आन्दोलन में कैसे हुआ खूनी जंग ?

थरूहट प्रदेश की माँग करने के लिए जिस आन्दोलन को शान्तिपूर्ण बताया गया उसमें खून की होली खेली गई । सड़कों पर लाशें भेड़ बकरियों की तरह पड़ी मिली । चारो तरफ अफरातफरी का माहोल, भगदड़, खौफ उन चेहरों पर साफ देखने को मिल रहा था जो लोग आन्दोलन में सहभागी थे ।

थरुहट तराई पार्टी के केन्द्रीय सदस्य गणेश प्रसाद थारु ने बताया कि भाद्र ४ गते शान्तिपूर्ण आन्दोलन कर रहे थारुओं के घर पर अखण्ड कार्यकर्ताओं ने आक्रमण किया । टिकापुर स्थित थारु कल्याणकारिणी सभा का कार्यालय भी अखण्डवालों ने जला दिया । आन्दोलन कर रहे थारुओं का घर पहचान कर तोड़फोड़, महिलाओं से छेड़छाड़ किया गया । थारु ने कहा पुलिस अखण्ड कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर तोड़फोड़ करवाने में मदद कर रही थी । जहाँ थारु कम थे वहाँ निरन्तर आक्रमण होने लगे, । आन्दोलन फिर भी नहीं थमा । भाद्र ७ गते घटना के बाद प्रशासन ने टिकापुर में कर्फ्यु का आदेश जारी कर दिया । दूसरे दिन ८ गते ४ बजे सेना भी टिकापुर पहुँच गई । चारों तरफ सेना के लोग थे । सेना की सुरक्षा में टिकापुर था । उन्होंने बताया सेना के आने के बाद थारु समुदाय भी सोच रहे थे कि अब सुरक्षा होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ । रात में ८ बजे सभासद जनकराम थारु के घर में आगजनी कर दिया गया । रेसम चौधरी के एफएम और रिसोर्ट में आग लगा दी गई
घटना सिर्फ यही बताई गई कि पुलिस हताहत हुए । लेकिन क्या कोई आन्दोलन सिर्फ सरकार से अपनी माँग पूरी करवाने के लिए इतना उग्र हो सकता है ? क्या कैलाली में मानवता मर चुकी थी ? क्या किसी को आन्दोलन के नाम पर पेट्रोल डालकर जलाया जा सकता है ? या इस घटना को अन्जाम देने में किसी प्रकार की साजिश थी ? ऐसे कई सवाल अभी भी उमड कर सामने आ रहे हैं । टिकापुर क्षेत्र में घटना के ४ दिन पहले से स्थानीय प्रशासन ने निषेधाज्ञा जारी कर रखा था । सुबह ११ बजे से ५ बजे तक टिकापुर क्षेत्र में रैली, जुलूस, नारेबाजी और प्रदर्शन नहीं किया जा सकता था । प्रशासन के निषेधाज्ञा के बावजूद भी आन्दोलन अपनी चरम पर था । निषेधाज्ञा की परवाह किए बिना लोग सड़कों पर उतर जाते थे ।
स्थानीय पत्रकार ममता रसाईली के अनुसार घटना के एक दिन पहले ही थरुहट कार्यकर्ता निषेधाज्ञा के खिलाफ सरकारी बोर्ड की जगह थरूहट स्वायत्त प्रदेश का बोर्ड लगाने का फैसला कर चुके थे ।
घटना के दिन प्रशासन की निषेधाज्ञा तोड़ने के लिए गाँव गाँव से प्रदर्शनकारी टिकापुर में एकत्र हो रहे थे । आन्दोलन को सम्हालने के लिए स्थानीय प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों के साथ बैठक की और आन्दोलन को शान्तिपूर्ण बनाए रखने की सहमति हुई । घटना के दिन पुलिस को सूचना मिली कि आज टिकापुर घेराव होगा । इस प्रकार की सूचना मिलते ही पुलिस ने मोतीनगर, टुरगौली, वनगाँव, अस्नेहरी और बर्दिया से जोड़ने वाले दो नाका दौलतपुर घाट और सेन्कट्टी में व्यापक पुलिस परिचालन किया । गाँव से आने वाले प्रदर्शनकारियों से रास्ते में भी पुलिस ने बदसलूकी की तथा टिकापुर पहुँच कर लोग आप बीती एक दूसरे को सुनाने लगे, लोगों का आक्रोश और गुस्सा निरन्तर बढ़ता गया ।
