आन्दोलन और संविधान से जनता परेशान:कैलास दास

kailash das

कैलाश दास

विगत में माओवादी जनयुद्ध और मधेश आन्दोलन पश्चात हुआ समझौता, संविधान सभा में कार्यान्वयन नहीं करने की जिद, संघीयता, शासकीय स्वरूप, निर्वाचन प्रणाली, राज्य निर्धारण तथा सीमाकंन सम्बन्ध में फिर वार्ता सार्थक नहीं हो सका । सत्ता पक्ष और विपक्ष बीच सहमति या प्रक्रिया का विवाद यथावत ही है । जनता असमंजस में पड़ी है ‘आखिर यह खेल कब तक चलता रहेगा’ ? राजनीतिक अन्तरद्वन्द के कारण पहली संविधान सभा विघटन हुई तो दूसरे संविधान सभा में की गयी प्रतिबद्धता भी टूटी ।
देश आन्दोलन के बन्धन में फिर से बन्ध चुका है । आम जनता मूकदर्शक बनी है । विपक्षी ३० दलीय मोर्चा का आरोप है एमाले काँग्रेस का संयुक्त सरकार संघीयता, शासकीय स्वरूप, निर्वाचन प्रणाली के सम्बन्ध में घुमा–फिरा कर पुरानी राज्यसत्ता कायम करने में लगी है । राज्य निर्धारण और सीमाकंन पहाड़ी और मधेशी बीच विभेद लाने की कोशिश है जिसे स्वीकार करना असम्भव ही नही नामुमकिन भी है ।
सहमतीय संविधान के लिए आन्दोलन की बाध्यता, समानता, समावेशिता, विभेद विरुद्ध तथा अपरिहार्य का आरोप भी है । यह भी कहा गया कि आन्दोलन पार्टी विशेष नही, सैद्धान्तिक और दस्तावेज स्थापित, अधिकार सुनिश्चितता एवं अग्रगामी पुनर्संरचना के लिए है । जातीय नहीं बहु–पहचान चाहिए ।
वहीं एमाले—काँग्रेस का मानना है कि जातीय आधार में राज्य और सीमाकंन असम्भव है । संघीयता और शासकीय स्वरूप, निर्वाचन प्रणाली अन्तरिम संविधान के कुछ सूत्रों में संशोधन कर कार्यान्वयन किया जाए । पाँच जिला का जो विवाद है उन्हें केन्द्रशासित राज्य बनाया जाए । इसमें ३० दलीय मोर्चा सहमत नहीं हुआ तो प्रक्रिया में जा कर भी संविधान निर्माण किया जाएगा । इधर विपक्षी मोर्चा यह स्वीकार करने के लिए तैयार नही है । एकीकृत नेकपा माओवादी के वरिष्ठ नेता डा.बाबुराम भट्टराई के अनुसार नेपाल में पाँच बार संविधान लिखा गया और ६वाँ संविधान अन्तरिम संविधान है । इन सभी से ७ वाँ संविधान अलग होना चाहिए ।
संविधान में अधिकारों का बँटवारा होना चाहिए, बहुभाषा, बहुसाँस्कृतिक एवं बहुपहचान के आधार पर संविधान निर्माण होने पर जनता को नये नेपाल का अहसास होगा । सुशासन का कार्य जनता को जोड़ना, शान्ति प्रक्रिया का अनुभूति होना है न कि पुराना राज्य सत्ता कायम करना है ।
शायद यह विश्व का पहला अनुभवी देश होगा जो ६ बार संविधान लिख चुका हो और ७ वाँ के लिए राजनीतिक युद्ध चल रहा हो । दो—दो बार संविधान सभा का चुनाव हुआ और हर बार संविधान के तत्कालीन शासकों ने चरम दुरूपयोग किया । विभेदमुक्त राज्य, भयमुक्त समाज, अपराध मुक्त राजनीति, भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन, सक्षम नेतृत्व, कानूनी शासन दण्डहीनता को अन्त और जिम्मेवार एवं पारदर्शी राजनीतिक दल ही है । अब भी जनता आमूल परिवर्तन होने की सम्भावना दलों में बिलकुल नही देख रही है । राजनीतिक दलों का मानना है कि सहमति हुआ तो जेठ १५ तक संविधान बन जाएगा । लेकिन जनता में इसकी भी उम्मीद कम है और टकराव की सम्भावना ज्यादा ।
