आन्तरिक मामिलामा हस्तक्षेप भयो रे ! आँख मूँद कर गोली चलवाई, तब नहीं सोचा था ?

गंगेश मिश्र, कपिलबस्तु , १० दिसम्बर |” मित्र को शत्रु बनाती, स्वाभिमान का ढोंग रचाती: अहंकार में अकड़ी-टोपी “-व्यङ्ग
तुड़ी हो, मुड़ी हो; कहीं भी पड़ी हो।अहंकार में अकड़ी टोपी, सुनती कहाँ किसी की। मित्र को शत्रु बनाती, उसके शत्रु से मित्रता करती। भिखारियों की तरह माँगती फिरती, स्वाभिमान का ढोंग रचाती। क्या-क्या नहीं करती ? ये ‘टोपी ‘ । सदियों से सत्ता का सुख भोगते हुए नेपाल के ” टोपीधारी ” शासकों ने कभी मधेशियों की सुधि लेने की जहमत नहीँ उठाई। मधेश से ही निर्वाचित होकर गए और मधेश को ही भूल गए। कांग्रेस और कम्युनिस्टों का राजनैतिक अखाड़ा रही, मधेश की ये उर्वर भूमि। हमेशा उपेक्षित रही, इक्के- दुक्के राज्यमन्त्री भूले- बिसरे कैबिनेट मन्त्री का पद देकर, अपनी पीठ थपथपाई नेपाल के शासकों ने। कब तक सहता, यूँ ही चुप रहता; जागा आज मधेश तो घबराहट होने लगी। समय आ गया है, अब किस्तों में सम्झौता मन्ज़ूर नहीं है।

goliभारतीय राजदूतावास से लेकर, भारत तक नंगे पाँव दौड़नेवाले; मौके के ताक में रहे हमेशा। जब भी मौका मिला, भारत के खिलाफ ज़हर उगल ही दिया। हृतिक रौशन से लेकर तथाकथित  “नाकाबंदी” तक। मधेशी मोर्चा के नेता भारत क्या गए, इनके सीने पर साँप लोटने लगा; पैर के नीचे से ज़मीन खिसकने लगी। जाने क्यूँ, इन्हें किस बात का भय है; इनकी कथनी और करनी देखाई दे रही है,’ सब कुछ दिख रहा है।’ इन लोगों ने जिस प्रकार, षडयन्त्रकारी संविधान बना कर मधेश के अधिकारों का हरण किया है।अब संविधान का मर्म समझाने, निकल पड़े हैं पाखंडी; इन्हें कौन समझाए कि मधेश में पड़े लिखे लोग भी रहते हैं। यहाँ की पत्रकारिता, बात ही मत पूछिए ” कौआ कान लेकर उड़ गया “; सुना दौड़ पड़े। कौन जाय कान देखने। इन कुतर्कियों को तर्क से कुछ लेना- देना नहीं, इन्हें पसन्द आई श्रीमान् मणिशंकर अय्यर जी की बातें। अरे भले मानुष ! इनकी ही पार्टी ने परोक्ष ” नाकाबंदी ” की थी। विपक्षी हैं, आपके पक्ष में नहीं; बोलना था बोल गए। जीते नहीं प्रत्यक्ष ; तो राज्यसभा में चुन लिए गए।
बौखलाए से हैं ज़नाब सत्ताधारी, नागवार गुज़र रही है; अब अनाप- सनाप बक रहे हैं। “आन्तरिक मामिलामा हस्तक्षेप भयो “, आँख मूँद कर गोली चलवाई, तब
नहीं सोचा। शांतिपूर्ण आन्दोलन को दबाने के चक्कर में, बर्बरता की पराकाष्ठा हो गई। निरपराध, लोगों की निर्ममता पूर्वक हत्या की गई। भला हो वर्तमान भारत सरकार का, जिसने एक “आदर्श पड़ोसी” धर्म का पालन किया। और हिंसा करने के पाप से “इस सरकार” को बचा लिया। अहसान मानों, बस इतना जानो; दाई-दाई करता मधेश:पीछे-पीछे दौड़ेगा नहीं। बराबर का हक़ है, जिसे अब देना पड़ेगा।
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