आम आदमी की तलाश में नेपाल

कुमार सच्चिदानन्द:उत्तर की हिम-वृष्टि और जल-वृष्टि से दक्षिण का मौसम और नदियों का जल स्तर प्रभावित होने की बात कही जाती है और दक्षिण की राजनैतिक और कूटनैतिक हवा से नेपाल की राजनीति अक्सर पीडिÞत और प्रभावित होने की बात चर्चा में आती है। नव वर्षकी पर्ूव सन्ध्या में दिल्ली की आम जनता को नए राजनैतिक चिन्तन पर आधारित नई सरकार की सौगात मिली है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से निकल कर महज चौदह महीनों में एक राजनैतिक दल का संगठन कर दिल्ली की सरकार को ध्वस्त करना उसकी उपलब्धि रही है और इस यात्रा के नायक अरबिन्द केजरीवाल रहे हैं जिसकी कोई राजनैतिक पृष्ठभूमि नहीं रही है। यद्यपि यह अल्पमत की सरकार है जो पारम्परिक राजनैतिक दल की बैसाखी पर खडÞी है। इसलिए यह सफल कितना होगी, यह तथ्य भविष्य के गर्भ में है लेकिन पारम्परिक राजनैतिक चिंतन को इसने झकझोर कर रख दिया है। घिसी-पीटी लीक पर कुतर्कों की तलवार और चरित्रगत दुराचार का आधार लेकर चलनेवाले नेताओं को इसने आम आदमी की ताकत दिखलाई है और उन्हें यह सोचने के लिए विवश किया है कि स्वयंभू बनने की प्रवृत्ति वे छोडÞें, स् वयं को र्सवशक्तिमान मान कर आमलोगों को गुमराह करने की प्रवृत्ति से भी वे बाज आएँ अन्यथा जिसे वे निरीह और लाचार आम आदमी समझते हैं उसी के बीच से कोई उठेगा और उनका समस्त गर्व एवं गुमान खण्डित कर डालेगा। नेपाल का राजनैतिक परिदृश्य ऐसी शक्ति के उदय के सापेक्ष्य नजर आती है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था से तो नहीं मगर नेपाल में इस व्यवस्था के नीतिकारों से आमलोगों का रुझान घटना तो संवत् २०४६ के प्रजातांत्रिक आन्दोलन से ही आरम्भ हो गया था।arvind-kejriwal

रही सही कसर दरबार हत्याकाण्ड के बाद पूरी हो गयी। यही कारण था कि पर्ूव महाराज ज्ञानेद्र के सत्ता हस्तगत करने के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया आम लोगों द्वारा देखी जानी चाहए थी, वह तत्काल देखने को नहीं मिली। ज्ञानेन्द्र के कदमों के प्रति विरोध की आवाज बुलन्द करने के लिए राजनैतिक दलों और उनके नेताओं को समय का इन्तजार करना पडÞा, उनके द्वारा की जानेवाली गलतियों की राह देखनी पडÞी। जनान्दोलन-२ का नेतृत्व भी नेपाल के बुद्धिजीवियों की अगुवाई में सम्पन्न हुआ, यहाँ बुद्धिजीवी आगे थे और नेता पीछे। माओवादियों के मुख्यधारा में आने के बाद लोगों ने उससे भी अपेक्षा की, लेकिन उसके प्रति भी मोहभंग की अवस्था है। विगत दो संविधानसभा के चुनावों के परिणाम किसी भी दल के पक्ष में नहीं हैं। सामान्य बहुमत से भी ये दल दूर रहे हैं। अपनी पीठ चाहे कितना ही ये थपथपा लें लेकिन यह तथ्य इस बात को प्रमाणित करते हैं कि दलों के प्रति लोगों की आस्था क्रमशः घटती जा रही है। इसलिए कहीं न कहीं अन्य विकल्प की तलाश आमलोगों की नजर में है। विगत संविधानसभा के चुनाव में राप्रपा नेपाल के र्समर्थकों की संख्या अप्रत्याशित ढंग से बढÞना इस बात के प्रारम्भिक संकेत हो सकते