन्त्रालय में पहुँच हो जाने से भी मोर्चा मधेशी जनता को कोई खास उपलब्धी नहीं दे रही है। मधेशी जनता के साथ विशेष मुद्दों के लिए तमसुक करके केन्द्र तक आया वही मोर्चा तथा मधेशी दल इस समय किसी भी तरह से सत्ता और रुपये पाने के लिए आन्तरिक विवाद में फंसा हुआ है। सत्ता और अर्थ के लिए ही ३ मधेशी दल ९ दल में विभक्त होना इसका ज्वलन्त उदाहरण है। वैसे तो सद्भावना आनन्दीदेवी सहित अन्य दल भी मधेशी दल के रुप में ही जाने जाते हैं। लेकिन वैसी शक्ति को मधेशी जनता ने खास स्थान और पहचान नहीं दिया है। मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल से अलग होकर बने फोरम लोकतान्त्रिक और फोरम गणतान्त्रिक, तमलोपा, तमलोपा से ही अलग होकर बने तमलोपा नेपाल और सद्भावना पार्टर्ीीस समय मोर्चा में आवद्ध हैं। सदभावना पार्टर्ीीे अलग होकर बने संघीय सद्भावना और राष्ट्रिय सद्भावना भी पीछली बार से ही मोर्चा में आवद्ध होने के लिए उत्सुक है। लेकिन अभी तक यह दो दल मोर्चा में सामिल नहीं हो पाए हैं।
टूट-फूट होकर भी मोर्चाबन्दी में रहे यह ५ मधेशी दलों के भीतर भी आन्तरिक विवाद चरम सीमा पर पहुँच गया है। मोर्चा में आवद्ध फोरम लोकतान्त्रिक संसदीय संख्या के हिसाब से सब से बडÞी पार्टर्ीीाना जाता है। लेकिन विवादों की दृष्टि से देखें तो सब से ज्यादा विवाद उसी पार्टर्ीीे भीतर है। शरदसिंह भण्डारी और विजयकुमार गच्छेदार के अलग-अलग समूह सक्रिय होने के कारण फोरम लोकतान्त्रिक फूट के करीब है। विशेषतः कानूनी प्रावधान के अनुसार एक बार अलग हो चुके पार्टर्ीीधिवेशन मार्फ अनुमोदन न होने तक पुनः विभाजन नहीं हो सकता है। इसलिए विभाजन के करीब पहुँचने के कारण भी फोरम लोकतान्त्रिक विभाजन होने से बच गया है। लेकिन विभाजन होने से जितना बचा जाए, पार्टर्ीीे अन्दर एकीकृत भावना विकसित नहीं हो पा रही है। इसी तरह उसी पार्टर्ीीें रहे संजय शाह का भी अपना अलग समूह सक्रिय है। गच्छेदार और भण्डारी के अलावा साह ने भी अपना अलग समूह का नेतृत्व करने की यथार्थता सञ्चार माध्यम में आने से इस बात की पुष्टि होती है। इधर तमलोपा और तमलोपा नेपाल की भी वैसी ही अवस्था है। इसी तरह सद्भावना में भी विवाद और तनाव नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता। संविधानसभा में ९ सभासद रहे सद्भावना विभिजित होकर अभी ३ संख्या में सीमित हो चुकी है। इस तरह ९ से ३ तक होने के पीछे किसी न किसी रुप में सत्ता और भत्ता की लिप्सा ही है।
अपने-अपने ताल में सीमित रहे ये मधेशी दल सम्मिलित संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा इस समय तनाव की अवस्था से गुजर रहा है। मोर्चा के अपने ही भीतर रहे तनाव के कारण मधेशी जनता खास कोई उपलब्धी प्राप्त नहीं कर पा रही है। लेकिन देखा जाय तो देश का मुख्यालय सिंहदरबार मधेशमय दिखता है। एनेकपा माओवादी के नेतृत्व में रहे वर्तमान सरकार में मधेशी मोर्चा दूसरी शक्ति के रुप में है लेकिन इस शक्ति का अहसास मधेशी जनता नहीं कर पा रही है। समग्र में कहा जाए तो मोर्चा मधेशी जनता की भावना तथा इच्छा अनुरुप आगे नहीं बढÞ रही है, यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा।
अतः सत्ता और भत्ता में सीमित मोर्चा में चेतना अवश्य आनी चाहिए। अगर अगामी दिनों में भी मोर्चा राजनीतिक शक्ति बनना चाहती है तो उसे मधेश की जनता की आन्तरिक वेदना को समझना ही होगा। अन्यथा मोर्चाबन्दी तथा मधेश केन्द्रित दल के नाम पर व्यापार करना अगामी दिनों में दुखदायी साबित होगा।
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