आम चुनाव २०१३ की औचित्यता

प्रो. नवीन मिश्रा:आम चुनाव की समाप्ति के बाद अब यह बात उर्ठाई जा रही है- विशेष रूप से एमाओवादी के द्वारा की नई सरकार का गठन और संविधन निर्माण बहुमतीय नहीं बल्कि सहमतीय आधार पर होना चाहिए, भले ही इसके लिए सं िवधान म सशंधे न ही क्या न करना पडअगर यही बात थी तो फिर देश का तेरह अरबर् खर्च कर आम चुनाव कराने का क्या औचित्य था – इस चनुव म ंे कागं से्र सबस े बडीÞ पार्टर्ी  क े रूप म ंे उभर कर सामन े आर्इ  ह ै आरै एमाल का दसूरा स्थान प्राप्त हुआ है। पिछले चुनाव की सबसे बडी पार्टर्ीीमाओवादी को इस बार तीसरे स्थान सेही सतं ाष्े ा करना पडाÞ ह ै जबकि मधशे ी दला ंे का ता े सफाया ही हा े गया ह।ै हालां िक चनु ाव म ंे पर ाजित एमाआवे ादी तथा मधशे ी दला ंे का मानना ह ै कि चनु ाव म ंे व्यापक रूप स े धाधं ली हर्इर्ु  आरै चनु ाव निष्पक्ष नही ं हअु। इसक े पक्ष म ंे कर्इ दलील ंे दी जा रही ह।ंै जसै े कि मतपे िटकाआ ंे क े साथ पार्टर्ी  प्रि तनिधिया ंे का े नही ं ल े जाना, मतदानस सम्बन्धित ु िचलकाआ ंे का े सावर्ज निक नही ं करना या फिर गिर े हएु वाटे ा ंे स े अधिक मतपत्रा का मिलना आदि। र्सलाही के बरहथवा के नागरि का ंे न े एक जल े हएु मतपटे ी का े लके र विराधे पद्र शर्न कर चनु ाव म ंे धाधं ली का आरापे लगाया ह।ै विजयी दला ंे का मनना ह ै कि यह पराजित दला ंे की साजिश ह,ै चनु ावी प्रि क्रया का े बदनाम करन े क े लिए। ले िकन अगर एसे ी बात ह ै ता े उन्ह ंेमतपे िटका कहा ं स े मिली – इन्ही ं आधारा ंे पर इन दला ंे न े मतदान आयागे स े जाचँ की मागंकी ह।ै इन तथ्या ंे म ंे कितनी च्चार्इ  ह,ै यह ता निष्पक्ष जाचं क े बाद ही पता चलगे ा ले िकन दला ंे क े विजय आरै पराजय क े अन्य भी कारण ह,ंै जिनका विश्लेषण किया जाना चाहिए। इस चुनाव में सबसे ज्यादा मुंहकी खानी पडÞी है एमाओवादी और मधेशी दलों को। माओवादी की हार का सबसे बडÞा करण है, पार्टर्ीीा विभाजन। जब भी कोई एक पार्टर्ीीो भागों में विभाजित हो जाएगी तो स्वाभाविक है कि उसकी शक्ति आधी हो जाएगी। दूसरे एमाओवादी की जनक्रान्ति अब धनक्रान्ति मेंपरिवर्तन हो गई है, ऐसा जनता और उनके दल के कार्यकर्ताओं को लगता है। एमाओवादी के हेटौडÞा सम्मेलन के समय से ही उनके कार्यकर्ताओं में इस बात की चर्चा शुरु हो गई थी कि कहने को तो हमारे नेता र्सवहारा का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन व्यवहार में इनका जीवन यापन किसी भी अन्य दलों के नेताओं2013 nepal ca election
से कम विलासितापर्ूण्ा नहीं है। जबकि अभी भी इनके बहुत सारे कार्यकर्ताओं को दो जून की रोटी भी आसानी से उपलब्ध नहीं होती है। जहाँ तक मधेशी दलों की बात है उनकी दर्ुदशा का कारण है, सत्ता लोलुपता। अधिकांश मधेशी नेता मधेश और मधेशी को भुला कर सत्ता पाने को आतुर दीख रहे थे। परिणाम यह हुआ कि जितने नेता उतने दलों का निर्माण हो गया। यदि कोटा के तहत कुछ मधेशियों को उच्च पद पर पदस् थापित किया भी गया तो यह छनौट योग्यता के आधार पर नहीं की गई। इन नियुक्तियों से या तो जातिवाद या फिर पैसों की बू आ रही थी। इन्हीं सभी बजहों से एमाओवादी और मधेशी दलों को इसका ामियाजा भुगतना पडÞा। यंू तो नेपाली कांग्रेस और एमाले अपनी जीत पर खुशियां मना रहे हैं लेकिन स्पष्ट है कि उनकी जीत का भी कारण जनआधार नहीं बल्कि नकारात्मक मत ही है क्योंकि जनता के पास दूसरा कोई भी विकल्प नहीं था। चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों, इतना तो तय है कि
