आर्थिक संकट में बुरे फंसे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का ‘जॉब’ संकट

आर्थिक संकट में बुरे फंसे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के दोनों सदनों के समक्ष जो भाषण दिया, उसे अब ‘जॉब-जॉब-जॉब स्पीच’ कहा जा रहा है, क्योंकि 32 मिनट के भाषण में उन्होंने 37 बार जॉब शब्द कहा।
इसके बाद नंबर आता है ‘यह जॉब्स बिल पास कीजिए’ की उस अनुरोधपूर्ण याचना का, जो उन्होंने अपने भाषण के दौरान 16 बार की। लेकिन दुख की बात यह है कि उनके भाषण का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक नौटंकी से बढ़कर कुछ नहीं था।
इससे भी दुखद बात यह है कि ओबामा ने एक बड़ा मौका गंवा दिया। वे इस अवसर पर अमेरिका को यह भी बता सकते थे कि वे विफल क्यों रहे हैं और मुश्किल की इस घड़ी में रिपब्लिकनों की नीतियों ने उनका जीना दुश्वार क्यों कर रखा है।

आंकड़े कहते हैं कि आज अमेरिका में एक करोड़ 40 लाख बेरोजगार हैं या उसकी बेरोजगारी दर 9.1 फीसदी है, लेकिन इसके बावजूद ये आंकड़े उस भयावह आर्थिक संकट के बारे में पूरी तरह से नहीं बताते, जो आज अमेरिका में व्याप्त है।
अमेरिका की सरकार कर्ज में डूबी हुई है। कुछ अर्थशास्त्री कहते हैं कि जब उन लोगों को भी गिनना शुरू कर दिया जाएगा, जिन्होंने काम की तलाश छोड़ दी है या पार्ट-टाइम से काम चला रहे हैं तो बेरोजगार की तादाद तीन करोड़ तक पहुंच जाएगी।
फिलवक्त ओबामा के समक्ष सबसे बड़ा ‘जॉब संकट’ तो उनका स्वयं का है और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के जिन लोगों का वे समर्थन चाहते हैं, वे इसी फिराक में हैं कि अगले चुनाव के बाद खुद ओबामा बेरोजगारों की श्रेणी में आ जाएं।
अलबत्ता कई विश्लेषकों और कुछ अर्थशास्त्रियों ने ओबामा के 447 अरब डॉलर के नए जॉब प्लान की प्रशंसा जरूर की है। यहां तक कि उनकी मीनमेख निकालने वाले अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने भी माना कि वे ओबामा की योजना से चकित हैं। उन्होंने कहा कि जितनी वे अपेक्षा कर रहे थे, यह उससे कहीं साहसी कदम है।

लेकिन इसके बावजूद ओबामा की योजना में बुनियादी खामियां हैं। इस योजना की सबसे बड़ी खामी तो यही है कि यह इतनी दीर्घकालिक है कि इस बात की गुंजाइश कम ही है कि वह ओबामा की स्वयं की नौकरी बचाने में सफल सिद्ध हो पाएगी।

हालांकि ओबामा स्वयं इसे लेकर आशान्वित हैं कि इससे जीडीपी में दो प्रतिशत अंकों का इजाफा होगा और 15 लाख नौकरियां सृजित होंगी। लेकिन इसके बावजूद अगले वर्ष के चुनाव तक बेरोजगारी की दर आठ फीसदी से ऊपर ही रहेगी और अमेरिका का इतिहास गवाह है कि इतनी ऊंची बेरोजगारी दर के साथ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी भी राष्ट्रपति का चयन दूसरे कार्यकाल के लिए नहीं किया गया है। इतना ही जरूरी सवाल यह है कि पैकेज के लिए पैसा कहां से आएगा?
ओबामा की अनुनय-विनय के बावजूद रिपब्लिकन अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए। स्पीकर जॉन बोएनर ने ओबामा की कर वृद्धि की योजनाओं को खारिज कर दिया और व्यावसायिक सफलता पर अंकुश लगाने वाले नियमों में कतरब्यौंत की मांग कर डाली।