आम जनता ईमानदार नेता की तलाश में है जो जनता की भावना समझ सके, देश को चिन्तित कर सके, शान्ति सुरक्षा की अनुभूति दिला सके । लेकिन ऐसा लीडर न तो पक्ष के नेता में दिख रहा है और न ही विपक्षी दलों में । यह बात भलीभाँति राजनीतिक दल भी जानती है कि जनता हम पर विश्वास करना छोड़ दी है ।
जेठ १५ गते लोकतन्त्र स्थापित हुआ था । उसी दिन संविधान निर्माण घोषणा की मंशा राजनीतिक दल बना चुकी है । लेकिन सम्भावना बहुत ही न्यून है । एमाओवादी के साथ विगत में हुआ समझौता सरकार पक्ष से कार्यान्वयन भी हुआ तो मधेशवादी दलों की जो जिद है पूर्व के झापा, मोरंग सुनसरी तथा सुदूर पश्चिम के कञ्चनपुर, कैलाली जिला को लेकर वह इतनी जल्द समाधान होना मुश्किल है । मधेश स्वायत प्रदेश सम्भव नहीं भी हुआ तो दो प्रदेश या तीन स्वीकारने की सम्भावना है परन्तु पाँच जिला मधेश प्रदेश में नहीं आया तो गृह युद्ध की भी सम्भावना स्पष्ट है ।
जल और जंगल दोनो तराई मधेश से वञ्चित किया जाए तो भविष्य में मधेश प्रदेश का विकास सम्भव नही है, नेपाली काँग्रेस के नेता अमरेश कुमार सिंह का मानना है । इन पाँच जिलों को लेकर पहाड़ी और मधेशी समुदाय बीच की लड़ाई नहीं है । कोशी, गण्डकी, नारायणी, भेड़ी बड़ी नदी है जिससे मधेश भूमि की सिंचाई सम्भव है और वह इसी पाँच जिले में है । १५—३० वर्ष बाद नेपाल में पानी की सबसे बड़ी समस्या आने वाली है ऐसा विज्ञों का मानना है । जंगल तो पहाड़ में है ही, नदी भी दे दिया जाए तो केवल समतल भूमि लेकर क्या होगा ? अगर ये पाँच जिला मधेश भूमि में नही दिया गया तो मधेश विकास सम्भव नहीं है । हाँ, पाँच जिलों की समस्या आने वाले समय में एमाओवादी के साथ भी आ सकती है । क्योकि संघीयता के बाद मधेश की सबसे बड़ी समस्या यही पाँच जिला है जिन्हे सरल तरीके से प्राप्त करना नामुमकिन है ।
२०६४ के संविधान सभा चुनाव पश्चात शान्ति सुरक्षा, विकास, हत्या—हिंसा, बलात्कार, अपराध, भ्रष्टाचार पर भारी पड़ा संविधान निर्माण । जनता अभी तक शान्ति सुरक्षा की अनुभूति नही कर पायी, हत्या हिंसा बढ़ी, बलात्कार घटना में तीव्रता आयी और भ्रष्टाचार की सीमा न रही । लेकिन कभी भी इसके विरोध में आन्दोलन की आवश्यकता यहाँ के नेतागण क्यों नही समझे ? सभी ने जनता को यही कहकर भुलाया कि संविधान निर्माण होने पर यह स्वतः खत्म हो जाएगा ?
देश का अधिकांश बजट संविधान सभा सदस्य के तलव भत्ता और मन्त्रियाें के विदेश भ्रमण में खर्च होता है । जितने खर्च ६०१ सभासदों पर हो रही है, वही देश उन्नति के लिए किया जाता तो जनता में राजनीतिक दलों के प्रति घृणित भावना और द्वन्द्व उत्पन्न होने की सम्भावना न्यून थी । संविधान निर्माण के लिए भी सीमित बजट का प्रावधान ऐन कानून में उल्लेख अवश्य होनी चाहिए ताकि जितनी बार संविधान निर्माण का समय टले या विघटन हो फिर से बजट नहीं समावेश किया जाए ।
नेपाली जनता को अब तक आन्दोलन से क्षति और असुरक्षा के सिवा क्या मिला है ? जनता आजिज होकर आन्दोलन के समर्थन नही विरोध में है ।