नेपाली राजनीति में माओवादी शक्ति को नकार ा नहीं जा सकता है, जिन्होंने चुनाव में भाग लिया या फिर चुनाव का बहिष्कार किया। ऐसे में सवाल है कि माओवादी शक्ति को अनदेखा कर संविधान निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढÞाया जा सकता है। कुछ विश्लेषकों के द्वारा प्रो. नवीन मिश्रा @ आम चुनाव २०१३
की औचित्यता एमाओवादी और मधेशी दलों से जनता नाखुश थी तो कांग्रेस और एमाले के पक्ष में भी कोई लहर नहीं थी। कांग्रेस का पहले स्थान में आना और
एमाओवादी का तीसरे स्थान में आना उतना अप्रत्याशित नहीं है, जितना की एमाओवादी और मधेशी दलों को इतना कम सीट प्राप्ता होना। हिमालिनी l दिसम्बर/२०१३ ठ विश्लेषण इस चुनाव परिणाम को परिवर्तनकारी शक्तियों पर यथास्थितिवादी शक्तियों के जीत के रूप में देखने से भी चुनाव निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होना लाजिमी है। चुनाव में धांधली की व्यापक चर्चा से मन में शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक था। चुनाव में मेरी संलग्नता नाम मात्र की थी। मैने कुछ ऐसे
लोगों से बात की जो चुनाव से लेकर मतगणना तक में सक्रिय थे। सभी तो नहीं लेकिन कुछेक बातें पाठकों के समक्ष रखना चाहूँगा। एक युवा कार्यकर्ता का कहना था कि मतपेटियों से कुछ ऐसे मतपत्र बरामद हुए जिनमें अधकट्टी भी संलग्न था। विरोध करने पर उन लोगों को बल प्रयोग कर मतगणना से बाहर कर दिया गया।
चुनाव आयोग ने चुनावी धांधली की जांच कर ने सर्ेर् इन्कार करते हुए, न्यायलय का रास्ता दिखा दिया है और अपना पल्ला झाडÞ लिया है। सच्चाई जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि अगर एमाओवादी और मधेशी दलों से जनता नाखुश थी तो कांग्रेस और एमाले के पक्ष में भी कोई लहर नहीं थी। कांग्रेस का पहले स्थान में आना और एमाओवादी का तीसरे स्थान में आना उतना अप्रत्याशित नहीं है, जितना की एमाओवादी और मधेशी दलों को इतना कम सीट प्राप्ता होना।
चुनाव परिणाम का विश्लेषण अन्यदृष्टिकोण के आधार पर भी किया जा सकता है। इतना तो तय है कि नेपाली नागरिकों का आकर्षा तथा विश्वास लोकतन्त्र में है। नेपाली नागरिक इतना अधिक तानाशाही शासन से त्रस् त हो चुके हैं कि वे वापस फिर उस व्यवस्था में लौटना पसंद नहीं करेंगे, भले ही राप्रपा ने तीन सीट जीत कर संविधान सभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कर ली है। नेपाल का मध्यमर् वर्ग सबसे ज्यादा लोकतन्त्र से जुडÞा दीखता है। इनकी दृष्टि में लोकतान्त्रिक व्यवस्था अर्न्तगत ही देश का कल्याण सम्भव है। पिछले चुनाव में जनता ने क्रान्तिकारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना के लिए एमाओवादी को वोट दिया था लेकिन दर्ुभाग्यवश ऐसा हो न सका। दूसरे नेपाली कांग्रेस और एमाले दोनों अपनी पराजय को स्वीकार करते हुए अपने प्रजातान्त्रिक चरि त्र का परिचय दिया था। मौका नहीं मिलने के कारण ही सही, लेकिन नेपाली कांग्रेस पछिले चार सालों में सत्ता के बारह रही है। एमाले दो बार सत्ता में आई। सबसे अधिक समय तक
एमाओवादी की सरकार रही इसलिए संविधान नहीं बना सकने का सबसे बडÞा दोषी उसे ही माना गया। इस बार के चुनाव में स्थानीय नेताओं को ज्यादा तरजीह दी गई है। कहीं न कहीं इन सभी बातों का असर मतदान पर परि लक्षित होता है। आपसी सहमति कायम नहीं कर पाने की वहज से भी कुछ दलों को पर
ाजय का सामना करना पडÞा है। इस बार का जनादेश राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक सद्भाव तथा अखण्डता के पक्ष में है, जिस को नकारा नहीं जा सकता है।