टिकापुर पूर्व–पश्चिम राजमार्ग स्थित लम्की से १७ किलोमीटर दक्षिण तरफ है । थारु समुदाय के बाहुल्य वाला यह क्षेत्र कुछ वर्ष पहले पश्चिम पहाड़ के वासियों के लिए भी स्थान्तरण होने का मुख्य केन्द्र बना । यद्यपि टिकापुर के आसपास क्षेत्रों में थारु गाँव है, जहाँ एकात्मक हिसाब से इनका बसोबास है । टिकापुर का यही थारु और पहाड़ी की जातीय संवेदनशीलताको ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने पुलिस सक्रियता बढ़ाई थी । नेपाल प्रहरी के सेती अञ्चल प्रमुख मृतक लक्ष्मण न्यौपाने घटना से तीन दिन पहले ही टिकापुर में तैनात किए गए थे ।
पुलिस श्रोत की मानें तो टिकापुर के चारों तरफ गाँव से थारु समुदाय सुबह ११ बजे तक एकत्र हो चुके थे । प्रशासन की निषेधाज्ञा के बावजूद अखण्ड सुदूरपश्चिम का आन्दोलन होना और उसी समय टिकापुर में थारुओं की रैली निकाला जाना भी घटना का मुख्य कारण है पत्रकार सुमित्रा भट्टराई ने हिमालिनी से बताया । अखण्ड आन्दोलनकारियों की तरफ से भी थारु आन्दोलनकारियों पर अभद्रतापूर्ण व्यवहार हुआ, थरुहट संघर्ष समिति के नेता फुलाराम थारु ने बताया कि थारुओं को टिकापुर में जलील किया गया । सामान्य अवस्था में कोई आन्दोलनकारी किसी की हत्या नहीं करता, थारु ने कहा, थारुओं को पुलिस और अखण्डवादी दोनो तरफ से उकसाया गया, जलील किया गया, गालियाँ दी गई जिसका परिणाम सभी को पता है ।
गलती एकतर्फी नहीं हुई है थारु ने कहा, यदि पुलिस चाहती तो अखण्ड वाले आन्दोलनकारियों को रोक सकती थी, दो आन्दोलन और दो समुदाय आमने सामने थे, अखण्ड वाले थारुओं के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे, थारु समुदाय भी पहाडि़यों के खिलाफ नारेबाजी पर उतर आए, पुलिस सिर्फ मूक दर्शक रही आन्दोलन के सहभागी हरिराम चौधरी ने बताया स्थिति देखते ही देखते खौफनाक हो गई ।
दूसरे समुदाय के लोग और पुलिस थारु प्रदर्शनकारियों के साथ अभद्रता नहीं करते तो घटना नहीं होती, महिलाएँ और बालबालिका ज्यादा सहभागी थे, थारु भिड़ना नहीं चाहते थे स्थानीय प्रकाश कुमार बस्नेत ने बताया, गलती दोनों तरफ से हुई ।
टिकापुर स्थित सशस्त्र उग्रतारा गण प्रमुख एसपी लक्ष्मण सिंह ने कहा टिकापुर के चारों तरफ से हाथ–हथियार सहित जुलूस आने की खबर मिलते ही सशस्त्र और नेपाल पुलिस की संयुक्त सुरक्षा दस्ता परिचालन की गई । सिंह के अनुसार टिकापुर नगरपालिका के पूर्व सुकुम्बासी बस्ती, उत्तरतर्फ टुरगौली, लम्की, पश्चिमतर्फ जोशीपुर मनुवा और दक्षिण तर्फ नारायणपुर, थापापुर से जुलूस आई और उसे नियन्त्रण करने के लिए पुलिस ने भरपूर बन्दोबस्त की । नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस ने चारो तरफ से नाका–नाका पर अलग अलग सुरक्षा दस्ता तैनात किया था । सुरक्षाकर्मी परिचालन होते समय भी संयमता अपनाने का विशेष निर्देशन था । मोतिनगर से करीब १५ हजार कार्यकर्ता आने की जानकारी प्राप्त होते ही एसएसपी लक्ष्मण न्यौपाने वहीं पहुँच गए । करीब २ बजकर २० मिनट पर मनुवा स्थित सहिद गेट के पास सशस्त्र और नेपाल पुलिस पर आक्रमण हो गया । आक्रोस वही था आत्म सम्मान पर ठेस पहुँचना । जुलूस आक्रमण के साथ आगे बढ़ा और मोतिनगर के पशुहाट के करीब पहुँच गया । जहाँ एसएसपी न्यौपाने ३०० पुलिस को कमाण्ड कर रहे थे । पशुहाट में आन्दोलनकारी और पुलिस काफी नजदीक आ गए । पुलिस और प्रदर्शनकारी दोनों तरफ से लगातार आक्रमण शुरु हुआ और न्यौपाने की मौत हो गई ।
