आलू + चना =आलोचना ! हर बात में दूसरों की मिनमेख निकालना भी एक बीमारी है

बिम्मी शर्मा, काठमांडू , १९ जनवरी

आलू चने की सब्जी हम सब खाते ही रहते है । यह सब्जी खाने में जितना मजेदार होता है इसको खाने वाले और भी ज्यादा मजेदार हो जाते है । क्योंकि आलू चने की सब्जी खाते ही इन में दुसरों की आलोचना का कीडा कुलबुलाने लगता है । आलू चने की सब्जी खाने और खिलाने के लिए कोई योग्यता और कोटा नहीं होती । पर आलोचना करने के लिए तो योग्यता और क्षमता दोनो ही जरुरी है । पर किसी, किसी को दुसरे की आलोचना करना इतना ज्यादा भाता है कि वह आगा पीछा भूल जाता है । न आलू, चने की सब्जी खाना कोई भ्रष्टाचार है न आलोचना ही हमारे संविधान में निषिद्ध है ।

जब से मधेश आंदोलन शुरु हुआ है तब से नेपाल के लोगों मे विशेष कर पहाडीयों में मधेश, मधेशी और भारत की आलोचना करने की ईनर्जी पैदा हो गई है । अब इस इनर्जी से बिजली तो पैदा नहीं हो सकता इसिलिए शोसल मीडिया, अनलाईन और अखवार में अपने मन की कलुषता को आलोचना कर के निकाल रहे हैं । सिके लाल और खगेन्द्र संर्गाला या और कोइ लेखक मधेश आंदोलन को समर्थन करने के लिए वीरगंज के मितेरी पूल में बैठे हुए आंदोलनकारीयों के पास जाते है तो इन के पेट में ऐंठन होने लगती है
शायद यह बात सभी लोग भली भांति जानते है । इसीलिए गाहे, बगाहे समय देखेगें, न माहौल बस शुरु हो जाते है आलू, चने खा कर आलेचना की भडास निकालना । यह लोग दुसरों मे नुक्स निकालना और उन से बिना बात उलझने में माहिर होते है । जिसे नेपाली मे निहुं खोजना कहते है । और यह ऐसी, ऐसी बातों कि बखिया उघेड देते है जिस से सामने वाले का कोई संबंध नही है । पर सामने वाले को इस में लपेट कर उसकी इज्जत की किरकिरी करने मे महारत हासिल है इनको ।

फेसबुक और ट्विटर में ज्यादातर वैदेशिक रोजगारी में गए हुए कम शिक्षित लोग ही हावी है । ज्ञान तो आधा, अधूरा है इनका पर आलोचना तो माशाल्लाह पूरे ज्ञान के साथ करते है पर अर्ध सत्य । कहते हैं न कि आधी भरी हुई गगरी ज्यादा छलकती है । यही हाल इनका भी है । आठ क्लास पढे हुए है, विदेश में मालिक घर और आफिस की चौकीदारी करते है । आठ, दश साल विदेश रहकर पैसा बचा कर बस खरीद लेते है और खुद चलाने लगते है । दिमाग ड्राईभर से ज्यादा नहीं है पर मन बेचारा क्या करें मानता ही नहीं । वह तो लेखक बन कर दुसरों की आलोचना करना चाहता है ।
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यही लोग ऋषी धमला को कोसते है कि सिर्फ आठ क्लास पढा हुआ यह आदमी रात दिन मीडिया में छाया रहता है । कम से कम ऋषी धमला आठ क्लास तक पढे होने के बावजुद भी एक ही फिल्ड में वर्षो से टिका हुआ है । वह दुसरों कि तरह नेपाल में पुलिस कि नौकरी छोड कर विदेशों मे चौकिदारी करने जाता है और फेसबुक के आने के बाद उस में उटपटागं लिख कर लेखक बन जाता है । उस की भी योग्यता सिर्फ आठवीं पास ही है । फिर वह किस बिना पर ऋषी धमला और किसी दुसरे की बिना पढे और समझे ही आलोचना करता है ? और उसे यह अधिकार दिया किस ने ?

