आर्थिक मार में मधेश की जनता

मधेशी २४० वर्ष से शोषित होते आ रहे है । मधेशी पहले भी समानता के लिए विभिन्न कालखण्ड में आन्दोलन में सहभागी होते रहे है । फिर भी इन्हें भैया, धोती, मधिसे, बिहारी, विखण्डनकारी कहकर अपमानित किया जाता रहा है

मुरली मनोहर तिवारी :मधेश आंदोलन अर्ध वर्ष पूरा करने लगा है । किसी सबल मुल्क में एक दिन की बंदी भी बहुत अर्थ रखती है, मात्र एक दिन की बंदी में कई तख्त बदलने के उदाहरण मिलते हैं । दरबार हत्याकांड, जनयुद्ध, संक्रमणकाल, भूकंप त्रासदी और मधेश आंदोलन, इन सब में जितनी क्षति हुई उतनी क्षति विश्व के किसी देश में हुआ होता तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता । मगर नेपाल इतने लंबे बंद हड़ताल के बाद भी ऐसे ऐंठ के खड़ा है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो । ये ऐंठन, ये जिद सिर्फ इसलिए है कि नेपाल के पास खोने को कुछ बचा ही नहीं है । कहते है कि नंगा नहाएगा क्या, और निचोड़ेगा क्या ?
खस सोच है कि आंदोलन विखण्डनकारियों की है । इस कारण राज्य को चरम शक्ति का प्रयोग करके राष्ट्रीय अखण्डता कायम रखना चाहिए ।
मधेशी नेता भारत के इशारा में नाकाबन्दी करके पहाड़ को दुख देना चाहते हंै । इसे सफल नहीं होने देना है । मधेशी को एक इञ्च का हक अधिकार नहीं मिलना चाहिए । ये बिहारी–भारतीय हैं । ये हिंदी बोलते हंै । इन खस को ये भी पता नहीं कि भाषा को सीमा में सीमित नहीं किया जाता । भारत में ही कई भाषा प्रयोग होते हैं । नेपाल से ज्यादा गोर्खाली भाषी भारत में रहते हैं ।
मधेश आंदोलन और नाकाबंदी का केंद्र बिंदु पर्सा (बीरगंज) है । बीरगंज के प्रतिष्ठित समाजसेवी और ब्यापारी ओम प्रकाश सिकारीया आंदोलन के असर को बताते है, आंदोलन के कारण जो पुराने माल थे, वे तो निकल गए, नए माल आए नहीं, व्यापार ठप्प है । तनखाह और किराया तक देना मुश्किल है । जो दिहाड़ी कर्मचारी थे उनके भूखे मरने की नौबत आ गई है । कुछ लोग तस्करी या अन्य नाका से माल मंगा रहे है, लेकिन हमारा संपर्क बीरगंज से मात्र जुड़े होने के कारण, हम वो भी नहीं कर सकते । सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि बीरगंज के माध्यम से पूरे नेपाल में माल भेजा जाता था, अब दूसरे नाका से सप्लायर तैयार हो रहे हैं । जो सप्लायर एक बार मार्केट पकड़ लेंगे फिर बीरगंज का व्यापार कभी प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएगा ।
दुगड़ ग्रुप के जॉन डिअर ट्रैक्टर के बीरगंज प्रभारी वेद प्रकाश शर्मा कहते हैं, हम किसान की सेवा करते है, मगर इतने लंबे बंदी के कारण किसान के पास पैसे नहीं है, ना ही हमारे पास ग्राहक है, ना सामान है । हमने किसानो की सुविधा के लिए इंजीनियर, डेंटर, मेकैनिक और कई कर्मचारी रखे हंै, अब उनका तनखाह देना भी भारी पड़ रहा है । बीच में कभी आंदोलन हल्का भी होता है, तो माल का आर्डर देने से लेकर मंगाने में महीने भर का समय लगेगा, तब तक फिर कुछ नया हो जाता है । अब भारतीय ट्रांसपोर्टर नेपाल का नाम सुनकर मना कर देते है । अब बीरगंज को इस त्रासदी से निकलना मुश्किल है ।