न्यौपाने की मौत के बाद पुलिस दल भागने लगे और जो पकड में आया प्रदर्शनकारियों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया । पुलिस फायरिंग हुई जिस क्रम में ३ प्रदर्शनकारी की मौके पर ही मौत हो गई । यह देखकर भीड़ और उग्र हुई प्रहरी हवलदार राम विहारी चौधरी को जिन्दा जला दिया । प्रदर्शनकारियों का दावा है कि बच्चे की मौत पुलिस की गोली लगने से हुई, जबकि पुलिस प्रदर्शनकारियों पर आरोप लगा रही है । हलाँकि गोली जिस तरफ से भी लगी वह त्रुटिपूर्ण रूप से लगी, जानबूझकर किसी ने बच्चे की हत्या नहीं की । सुदूरपश्चिम क्षेत्रीय प्रहरी कार्यालय के प्रमुख डीआईजी रामकुमार खनाल ने बताया कि जुलूस में आने वाले तमाम थारुओं के हाथ में घरेलु हथियार थे । पुलिस की हत्या के बाद प्रदर्शनकारी टिकापुर बजार में प्रवेश नहीं किए ।
कहाँ है मीडिया ?
अभी तक मीडिया ने टिकापुर घटना के बारे में जितना विवरण दिया और मानवअधिकार आयोग ने जो सन्दर्भ बाहर किया उसमें किन्चित सच्चाई नहीं है, यह सरकारी षडयन्त्र के कारण हो रहा है, थारुओं की आवाज और माँग को दबाने की यह राष्ट्रीय साजिश है, हिमालिनी से मुलाकात में थरुहट नेता फुलाराम थारु ने बिना रुके हकीकत बयाँ करना शुरु कर दिया ।
टिकापुर घटना की दर्दनाक अवस्था को सुनाते हुए नेता थारु ने कहा यहाँ मानवअधिकार और मीडिया उतना ही बोलता है जितना सरकार चाहती है । ऐसे देश में न्याय की उम्मीद कैसे किया जाए ? उन्होने कहा अभी थरुहट के ३० से ज्यादा कार्यकर्ता अस्पताल में हंै, दर्जनों लोग आन्दोलन के बाद घर नहीं पहुँचे, अभी तक त्रास का माहोल है, सेना परिचालन करके घर में आगजनी करवाया यह कैसी सरकार है ?
मानवअधिकारवादी और पत्रकारों पर भी उनका अक्रोश थमा नहीं, कहा वास्तविकता छिपाना ही है तो टिकापुर भ्रमण की औपचारिकता क्यों ? थारुओं के घरों में कर्फ्यु में आगजनी और तोड़फोड़ हुई, सेना सड़क पर थी, टिकापुर प्रशासन के कब्जे में था, हर गली और नुक्कड़ पर पुलिस की पहरेदारी थी, तो आगजनी कैसे हुई ? इसका जबाब कौन देगा ?
टिकापुर की वास्तविकता बाहर नहीं आए इसके लिए सरकार ने सिर्फ उन लोगों को वहाँ जाने दिया जो सरकारी एजेन्ट थे । थारु ने कहा, आम लोगों को पुलिस ने प्रवेश पर प्रतिबन्ध कर दिया, थारुओं की अवस्था अभी क्या है हर किसी को नहीं मालूम, लेकिन कब तक छिपाएगी ये सरकार, सच तो बाहर आएगा ही ।
थारु ने आगे कहा, जो घटना हुई उसका हमें भी खेद है, नहीं होना चहिए, लेकिन किसी को थारु कहकर नेगलेट किया जाए, महिलाओं और युवतियों से अभद्रता दिखाई जाए, पुलिस के नाम पर पहाड़ी समुदाय के युवा गाली गलौज दें और पुलिस देखती रहे, तो कितना बरदास्त होता । पुलिस पर यह आक्रमण थारुओं की तरफ से कोई योजना नहीं है, हम हमेशा शान्तिपूर्ण आन्दोलन को ही बल देते हैं, प्रशासन को भी शान्तिपूर्ण बनाए रखने के लिए जो काम करने चहिए वो नहीं किया और दुर्घटना हो गई ।
कौन न्याय देगा हमें ?