हैं। कुछ लोग पर्ूव महाराज की पुनर्वापसी की बात भी करते हैं। हमारे र ाजनेता इसे प्रलाप कह सकते हैं लेकिन जिस संक्रमण की अवस्था से नेपाल गुजर रहा है, उसमें किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। एक बात तो निश्चित है कि प्रजातांत्रिक चेतना से लबालब भरी जनता के लिए कुमार सच्चिदानन्द @ आम आदमी की तलाश में नेपाल नेपाल में अरबिन्द केजरीवाल जैसे व्यक्तित्व के पनपने की आशा तो है,

लेकिन जो भी केजरीवाल यहाँ पनपेगा उसे र्सवप्रथम इस खण्ड-खण्ड समाज को अपनी आवाज से एकसूत्रता देनी होगी। देश के हर नागरिक के लिए समता और सम्मान का वातावरण निर्माण करना होगा। आवरण घद्ध हिमालिनी l जनवरी/२०१४ प्रतिदिन अपनी ऐसी भलाई करते जाईये। यह स्थिति सहज स्वीकार्य नहीं होगी लेकिन संवैधानिक राजतंत्र का अतीत इस देश का रहा है। इसमें कुछ नए प्रयोग भी हो सकते हैं। एक बात और कही जा सकती है कि अब तक लोगों की आशा एक राजनैतिक चक्र में उलझी थी जिसकी परिधि पर ज्ञानेन्द्र के साथ-साथ अन्य राजनैतिक दल स्थित हैं। लेकिन दिल्ली के चुनाव ने आम लोगों की आशा को नयी दिशा दी है, उन्हें नया कुछ सोचने के लिए विवश किया है। विगत के विस्तारित कार्यकाल में अपने लक्ष्य को प्राप्त न करने का आरोप विगत संविधानसभा पर रहा है। दूसरी संविधानसभा के चुनाव के परिणाम अनुसार किसी भी दल को सामान्य बहुमत तक नहीं मिला है। संभावित सरकार और भावी कार्यनीति के सम्बन्ध में दलों के बीच व्यापक खींचतान है। इसके बावजूद समानुपातिक उम्मीदवार ों की जो सूची इन दलों ने जारी की है, उससे दलों के भीतर ही घमासान मचा हुआ है। किसी निश्चित मापदण्ड के अनुसार कोई पारदर्शी प्रक्रिया किसी भी पार्टर्ीीे नहीं अपनाई है। परिणामतः हर पार्टर्ीीे कार्यकर्ता असन्तुष्ट हंै और नेतृत्व के प्रति आक्रामक भी।

काँग्रेसी कार्यकर्त्तर्ााें का आरोप है कि पार्टर्ीीें दिए गए योगदान, सिद्धान्त और नीति प्रस्तुत कर सकने वाले कार्यकर्त्तर्ााो समानुपातिक के माध्यम से सभासद बनाने की नीति थी। लेकिन दो वरिष्ठ नेता संस्थापन पक्ष और शेरबहादुर देउवा के बीच रस्साकस्सी तथा सीटों के बँटवारे के कारण यह सम्भव नहीं हो सका। नेकपा एमाले भी प्रायः इसी तरह के आर ोपों में फँसा हुआ है। एनेकपा माओवादी का कलह तो सतह पर आ ही गया है। मधेश आधारित दलों की स्थिति भी प्रायः ऐसी ही है। समानुपातिक उम्मीदवारों के चयन में सामान्यतया प्रभावशाली नेताओं ने अपने परि वार के सदस्यों, राजनीति के क्षेत्र में अपने निकटस्थों और गृह जिलों को प्राथमिकता दी है। इसके कारण विभाजन असंतुलित हो गया है। किसी जिला में दर्जन से अधिक सभासद् हैं तो कोई जिला प्रत्यक्ष निर्वाचित सभासद के सिवा समानुपातिक प्रतिनिधि विहीन है। सबसे महइभ्वपर्ूण्ा बात यह है कई प्रभावशाली नेता अपनी पत्नियों को संविधान सभा में ले जाना नहीं भूले हैं। प्रत्यक्ष निर्वाचन में पराजित कुछ नेता ने जो पार्टर्ीीध्यक्ष भी हैं, कार्यकर्ताओं की जगह अपनी पत्नियों को प्राथमिकता दी है। यह समस्त प्रक्रिया