ट्रेक्टर से ढुवानी व्यवसाय करने के लिए पर्सा के गदियानी के गरीब राउत के आँसु रुकने का नाम नहीं ले रहे है । बैंक से लोन लेकर ट्रेक्टर खरीदा, पांच महीना से बंदी और तेल अभाव के कारण ट्रेक्टर खड़ा ही रह गया । दाना–पानी तक चलना मुश्किल है ऊपर से अब बैंक वाले किस्त नहीं भरने के कारण ट्रेक्टर जफ्त करने को कहते है । मेरा तो सब बर्बाद हो गया ।
मोमो ब्यवसायी मणिलाल ढुंगेल कहते है, मोमो को हमेशा गर्म करते रहना पड़ता है, जिसमे गैस की खपत ज्यादा होती है, अब गैस ही नहीं मिल रहा । पांच हजार में ब्लैक में खरीदना पड़ता है, पर ग्राहक को पुराने रेट में ही बेचना है । हमें कुछ बचता ही नहीं । पहले इंडिया से बहुत लोग आते थे, अब पूरा दिन खाली जाता हैू ।
शिक्षक रामचंद्र कुर्मी कहते है, विद्यालय बंद था, अब सिलेब्स पूरा करने में दिक्कत हो रही है, जैसे तैसे पूरा तो हो जाएगा, परंतु ऐसे पढ़ाई से बच्चे प्रतिस्पर्धा कैसे कर पाएंगे ? माधो चौहान कहते है, दूध व्यापार के लिए निजी कर्ज लेकर गौशाला का आधा निर्माण कराया, अब निर्माण भी रुक गया, काम शुरू भी नहीं हुआ, और ब्याज बढ़ते जा रहा है । मेरा काम तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया ।
पुष्पा पांडेय समाजसेवी और कुशल गृहणी हंै, कहती है, मेरे पति नौकरी के सिलसिले में बाहर रहते है, बच्चे भी बाहर पढ़ाई करते हंै, मैं घर पर अकेली रहती हँु, हमेशा भय लगा रहता है, पता नहीं कब क्या हो जाए । तस्करी को अपना व्यवसाय बना चुके सुरधन कहते हैं, ये आंदोलन ऐसे ही चलता रहे, मैं कुछ पैसे लेकर लोगो की जरूरत पूरा करा रहा हँु तो बुरा क्या है । इसके लिए हमें बहुत रिस्क उठाना पड़ता है । नेपाली रुपया का कमीशन देकर इंडियन रुपया करना होता है, फिर भारत के थाना, पेट्रोल पम्प, एस एस बी, फिर नेपाली पुलिस और सशस्त्र को मिलाकर तेल लाते है । ये तो समाजसेवा है ।
रक्सौल में कपड़ा व्यापारी चमन लाल कहते हैं, इस आंदोलन से क्या होगा ? मधेशी बेकार में ये कर रहे है, कुछ मिलने वाला नहीं है । अपने हालत के लिए मधेशी खुद जिम्मेवार है, जब हिंदी हटाई गई तब ये चुप रहे, इसी तरह चुप रहते–रहते पहाड़ी हावी होते गए । कांग्रेस, एमाले को इन्हीं लोगों ने वोट दिया अब भुगतो । भारत को क्या पड़ी है कि इनकी मदद करे । इन्हीं लोगो ने हमारे सीमा स्तम्भ गायब किया । जब चीन यहाँ आएगा हमें लड़ना होगा लड़ेंगे, भारत मधेशी के भरोसे नहीं है । हमारे लिए तो पहाड़ी ही अच्छे है । खूब खरीददारी करते है, मुंहमांगी कीमत देते हैं ।
ग्रामीण अमिका साह गोड़ कहते हैं, आंदोलन तो हमारे लिए है, दुःख–सुख तो चलता ही रहता है, भूकम्प की समस्या दैविक थी, वो हमारे वश का नहीं था, पर मधेश समस्या को सरकार ने जन्म दिया है । हम इससे लड़ ही रहे थे कि भारत ने भारत में जाने वाले नेपाली गाड़ी को रोक दिया । हमलोगो की रिश्तेदारी बिहार के दूरदराज के गांव में है, अब वहाँ कैसे जायेंगे ? भारत किस बात का बदला ले रहा है ?