थरुहट तराई पार्टी के केन्द्रीय सदस्य गणेश प्रसाद थारु ने बताया कि भाद्र ४ गते शान्तिपूर्ण आन्दोलन कर रहे थारुओं के घर पर अखण्ड कार्यकर्ताओं ने आक्रमण किया । टिकापुर स्थित थारु कल्याणकारिणी सभा का कार्यालय भी अखण्डवालों ने जला दिया । आन्दोलन कर रहे थारुओं का घर पहचान कर तोड़फोड़, महिलाओं से छेड़छाड़ किया गया ।
थारु ने कहा पुलिस अखण्ड कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर तोड़फोड़ करवाने में मदद कर रही थी । जहाँ थारु कम थे वहाँ निरन्तर आक्रमण होने लगे, । आन्दोलन फिर भी नहीं थमा । भाद्र ७ गते घटना के बाद प्रशासन ने टिकापुर में कर्फ्यु का आदेश जारी कर दिया । दूसरे दिन ८ गते ४ बजे सेना भी टिकापुर पहुँच गई । चारों तरफ सेना के लोग थे । सेना की सुरक्षा में टिकापुर था ।
उन्होंने बताया सेना के आने के बाद थारु समुदाय भी सोच रहे थे कि अब सुरक्षा होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ । रात में ८ बजे सभासद जनकराम थारु के घर में आगजनी कर दिया गया । रेसम चौधरी के एफएम और रिसोर्ट में आग लगा दी गई ।
थारु ने आगे बताया कि सच्चाई तो यह है कि घटना को ८ दिन हो गए प्रशासन और सरकार की तरफ से किसी प्रकार की छानबीन शुरु नहीं की गई । पुलिस की हत्या को कोई जायज नहीं कह सकता लेकिन वह हुआ कैसे इसकी जाँच तो सरकार कर सकती है ? आन्दोलन में जिसने भी हत्या की है, उसे कानूनी दायरा में आना चाहिए, लेकिन थारुओं के साथ क्या हुआ इसकी खबर कौन लेगा ? क्या वाकई हम थारु नेपाली नागरिक नहीं हैं ? आन्दोलन में आते जाते समय रास्ते में पुलिस का व्यवहार क्या होता है वह किसी थारु को ही पता होगा, कौन छानबीन करेगा इस बात का ?
उन्होने कहा कोई महज आन्दोलन के नाम पर किसीको जिन्दा नहीं जलाता, वजह और भी हैं सरकार छानबीन करे, हम छानबीन की पूर्ण रूप से माँग करते हैं लेकिन स्वतन्त्र जाँच समिति होनी चाहिए कि दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ सके । वैसे आज जो हालात दिख रहे हैं उसमें हमें न्याय की कोई संभावना भी नहीं दिख रही है । हम नहीं जानते कि हमें न्याय कौन दिलाएगा ?
ऐसा थी सुरक्षा चैनल
आन्दोलन के विषय को लक्षित करते हुए सरकार ने नेपाली सेना के अलावा नेपाल और सशस्त्र पुलिस के ३ हजार जवान सुदूरपश्चिम के कैलाली और कञ्चनपुर जिला को सुरक्षा प्रदान करते हैं । इनके अलावा राष्ट्रीय अनुसन्धान विभाग के सौ से अधिक गुप्तचर इस क्षेत्र में काम करते हैं ।
सशस्त्र प्रहरी बल की कैलाली अत्तरिया स्थित सुदूरपश्चिम (वैद्यनाथ) बाहिनी है । जिसको कमाण्ड करते हैं सशस्त्र के डीआईजी खड़ानन्द चौधरी । इसी प्रकार नेपाल पुलिस की क्षेत्रीय प्रहरी कार्यालय धनगढी केन्द्रित है । डीआईजी खनाल जिस का नेतृत्व करते हैं वह पुलिस दल सुदूर पश्चिम में कार्यरत है ।
टीकापुर में सशस्त्र प्रहरी बल की उग्रतारा गण है जहाँ ७ सौ ६१ की फौज है । इसी प्रकार सशस्त्र का धनगढी में सीमा सुरक्षा कार्यालय भी है और कैलाली के बनवेढा में बढिमालिका गण तैनाथ है ।