रिपब्लिकनों का एक धड़ा कहता है कि वे कर वृद्धि का समर्थन नहीं करेंगे, जबकि बोएनर का कहना है कि जॉर्ज डब्ल्यू बुश की करों में कटौती की योजना को आगे बढ़ाने में नाकामी को भी कर वृद्धि ही माना जाना चाहिए। टेक्सास के रिपब्लिकन लुई गोमर्ट पहले ही एक ‘अमेरिकन जॉब्स एक्ट 2011’ प्रस्तुत कर चुके हैं, जिनमें उत्पादक अमेरिकी कंपनियों को कर से राहत देने की बात कही गई है। यह ओबामा की नाकामियों की एक बानगी है कि वे इसी नाम का अपना बिल प्रस्तुत करने में भी मात खा गए।

देखा जाए तो ओबामा के सामने दो विकल्प थे। एक तो यह कि वे चतुराईभरा राजनीतिक खेल खेलते हुए अपने विरोधियों को छका सकते थे, जैसा कि लिंडन जॉनसन बखूबी करते थे। ओबामा से सहानुभूति रखने वाले कुछ विश्लेषक कहते हैं कि वे एक ऐसी भद्र राजनीतिक अमेरिका की कल्पना करते हैं, जिसका अब कोई अस्तित्व नहीं रह गया है।

आज रिपब्लिकन सत्ता में वापसी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, फिर चाहे उन्हें ओबामा या फिर अमेरिका के भविष्य को ही दांव पर क्यों न लगाना पड़े। लेकिन यह दृष्टिकोण ओबामा को बचकर निकलने का मौका देता है, क्योंकि उनके पास स्थिति को नियंत्रित करने के अवसर थे, जिन्हें वे चूक गए
उनके समक्ष दूसरा विकल्प यह था कि वे नैतिकता की दुहाई देते और देशवासियों से कहते कि अमेरिका एक अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है और यह समय घटिया राजनीति करने का नहीं है। 1930 के दशक में फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने भी तो इतने ही भीषण आर्थिक संकट का सामना किया था।
अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले माइकल स्पेंस ने हाल ही में एक अध्ययन में बताया है कि अमेरिका ने पिछले 20 सालों में व्यावसायिक क्षेत्रों में अपेक्षानुरूप जॉब्स नहीं निर्मित किए हैं। जनगणना ब्यूरो की इस रिपोर्ट से वस्तुस्थिति की गंभीरता का पता चलता है कि चार करोड़ 62 लाख अमेरिकी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं और यह तादाद इतनी अधिक पहले कभी नहीं रही थी। दूसरे स्तरों पर भी हालात चिंतनीय हैं।

बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता खराब है। लाखों लोग आज भी हाउसिंग बूम के दुष्प्रभावों का परिणाम भुगत रहे हैं। बुनियादी ढांचा जर्जर हो रहा है। लेकिन अमीर अमेरिका मजे में है। करों की दर कम है। कॉपरेरेट मुनाफे बढ़ते ही जा रहे हैं। अमेरिका से ज्यादा अमेरिका से बाहर नौकरियां सृजित करने वाले बड़े कॉपरेरेट तब तक इस स्थिति को नहीं बदलेंगे, जब तक कि बोएनर एंड कंपनी भी उन्हें करों में छूट का वादा नहीं करती।
आज अमेरिका अनेक दुश्चक्रों में फंसा हुआ है। वास्तव में संकट की यह स्थिति ओबामा के लिए एक नायक की तरह उभरने का एक बेहतरीन मौका साबित हो सकती थी, लेकिन उन्होंने यह मौका गंवा दिया। उन्होंने अमेरिका से एक वादा किया था और अमेरिकावासियों ने उस वादे पर भरोसा भी जताया था, लेकिन वे नाकाम रहे।DAINIKBHASKAR

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