चिकित्सा से जुड़े जयमोद ठाकुर कहते हैं, बंदी के कारण मरीजों का अस्पताल पहुँचना भी मुश्किल हो गया है, बुनियादी दवा तक उपलब्ध नहीं है । हलाकि बंदी से पहले भी हालात इससे बेहतर नहीं थे । विश्व स्वास्थय संगठन के निर्देश के बावजूद अपेंडिक्स जैसे बीमारी के इलाज के लिए भी सरकार द्वारा मोटी रकम वसूली जाती रही है । दुर्घटना के घटना में भी पहले टिकट कटवाने के बाद मरीज से ही दवा मंगवाया जाता है । जो लोग आंदोलन से परेशानी का दुखड़ा रो रहे हंै, उन्हें स्मरण होना चाहिए कि बंदी से पहले भी हालात इससे बेहतर नहीं थे ।
जयमोद आगे कहते हैं, श्रीलंका में २७ वर्ष का संघर्ष हुआ, सोमालिया, सीरिया, भारत के पूर्वी राज्य और काश्मीर, इजरायल फिलिस्तीन इन सब जगहों पर व्यापार कैसे हो रहा होगा ? जो लोग आंदोलन में ब्यापार का नुकसान का रोना रो रहे है, वे स्वार्थी है, उन्हें पैसे दिखते है शहीदों की कुर्बानी नहीं दिखती । सरकार भन्सार बंद से अरबो का अनुमानित घाटा तो दिखाती है पर तस्करी का आमदनी क्यों नहीं दिखाती ? बंदी से पहले भी कर्मचारियों के मिलीभगत से राजस्व को चुना लगते आया है । ये सारे कार्य सरकार के इशारे पर हो रहे हैं । नया भन्सार लगभग तैयार है, सरकार नाकाबंदी के विकल्प में उसे खोलने का हथकंडा अपना रही है । मधेशी मोम की तरह है, कोई भी झांसा देकर पिघला लेता है, मधेशी नेता इतने कमजोर है की कभी भी, कही भी झुक जाते हैं ।
मधेशी २४० वर्ष से शोषित होते आ रहे है । मधेशी पहले भी समानता के लिए विभिन्न कालखण्ड में आन्दोलन में सहभागी होते रहे है । फिर भी इन्हें भैया, धोती, मधिसे, बिहारी, विखण्डनकारी कहकर अपमानित किया जाता रहा है । संविधान में शोषण को संस्थागत करने वाला धारा पास किया गया है, पूर्व के सामान्य सम्झौता को भी जगह नहीं दिया गया है । सांकेतिक विरोध से लेकर विश्व के अब तक के शांतिपूर्ण आन्दोलन के स्वरूप अनुसार मधेश ने आंदोलन किया लेकिन बहरे और कुम्भकर्ण सरकार को सुनाई नहीं दिया । कोई नेता आएं या न आए ये आन्दोलन आम मधेशी ने शुरु किया है और अभी भी जारी है । राज्य सम्प्रदायिकता और अराजकता फैलाना चाहती है । मगर मधेश गम्भीर और संयमित है ।
ये पहाड़–मधेश–व्यापारी बीच की लडाई नहीं है । ये शोषक सत्ता की अपरिपक्वता और शोषित जनता की परिपक्वता का संघर्ष है । ये केवल मधेश के मांग के लिए ही नहीं, उत्पीडि़त हरेक समुदाय की आवाज है । आन्दोलन के कारण कष्ट तो है मगर जिस प्रकार प्रसव की पीड़ा कष्टकारी तो होती है लेकिन उस पीड़ा में नए जीवन के उदय का सुख भी छुपा रहता है, आंदोलन की पीड़ा भी प्रसव पीड़ा की तरह है जो नए सूर्य उदय का सुख समेटे हुए है ।

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