अभी देश में ऐसे ही लोगों की बाढ आइ हुइ है । जब से मधेश आंदोलन शुरु हुआ है तब से नेपाल के लोगों मे विशेष कर पहाडीयों में मधेश, मधेशी और भारत की आलोचना करने की ईनर्जी पैदा हो गई है । अब इस इनर्जी से बिजली तो पैदा नहीं हो सकता इसिलिए शोसल मीडिया, अनलाईन और अखवार में अपने मन की कलुषता को आलोचना कर के निकाल रहे हैं । सिके लाल और खगेन्द्र संर्गाला या और कोइ लेखक मधेश आंदोलन को समर्थन करने के लिए वीरगंज के मितेरी पूल में बैठे हुए आंदोलनकारीयों के पास जाते है तो इन के पेट में ऐंठन होने लगती है । खुद तो बुराई के सिवाय किसी की अच्छी बातो की प्रंशसा नहीं करेगे । यदि दुसरा करता है तो इन के माथे पर बल पड जाता है । दुसरों की खुशी, सुख या वाहवाही इन को जो बर्दाश्त नहीं होती ।

किसी ने अपने फेसबुक या टाईम लाईन पर आन लाईन पर आई हुई किसी दुसरे का लिखा कोई समाचार शेयर करता है तो वह उसी का लिखा मान कर उस पर विवाद करने लगते है । किसी ने धर्म के बारे में अपनी व्यक्तिगत धारणा टाईम लाईन में लिख कर रखी तो उसी मे शुरु हो जाते है । विवाद और झगडे इनकी नश, नश मे है । रक्त की जगह इनकी नशों पर आलोचना ही बहता है । खुद क्या लिख रहे हैं और क्या कर रहे हैं इस पर ध्यान नही देते । पर दूसरा कहां गया, किस के साथ मिला और फेसबुक और टाईम लाईन में क्या लिखा है इस पर पूरी नजर रखते हैं ।

किसी कि आलोचना करने वाले यह भी नहीं देखते है कि जिस की आलोचना कर रहे हैं वह बिमार है या कोई अवसाद ग्रस्त । बस हाथ में पत्थर आया नहीं उस को फेंकना जरुरी है । पत्थर कहां पर फेंक रहे हैं और वह किस को लग रहा है ईस से कोई मतलब नहीं । बस दुसरों को उस पत्थर से मारना है । हात में पेन है या कम्प्यूटर की किबोर्ड पर उगंलियां है तो इस का मतलब किसी के बारे में आधा, अधूरा और सुनी हुई अफवाह को लिख कर या टाईप कर के अपने अपनी आत्मा की प्यास बुझाते है ।

कभी, कभी लगता है यह आलोचना करने वाले की रुह मर कर भी अशातं ही रहती होगी । इन की आत्मा मरने के बाद भी उन्ही लागों के पास भटकती और डराती होगी जिन की यह हमेशा आलोचना करते रहते हैं । आप को कोई बात किसी कि पसंद नहीं आई तो सही ढंग से कहिए । विरोध भी कीजिए पर तरीके से । पर यह क्या आप तो दूसरों सें दमनी करने पर तुले हुएं है । दूसरों को गाली देना और उस के बारे में बुरी अफवाह फैलाना कहां तक उचीत है । जब आप का खुद का घर शिशे का बना हुआ है तो दूसरों को पत्थर क्यों मारते हैं ? यह मत भूलिए कि पत्थर दूसरों के पास भी है वह भी आप और आप के शीशे के घर में फेंक सकता है । तब क्या होगा कभी सोचा है आप ने ?

आलू, चना की सब्जी ज्यादा खाने से बदहजमी हो जाती है और पेट भी खराब हो जाता है । इसी लिए आलू, चना कम खाइए और आलोचना भी कम कीजिए नहीं तो लेने के देने पड जाएगें आप को । हर बात में दूसरों की मिनमेख निकालना और आलोचना करना एक बीमारी है । तटस्थ और सिंसियर रहने से आप के जेब से कुछ नहीं जाता और न आप के बाप, दादा की संपति से ही कुछ खर्च होता है । इसीलिए आलोचना की सब्जी ज्यादा मत खाइए यह गरिष्ठ होता है । आपको पचेगा नहीं । (व्यग्ंय )

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