यह संकेत दे रही है कि समानुपातिक सभासद की व्यवस्था की जो मूल अवधारणा थी, वह लगभग विलुप्त हो चुकी है। समाज के विभिन्न तबकों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। एक तरह से नेपाल की र ाजनीति में मक्खन-मलाई मलने की प्रवृत्ति को समानुपातिक सभासदों की चयन प्रक्रिया प्रश्रय दे रही है, पैसे के खेल का अखाडÞा भी यह बनने लगा है। ऐसे में इसके प्रति आमलोगों का मोहभंग होना स्वाभाविक है।

दिल्ली और नेपाल की परिस्थिति में अन्तर यह है कि दिल्ली महानगर है और महानगरों में आम लोग पहचानहीनता की स्थिति से गुजर ते हैं। किसी भी राजनैतिक दल और नेताओं के प्रति प्रतिबद्धता अपेक्षाकृत उनमें कम होती है। काम के अवसर की अधिकता के कारण समयाभाव और भागदौडÞ महानगर ीय जीवन की विशेषता होती है। ऐसे में लोग सरकार के कामकाज को ही उसकी लोकप्रियता का आधार मानते हैं। वास्तव में दिल्ली की सरकार के पतन का मार्ग उसी दिन प्रशस्त हो गया था, जिस दिन एशियायी खेलों के लिए पर्ूवाधार विकास के क्रम में किए गए राशि-विनियोजन में व्यापक अनियमिता की घटनाएँ प्रकाश में आयीं और इसके प्रति सरकार की वैसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली जिसकी अपेक्षा की जाती थी। विगत दो वर्षों में जो घोटाले प्रकाश में आए उसने भी सरकार और उसके दल से मोहभंग की अवस्था पैदा की। रही सही कसर अन्ना के आन्दोलन ने पूरी कर दी। इस आन्दोलन के र्सवाधिक प्रखर प्रवक्ता थे अरबिन्द केजरीवाल। अतः उन्होंने राजनीति के गलियारे को साफ कर ने की ठानी तो लोग उनके साथ ‘झाडÞू’ लेकर निकल पडÞे। वैसे इस आम आदमी ने जिसे हम नेपाल की परिस्थिति में एक मूलभूत अन्तर यह है कि दिल्ली में जाति- पाति या क्षेत्र-भाषा के आधार पर कोई भेदभाव की स्थिति नहीं,

जबकि नेपाल में इनकी जडÞें काफी गहरी हैं। देश के सम्पर्ूण्ा तंत्र पर दो जाति विशेष की पकडÞ गहरी है। पहाडÞ और मधेश के आधार पर देश की राजनैतिक चेतना विभाजित है और समाज को कैसै तोडÞा जाए, इस कला में हमारे राजनेता काफी निपुण हैं। कभी धर्म के आधार पर, कभी भाषा के आधार पर, कभी वेशभूषा के आधार पर ये इस काम को अंजाम देते ही रहते हैं। इसी का परिणाम है कि पहाडÞ जातीय पहचान के नाम पर और मधेश भाषा के नाम पर विभाजित है। आवरण हिमालिनी l जनवरी/२०१४ घछ परमात्मा से प्रेम करना समस्त मानव जाति से प्रेम करना है। जनता कहते हैं, कभी भैंस की पीठ पर बैठकर राजनीति की बात करने वाले में जब नायकत्व देखा तो पन्द्रह वर्षों तक उसे सर ताज बना कर रखा। लेकिन जब उन्होंने र ाजनैतिक रूप से लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया तो उन्हें अपनी जमीन दिखा दी। सारे देश की विपक्षी राजनीति जिसे साम्प्रदायिक कहकर अछूत बनाने की कोशिश की, उसे विकास के नाम पर पन्द्रह वर्षों से राजतिलक लगा रही है और राष्ट्र का नायक बनाने की दिशा में उसे प्रोत्साहित कर रही हैं। कहा जा सकता है कि आम लोग जो अपनी बाँहों पर भरोसा करते हैं, उन्हे सामाजिक न्याय, विकास और सुव्यवस्था