आयोग के कार्यक्रम अनुसार संविधानसभा की पहली बैठक नियमानुसार कम से कम एक महीने बाद शुरु होनेवाली है। अंदाज लगाया जा सकता है कि माघ मे पहले सप्ताह तक सर कार का गठन सम्भव ह।ै इस बीच शीषर्  नते ाआ ंे क े बीच आपसी भटंे घाट, विचार, विमशर्, नए राजनीतिक समीकरण का दौडÞ शुरु है। कुछ नेता आपसी सहमति की बात कर रह े ह ंै ता े कछु संविधानसभा और संविधान निर्माण की प्रक्रिया का विराधे करन े क े मडू Þ म ंे ह।ंै ले िकन इतना ता े तय है कि आगे का रास्ता आसान नहीं होने वाला है। आगे की राजनीति इस बात पर निर्भर करगे ी की पराजित दला ंे की क्या भू िमका हाते ी ह।ै यदि नपे ाली कागं से्र आरै एमाल े क े साथ इनकी सहमति नहीं बनती है और संख्या के बल पर कागं से्र आरै एमाल े सं िवधान बना भी लते े ह ंै ता े यह दशे की राजनीति म ंे कितना व्यावहारिक होगा, यह कहना मुश्किल है। इतना ही नहीं आने वाल े दिना ंे म ंे कागं से्र आरै एमाल े क े बीच कसै ी समझदारी बनती है, देश की राजनीति इस पर सबसे अधिक निर्भर होगी। विचारणीय है कि राजनीतिक दलों को यह जनादेश संविधान बनाने के लिए दिया गया है या फिर सरकार चलाने के लिए। आज देश को संविधान की आवश्यकता है। कांग्रेस और एमाले
के बीच सहमति बन जाती है तो सम्भव है कि एक आधा और दलों के मिलाने से संविधान निर्माण का रास्ता आसान हो जाए। लेकनि कांग्रेस एमाले में सहमति बनती है या फिर दोनों दल अपनी अपनी सरकार बनाने के लिए प्रयास करते हैं, यह देखना होगा, क्योंकि एमाले भी कांग्रेस से बहुत पीछे नहीं है। वामपन्थी
शक्तियों में अगर सहमति बन जाए अर्थात् एमाले और एमाओवादी अगर आपस में मिल जाए तो फिर यह बडÞी शक्ति बन कर उभर सकती है। वास्तव में तीसरे स्थान पर होने के बावजूद भी चाभी एमाओवादी के पास है। वह कांग्रेस या एमाले जिसके साथ जाएगी पलडÞा उसका भारी। जैसा कि कहा जा रहा है कि एक वर्षमें संविधान बन जाएगा, तो एक सम्भावना यह भी नजर आती है कि कहीं कांग्रेस और एमाले के बीच ६-६ महीने के लिए प्रधानमन्त्री पद पर समझौता किया जाए। इसी उठा पटक के पहले नये जनादेश के अनुरूप नये राष्ट्रपति चूनने की भी बात उर्ठाई जा रही है। हालांकि कुछ नेता वर्तमान राष्ट्रपति क े बचाव म ंे उठ खड Þे हएु ह।ंै ले िकन बहमु त किसका है, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। बात इतना तुल पकडÞ चुका है कि अब विधिवेत्ता भी इसक े पक्ष आरै विपक्ष म ंे अपना मत पक्र ट कर रह े ह।ंै अगर सं िवधान निमार्ण् ा जल्द हा े जाता ह ै तो अभी राष्ट्रपति बदलने की बात बेमानी है,
क्यांेि क इसक े लिए सं िवधान म ंे सशं ाधे न करना पडÞ सकता है लेकिन अगर पिछली संविधानसभा की तरह सं िवधान निमार्ण् ा म ंे इस बार भी दरे हर्इर्ु तब इस मसले पर विचार किया जा सकता है क्यांेि क अधिकाशं दशे ा ंे म ंे राष्टप्र ति का कायर्क ाल पाचँ वषार् ंे का ही हाते ा ह,ै जा े परू ा हा े चकु ा ह।ै सहमति बनती है और शाम होते होते बिखर जाती है। अपने ही बयान को सुविधा और अनुकूलता के अनुरूप बदल देना नेपाली राजनीकि नेताओं की फितरत है। ऐसे में कोई भी आकलन करना अभी निराधार है। एक तरफ जीत की खुशी है तो दूसरी तरफ हार का
आक्रोश। इस परिस्थिति में जनमत का कदर कितना होता है, यह कहना कठिन है। समय की मांग है कि अपनी जीत की खुशी तथा हार के आक्रोश पर संयम रखते हुए दोनों पक्ष अपने विवेक का प्रयोग करें, जिससे जल्द से जल्द संविधान निर्माण हो सके तथा देश को नई दशा दिशा मिले।

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