आन्दोलन की आग में कब तक जलेगा मधेश ?

फिलहाल देखा जाए तो नेपाल एक देश होते हुए भी दो समुदायों में बँट चुकी है ।

कैलास दास :मधेश का ऐसा एक भी जिला नही है जहाँ पर आन्दोलन की आग नही लगी है । जनता में आक्रोश की आग है, आन्दोलन नेतृत्वकर्ताओं में आन्दोलन को उँचाई पर ले जाने की आग है, तो कहीं सड़काें पर धू..धू..कर जलती टायर की आग है । जिधर देखो आग ही आग लगी है । सवाल यह भी है कि पाँच महीनों के बावजूद भी यह आग बुझी क्यों नहीं ? इसकी चिन्ता सरकार को क्यों नही हो रही है । आन्दोलनरूपी आग में जलने और जलानेवालो की राष्ट्रीयता कहाँ गुम है ?
मुल्क का अधिकांश भाग साँस्कृतिक एवं धार्मिक क्षेत्र होते हुए भी फिलहाल आन्दोलनमय भूमि बनी हुइृ है । जहाँ पर दैनिक सैकड़ों लोग दर्शन के लिए आते थे, जय माता दी की पुकार होती थी, वहाँ पर जय मधेश का नारा और पत्थरो का ढेर लगा है । धार्मिक गीतनाद की जगह, आन्दोलन का गीत सुनाया जाता है । सर पर माँ की चुनर बाँधने की जगह, काला पट्टी में जय मधेश लिखा जाता है । शहर धुआँ–धुआँ है । आखिर आन्दोलन की आग में कब तक जलेगा मधेश ?
जबकि सभी को मालूम है मधेश आन्दोलन से शिक्षण संस्था बन्द, कलकारखाना बन्द, यातायात बन्द, रोजगार बन्द, सरकारी कार्यालय बन्द, भन्सार बन्द यहाँ तक की न्यायालय भी बन्द है । केवल बढ़ती जा रही है तो काला बाजारी, घुसपैठिया, राष्ट्र के जिम्मेदार व्यक्तियों के बीच वाकयुद्ध, चौक चौराहे पर आम नागरिक द्वारा देश की चिन्ता, भुखमरी, आक्रोश, महँगाई और विद्युत लोडसेडिङ्ग के कारण अन्धेरे में रहने की आदत । क्या यह सच्चे राष्ट्रीयता की पहचान है ? इससे मुल्क आत्मनिर्भर बन सकता है ? आनेवाला कल अच्छा हो सकता है ? कदापि नही ।
नेपाल में राणा शाही और राजतन्त्र के अन्त्य के बाद लोकतन्त्र आया । जिस पर जनता ने आशा और विश्वास किया — देश विकास का, आत्म निर्भर बनने का, समान अधिकार पाने का । लेकिन आज गम्भीरता से देखा जाए तो यह लोकतन्त्र और लोकतान्त्रिक संविधान नेपाली जनता को पच्चीस वर्ष पीछे की जिन्दगी जीने के लिए विवश कर दिया है । यहाँ तक कि बिजली की जगह ‘डिबीया’ जलाने तक की नौवत आ गई है । नेपाली जनता ने लोकतन्त्र का सपना इसलिए नही देखा था कि हमें आन्दोलन ही आन्दोलन करने के लिए बाध्य होना पड़े । राजतन्त्र का इसलिए अन्त नही किया था कि लोकतान्त्रिक सरकार द्वारा बन्दूक की गोलियाँ खानी पड़े । वर्षो वर्ष से पड़ोसी मुल्क भारत के साथ वैवाहिक, साँस्कृतिक, भाषिक सम्बन्ध से विच्छेद होना पड़े और विभेद की आग में जलना पड़े ।
राज्य की बदनीयत और स्वच्छ राजनीति के अभाव में मुल्क दिनानुदिन अपंग बनती जा रही है । अर्थतन्त्र खत्म हो चुका है, अराजकता बढ़ती जा रही है और राज्य सत्ता में रहे एमाले, काँग्रेस और एमाओवादी जनता की चिन्ता की जगह वेपरवाह बनी है । फिलहाल देखा जाए तो नेपाल एक देश होते हुए भी दो समुदायों में बँट चुकी है ।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक मधेश में आन्दोलन चलता रहेगा ? कब राज्य का दमन और आन्दोलन नेतृत्वकर्ताओं की मनमानी खत्म होगी ? लोकतन्त्र में जो वाक युद्ध की परम्परा आयी है वह कब समाप्त होगा ? सरकार और आन्दोलनकारी बीच वार्ता की परम्परा और हठीपन कहाँ जा कर विश्राम लेगा ? यह राजनीतिक दलों के लिए भी असमंजस का विषय है कि वो समाधान नही खोजना चाह रहे या समकाधान मिल नहीं रहा है । आन्दोलनरत दल और सरकार बार—बार वार्ता के लिए बैठते है और १० मिनट में बिना बहस के वार्ता निष्कर्ष विहीन खत्म हो जाती है । इससे स्पष्ट होता है कि राज्य पक्ष समाधान नही, आन्दोलनकारी थककर आन्दोलन छोड़ दे यह सोच बना चुकी है ।
‘नेपाल के संविधान २०७२’ में सबसे बड़ी समस्या राज्य का सीमांकन है । कानून विज्ञों का मानना है कि संविधान त्रुटिपूर्ण है इसमें कोई दो मत नही । इस संविधान में मधेशी जनता को दिए गए अधिकार से भी वञ्चित कर दिया गया है । लेकिन समानुपातिक, जनसंख्या के आधार में निर्वाचन क्षेत्र का समाधान सम्भव होते हुए भी राज्य का सीमाकन बहुत ही गम्भीर है । मधेश नेतृत्वकर्ता दल की जो अडान है वह भी गलत है । नेपाल एक साझा फुलवारी होने के वास्ते प्रत्येक राज्य में प्रत्येक समुदाय को रहने का अधिकार है । इसलिए मधेश का जिला पहाड़ में जाए, चाहे पहाड़ का जिला मधेश में बहस का विषय नही होना चाहिए थी । राज्य ने २ नम्वर प्रदेश जिस प्रकार निर्माण किया है, वह भी ठीक नही है । इस प्रदेश में एक भी पहाड़ का जिला समावेश नहीं किया गया है । दूसरी बात अगर मधेश नेतृत्वकर्ता केवल मधेश भूमि का एक या दो प्रदेश बनना चाहता हैं तो कभी भी मधेश में रहने वाले पहाड़ी समुदाय और पहाड़ में रहने वाले मधेशी समुदाय का राजनीतिक पहुँच बनना तत्काल सम्भव नही दिखता है ।
मधेश में सीमांकन को लेकर पाँच महीनों से आन्दोलन चल रहा है । इस दरमियान पहाड़ी समुदाय को मधेश आन्दोलन में बहुत ही कम अर्थात नहीं के बराबर देखा गया है । इससे दो प्रश्न खड़ होते हैं— एक की तराई मे पहाड़ी समुदाय अल्प संख्यक हैं और मधेश आन्दोलन से राजनीतिक पहुँच होने की सम्भावना भी बहुत ही कम दिख रही है । दूसरा, कि पहाड़ी समुदाय का भी मधेश आन्दोलन में नेतृत्व करने की पहल मधेशी नेताओं ने नहीं किया है । इससे स्पष्ट है कि सीमांकन में मधेश पहाड़ के जिला को समावेश किया होता तो आज का दिन देखने को नहीं मिलता ।

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