वर्तमान सरकार से संविधान की सम्भावना और आन्दोलनकी उपलब्धि के विषय में सर्वसाधारण की प्रतिक्रिया
बजरंग प्रसाद साह
पूर्व मेयर, जनकपुरधाम
कोइराला सरकार संविधान प्रति बहुत ही वफादार है । वह किसी भी हालत में संविधान बनाएँगें ऐसा हमें विश्वास है । अगर यह सरकार संविधान नही बनाना चाहती तो इतनी लचक होती ही नही । कभी भी आन्दोलन से समाधान नही मिला है । ३० दल का जो आन्दोलन है वह बिलकुल निरर्थक है । इस आन्दोलन से किसी प्रकार का फायदा नहीं है । दोनो पक्ष मिलकर सहमतीय संविधान बनाबें तभी जनता की भावना की कदर होगी ।

गणेश चैतन्य ब्रह्मचारी
समाज सेवी
यह सरकार संविधान बना सकती है कि नही सम्भव और असम्भव की बात बड़ी नही है । सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जो द्वन्द है उससे स्पष्ट होता है कि संविधान सम्भव नही है । जेठ १५ गते गणतन्त्र आया था, संविधान भी अगर आ जाता तो सबसे बेहतर दिन माना जाता । लेकिन सम्भावना बहुत ही न्यून है । हाँ, ३० दलीय मोर्चा का जो आन्दोलन है जनता को दुःख के सिवा कुछ नहीं देगा । इस आन्दोलन को काठमाण्डौ में ही केन्द्रित किया जाए ।

सुरेन्द्र कुमार भण्डारी
सचिव
जनकपुर उद्योग
वाणिज्य संघ
नेपाल में सब कुछ आन्दोलन से ही मिला है । आन्दोलन के विरोध में हम नहीं हैं, लेकिन आन्दोलन सरकार के दवाव के लिए किया जाए इसके लिए सरकारी निकाय मात्र बन्द हो न कि शिक्षण संस्थान, बाजार एवं निजी उद्योग धन्धा । बन्द हड़ताल के कारण अभी तराई का शिक्षा एवं उद्योग धरासायी हो चुका है । जहाँ तक वर्तमान सरकार संविधान लाएगी यह कहना बहुत ही मुश्किल है । दलों को ऐसा ही रवैया रहा तो कोई भी सरकार संविधान लाने में असफल रहेगी । अब तो राजनीतिक दलों के उपर से जनता का विश्वास घटता जा रहा है ।

चन्दा साह
जनकपुर
 अभी तक राजनीतिक दलों से जनता दुःख ही पायी है । कभी आन्दोलन के नाम पर तो कभी बन्द हडताल कर । आन्दोलन सार्थक होनी चाहिए । परन्तु अभी राजनीतिक स्वार्थ का आन्दोलन है । अगर सार्थक आन्दोलन होता, ईमानदार नेता रहते तो संविधान बनाने में इतना समय नहीं लगता । इस सरकार से वर्तमान अवस्था में संविधान बनेगा कहना मुश्किल है । वैसे इस प्रकार के राजनीतिक द्वन्द में कोई सरकार संविधान नही बना पाएगी । जनता को संघीय संविधान चाहिए जिससे शान्ति सुरक्षा की अनुभूति हो पाए ।
 
दीपक भगत
जनकपुरधाम
तीस दलीय मोर्चा का आन्दोलन राजनीतिक दलो के लिए सही है । परन्तु जनता के लिए पीड़ा दायक । आन्दोलन से यहाँ का व्यापार, शिक्षा तो तहस नहस हुआ ही है । बेरोजगारी सबसे ज्यादा बढ़ी है । वैदेशिक रोजगार के कारण समाज में बहुत सारी कुरीति आई है । जहाँ तक संविधान बनने की बात है तो किसी प्रकार की सम्भावना नहीं दिखती है । होगा भी कैसे ? यहाँ तो विकास की राजनीति कम और विनाश का ज्यादा है ।

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