चाहिए। नार ों की संजीवनी से वह बहुत दिन तक संतुष्ट होकर नहीं रह सकती। इस दृष्टि से भी कहा जा सकता है कि लोकतांत्रिक सरकारों से लोगों की अपेक्षाएँ तो पूरी नहीं ही हो सकी,र् वर्तमान की न्यायिक-प्रशासनिक सरकार भी उनकी अपेक्षाओं पर खडÞी नहीं उतर सकी। अब सवाल उठता है कि आखिर कौन – नेपाल की परिस्थिति थोडÞी अलग है। छोटा देश और छोटे-छोटे निर्वाचन क्षेत्र। नेताओं के पनपने पलने और बढÞने के लिए ये अवसर प्रदान करते हैं। स्वतंत्र, निष्पक्ष और पर्ूवाग्रहमुक्त शासन संयन्त्र न होने के कारण राजनैतिक दलों या इसके नेताओं से जुडÞकर रहना लोग अपनी मजबूरी समझते हैं। इसलिए यहाँ दलों के कार्यकर्त्तर्ाापेक्षाकृत अधिक हैं। गौरतलब है कि परिवर्तन की भूमिका कार्यकर्ता नहीं बल्कि आमलोग प्रस्तुत करते हैं, जो किसी राजनैतिक दल के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होते। यही आम लोगों की सबसे बडÞी ताकत है। नेपाल के सर्न्दर्भ में देखें तो यहाँ बुद्धिजीवी और उनके संगठन भी दलीय प्रतिबद्धता से इतने ग्रसित हैं कि पेशागत हितों के प्रति भी पर्ूण्ातः संवेदनशील नहीं हो पाते और वर्गीय समस्याओं पर राजनैतिक दलों की भाषा बोलते हैं। ट्रेड यूनियनों का भी कमोवेश यही हाल है। संचार माध्यमों की अवस्था भी प्रायः ऐसी ही है। जिला से पंचायत स्तर तक दलगत बन्दरबाँट के कार ण दलों की उपस्थिति लोगों के घर के चूल्हे तक है। ऐसे में एकबारगी किसी बडÞे और परिवर्तनकारी आन्दोलन का परिदृश्य प्रस्तुत होना सहज नहीं है। लेकिन संभावनाओं की जमीन को बन्ध्या भी नहीं कही जा सकती। आम लोगों की अपेक्षाओं पर खडÞा होने वाला एक जमात चाहिए। एक बात निश्चित है कि राजनीति में भ्रष्टाचार से विरक्त जनता दिल्ली की इस र ाजनैतिक परिवर्तन से आशान्वित है। विगत संविधानसभा चुनाव में फेसबुक के द्वारा नेकपा एमाले का प्रचार कर रहे दीपकजंग थापा ने देश कर्ेर्

इमानदार पेशाकर्मियों से केजरीवाल की तरह ही दल बनाने की बात फेसबुक के ही माध्यम से की है। एक बात तो निश्चित है कि राजनैतिक दलों से मोहभंग होना, क्रमशः आम लोगों का सचेत होना भी इस परिस्थिति के पनपने के प्रति अनुकूलता दर्शाता है। विगत के घटनाक्रमों पर गौर करें तो कहा जा सकता है कि नेपाल के तीनों प्रमुख दलों के नेतागण किसी न किसी रूप में आमलोगों के आक्रोश का शिकार हो चुके हैं। छोटी-छोटी राजनैतिक शक्तियाँ विगत संविधानसभा के चुनाव में लुप्तप्राय हो चुकी हैं या अस्तित्व मात्र जतलाने की अवस्था में हंै। वास्तव में यह दलों की घटती हर्ुइ लोकप्रियता का परिणाम है। काँग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी दिल्ली में नई शक्ति के उदय का कारण राजनैतिक दलों की पुरातन कार्यशैली और सरकारी कार्यालयों में र्सवसाधारण द्वारा झेले जाने वाले दुःख को माना है। सभासद गगन थापा ने काँग्रेस की केन्द्रीय कार्यसमिति में ही यह चेतावनी दी है कि अगर पार्टर्ीीपनी कार्यशैली परिवर्तन नहीं करती है तो ‘आप’ की तरह नयी शक्ति का उदय हो सकता है और पुरानी