सेती अञ्चल प्रहरी कार्यालय और जिला प्रहरी कार्यालय धनगढी में है वहीं इलाका प्रहरी कार्यालय टीकापुर में है जिसे एक डीएसपी कमाण्ड करता है । इसके अलावा नेपाल पुलिस की धनगढी में दंगा नियन्त्रण गण और अञ्चल गुल्म भी है ।
कैलाली केन्द्रित सुरक्षा के लिए सरकार ने इतने पुलिस बल तैनात किए फिर भी कहाँ चूक गई पुलिस ? क्या कर रहा था नेपाल सरकार का खुफिया तन्त्र ? क्यों घटना का अंदेशा पहले पुलिस को नहीं हुई ? या सरकार खुद घटना की योजनाकार है ? ऐसे कई गम्भीर प्रश्न टिकापुर घटना ने उठा दिए हैं ।
लेकिन अनहोनी टली नहीं
भाद्र ७ गते से निरन्तर २४ घण्टे का कफ्र्यु जारी है । हर नुक्कड पर सेना की कड़ी गस्ती है । उसके बाद भी भयावह मञ्जर है । मन में अभी भी साम्प्रदायिक त्रास है ।
थारु गाँवों में युवा युवतियाँ विस्थापित हैं, सेना की आड़ में आगजनी और तोड़फोड़ के बाद अब थारु समुदाय काफी आहत हंै । स्थानीय सूर्य बहादुर शाही ने कहा दोनो तरफ त्रास का माहोल है । रात में पहाड़ी और थारु दोनों तरफ के लोग सुख चैन से नहीं सोते, घटना कहीं बदला का रूप न ले यही त्रास चारो तरफ है ।
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो सीमांकन के विषय पर ‘अखण्ड सुदूरपश्चिम’ पक्षधर और थारूवान प्रदेश चाहने वाले लोगों के टकराव का नतीजा है यह कैलाली घटना । इसी विषय पर थारु और पहाड़ी समुदाय आपस में विभाजन हुए और नतीजा यह हुआ कि एक दूसरे समुदाय से दोनों तरफ बराबर का डर बना हुआ है । ८ दिन से लगातार प्रशासन ने २४ घण्टे कफर््यु जारी कर रखा है ।
टिकापुर घटना सिर्फ स्वच्छ रूप से पुलिस ही रोकती तो तनाव नहीं होता, स्थानीय हरिराम चौधरी ने बताया अन्य समुदाय के लोग भी पुलिस के साथ मिलकर पथराव किए, अभद्रता दिखाई, गाली गलौज किया और घटना घट गई । ८वें दिन भी तोड़फोड़ का अवशेष सड़कों पर दिखाई देता है ।
ध्वस्त रेडियो स्टेशन, आगजनी में जले घर, तोड़फोड़ हुई सवारी साधन, कम्प्युटर, कुर्सी, टीभी और घरेलु सामग्री सड़क पर अब भी बिखरे हुए हैं । वर्षों से मिलकर रह रहे समुदाय आज एक दूसरे की जान लेने पर तुले हैं । खौफ का मञ्जर इतना कि लोग घरों से बाहर निकलना नहीं चाहते ।
लगातार के कफ्र्यु से आम जनजीवन भी ध्वस्त हो चुका है । तरकारी, खाद्यान्न, का अभाव तो है ही, व्यवसाय, कारोबार, स्कुल, कालेज, दुकानें सरकारी कार्यालय सुनसान है । घर में खाद्य सामग्रियों का अभाव बहुतों को खटक रहा है लेकिन बजार न खुलने से जैसे तैसे निर्वाह कर रहे हैं ।
नेपाली सेना के लेफ्टिनेन्ट कर्णेल भुवन सत्याल के कमान्ड में करीब ४ सौ सैनिक टिकापुर में तैनात हैं । लोग अब सिर्फ शान्ति चाहते हैं । स्थानीय रविन्द्र कुमार खड्का ने कहा यहाँ सभी का बुरा हाल है, सिर्फ किसी प्रकार से कर्फयु हटे और चैन की साँस लेने को मिले यही सबकी कामना है । उन्हाेंने कहा, लेकिन डर दोनों तरफ बना हुआ है, पुलिस और सेना भी वही आँकलन कर रही है । प्रशासन ने इसी प्रकार और कुछ दिन सख्ती नहीं दिखाई तो घटना नया मोड़ ले सकती है ।

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