शक्ति को चुनौती दे सकता है। एमाले नेता घनश्याम भुसाल भी यह विचार व्यक्त करते हैं कि निर्धारित समय में अगर संविधान निर्माण हो गया तो जनता कुछ समय तक इन्तजार कर सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो शीघ्र ही ऐसी शक्ति उदित होने की सम्भावना है। लेकिन दिल्ली की परिस्थिति और नेपाल की परिस्थिति में एक मूलभूत अन्तर यह है कि दिल्ली में जाति-पाति या क्षेत्र-भाषा के आधार पर कोई भेदभाव की स्थिति नहीं, जबकि नेपाल में इनकी जडÞें काफी गहरी हैं। देश के सम्पर्ूण्ा तंत्र पर दो जाति विशेष की पकडÞ गहरी है। पहाडÞ और मधेश के आधार पर देश की राजनैतिक चेतना विभाजित है और समाज को कैसै तोडÞा जाए, इस कला में हमारे राजनेता काफी निपुण हैं। कभी धर्म के आधार पर, कभी भाषा के आधार पर, कभी वेशभूषा के आधार पर ये इस काम को अंजाम देते ही रहते हैं। इसी का परिणाम है कि पहाडÞ जातीय पहचान के नाम पर और मधेश भाषा के नाम पर विभाजित है। थोडÞी बहुत आशा माओवादियों से की जा रही थी क्योंकि सशस्त्र व्रि्रोह की अवधि में उन्होंने दबे-कुचले वर्ग की आवाज को मुखर की थी, देश के तीव्र विकास की बात की थी। लेकिन मुख्यधारा में आने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि उनके भी कदमताल प्रायः वैसे ही हैं जैसे अन्य दलों के। यही कारण है कि विगत संविधानसभा के चुनाव में उन्हें व्यापक पर ाजय की पीडÞा झेलनी पडÞी। इसलिए नेपाल में अरबिन्द केजरीवाल जैसे व्यक्तित्व के पनपने की आशा तो है, लेकिन जो भी केजरीवाल यहाँ पनपेगा उसेर् र्सवप्रथम इस खण्ड-खण्ड समाज को अपनी आवाज से एकसूत्रता देनी होगी। देश के हर नागरिक के लिए समता और सम्मान का वातावरण निर्माण करना होगा। यह सच है कि नेपाल में नेल्सन मण्डेला की मृत्यु पर शोक मनाने वाले नेता तो अनेक थे, नस् लवादी सरकार के विरुद्ध उनके संर्घष्ा की गाथा का गुणगान करने वाले भी अनेक थे, लेकिन उनके अपने ही देश में सदियों से लोग इस तरह की दर्ुभावना के शिकार हैं, इसे दूर करने की उनकी कोई योजना नहीं। इन समस् त वर्गों को एक सूत्र में बाँधने की ठोस और्रर् इमानदार कार्ययोजना के बिना यहाँ पनपा कोई भी केजरीवाल या तो पहाडÞ का होगा या मधेश का, या तो पहाडÞी या मधेशी। वह नेपाल का नहीं होगा और जब तक नेपाल का नहीं होगा, तब तक उसकी सोच और उसका चिन्तन अधूरा माना जाएगा। एक बात तो कही जा सकती है कि धरती कभी प्रतिभा के मामले में बंजर नहीं हर्ुइ है। हमारे देश में विगत ५ वर्षों से संक्रमणकाल जारी है और दलों का जो रूख है उसमें निश्चित अवधि में यह समाप्त हो ही जाएगी, कहना मुश्किल है। ऐसे में माना जा सकता है कि नई चेतना की चिंगारी कहीं सुलग रही होगी। दिल्ली के चुनाव परिणाम ने इसके ऊपर की राख को साफ कर सुलगने का माहौल जरूर पैदा कर दिया है। आशा की जा सकती है कि नेपाल में भी एक ऐसा नेतृत्व पैदा हो जो देश की राजनीति में व्याप्त जडÞताओं को समाप्त कर जनाकांक्षा को नई दिशा प्रदान करे। J

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