आषाढ़ का वह दिन

prakash upadhya

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय

आषाढ के महीने को आकाश में मंडराते और गरजते हुए बादल और जमीन पर बरसे हुए पानी से निकलती खुशबुओं से भरा महीना माना जाता है । यह ऐसा महीना है जो किसानों को खेतों में फसल लगाने को प्रेरित करता है तो वन्य प्राणियों में खुशी का संचार करता है । कोयल अपनी मधुर तान और मयूर अपने नृत्य से वातावरण में रसरंग भरने का काम करते हैं । लेकिन देश की कुछ घटनाएँ राष्ट्रीय महत्व के और इतिहास के विषय बन जाते हैं तो कई घटनाएँ राजनीतिक दावपेंंच के कारण धूल की परतों से ढक जाया करती हैं ।
नेपाल के इतिहास में एक ऐसी ही घटना घटी थी वि.सं. २०४२ साल आषाढ ६ गते (२० जून सन् १९८५) के दिन, जिसे अब देश गणतंत्रमय होने के बाद भी एक सामान्य घटना के रूप में विस्मृति का विषय बना दिया गया है । यद्यपि इस घटना ने राजधानी काठमांडू को ही नही संपूर्ण देश को दहलाकर रख दिया था और सारा विश्व इस घटना से अचंभित हो उठा था । उन दिनों विद्यमान सुरक्षा प्रवंधों को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार की घटना का होना सरकार से लेकर आम लोगों तक के लिए विस्मय की बात थी । यहाँ यह कहना भी अतिरेक नही होगी कि इसी के जग पर वि.सं.२०५२ साल फागुन के महीने में जन विद्रोह का बिगुल बजाया गया, जिसे बाद में जन युद्ध का नाम दिया गया । क्योंकि देश में पंचायत की जो शासन व्यवस्था थी उसमे निरंकुशता की प्रचुरता थी ।
सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था होने के बावजूद शाही महल नारायणहिटी दरबार के निकट ही अवस्थित अन्नपूर्ण होटल के अतिरिक्त विभिन्न महत्वपूर्ण स्थलों और देश के विभिन्न भागों पर ‘गणतंत्र की घोषणा करो’ के सिंहनाद के साथ एक ही बार बमों का विस्फोटन होना एक अकल्पनीय घटना थी । इस घटना से जहाँ सरकार की नींद गायब हो गई वहीं जनता इस घटना के पीछे की शक्ति के संबंध में कई प्रकार की अटकलें लगाने लगी । स्थिति उस समय स्पष्ट हुई जब इसकी जिम्मेवारी नेपाल जनवादी मोर्चा के अध्यक्ष एवं गणतंत्रवादी नेता रामराजा प्रसाद सिंह ने ली ।
रामराजा प्रसाद सिंह प्रजातंत्रप्रेमी परिवार से संवद्ध एवं बहुदलीय व्यवस्था के समर्थक पर राजतंत्र के कट्टर विरोधी और गणतंत्र के प्रति समर्पित एक निष्ठावान् योद्धा थे । तत्कालीन राजा वीरेन्द्र के द्वारा वि.सं.२०३६ जेठ १० गते के दिन की गई घोषणा के अनुरूप वि.सं.२०३७ साल बैशाख २० गते के दिन पंचायती शासन के द्वारा आयोजित जनमत संग्रह में पंचायती व्यवस्था के द्वारा की गई धाँधली के फलस्वरूप तत्कालीन व्यवस्था को मिली निरंतरता ने रामराजा की इस मान्यता को पुष्टि प्रदान की कि जब तक देश में राजतंत्र रहेगा, तब तक प्रजातंत्र के उदय की संभावना क्षीण ही रहेगी । अतः सशस्त्र संघर्ष का सहारा लिए बिना गणतंत्र के लक्ष्य की पूर्ति नही होगी । इसी मान्यता ने उन्हें सशस्त्र क्रांति के मार्ग में अग्रसर किया और इसी का प्रतिफल था वि.सं.२०४२ साल आषाढ ६ गते की पूर्वोक्त घटना ।
इस घटना के बाद वह और उनके सहयोगीगण भूमिगत हो गए ।
रामराजा प्रसाद सिंह के अतिरिक्त उनके भाई लक्ष्मण प्रसाद सिंह, पार्टी के उपाध्यक्ष खेमराज भट्ट मायालू के अतिरिक्त कई कार्यकर्ता पड़ोसी देश में निर्वासित जीवन बिताने लगे । स्थिति उस समय भयावह हो गई जब इस घटना की जाँच के लिए खड़ी की गई विशेष अदालत ने रामराजा प्रसाद सिंह, लक्ष्मण प्रसाद सिंह,विश्वेश्वर मण्डल (शेखर) और प्रेम बहादुर विश्वकर्मा को इस घटना के लिए दोषी घोषित करते हुए फाँसी की सजा के अतिरिक्त उनकी सारी संपत्ति का हरण और खेमराज भट्ट मायालू को सर्वस्वहरण के अतिरिक्त आजीवन कारावास की सजा सुनाई । इसके अलावा पवन कुमार साह, विश्वनाथ चौधरी और शिव कुमार विश्वकर्मा के लिए भी जन्म कैद की सजा निर्धारित की गई । रामराजा प्रसाद सिंह के ज्येष्ठ सुपुत्र मनोज कुमार सिंह को इस घटना में संलग्न होने के अभियोग में दस वर्ष की कारावास की सजा तो अन्य को पाँच से लेकर बीस वर्ष तक की सजा सुनाई गई । इस प्रकार इस घटना से संबद्ध नेपाल जनवादी मोर्चा के उपर भी प्रतिवंध की घोषणा की गई ।
सप्तरी जिले के कोइलाडी गाँव में वि.सं. १९९२ साल आश्विन ३० गते के दिन रामराजा प्रसाद सिंह का जन्म जयमंगल प्रसाद सिंह और चन्द्रकला देवी के पुत्र के रूप में हुआ था ।
संभ्रांत परिवार में जन्म होने के कारण उनके लालन पालन और शिक्षा दीक्षा में कोई कमी नही थी । दिल्ली विश्वविद्यालय में पढते हुए उनमें उत्पन्न क्रांति की आग ने उन्हें बर्मा के टापू में अंतर्राष्ट्रिय गुरिल्ला नेता चे ग्वेवारा से मिलने को प्रेरित किया तो पटना में हो रहे अखिल भारतीय काँग्रेस कमिटी की बैठक में श्रीमति इन्दिरा गाँधी से मिलकर ‘अपने त्रस्त पडोसी नेपाल को न भूलने’ का परचा देने से नही रोका । ं
राजा महेन्द्र के द्वारा वि.सं. २०१७ साल पौष १ गते के दिन प्रजातंत्र की हत्या करते हुए की गई ‘कू’ के कारण शिक्षा पूरी कर स्वदेश लौटने पर वह संवैधानिक प्रक्रिया के द्वारा राजनीतिक सुधार लाने के प्रयास में संलग्न होने लगे । लेकिन पंचायतकालीन सरकार इसे राजनीतिक आंदोलन के रूप में देखने लगी, जो उन दिनों वर्जित थी । फलस्वरूप उन्हें जेल भेज दिया गया । रामराजा भी राजतंत्र के विरुद्ध कठोर होते गए ।
राणा शासन काल के प्रधान मंत्री जुद्ध शमशेर के छल के कारण उन्होंने ९ वर्ष की उम्र मे ही जेल की यात्रा कर ली थी । अतः जेल की सजा उनके लिए न तो नई थी और न ही उन्हें भयाक्रांत कर सकी । वहाँ वह विभिन्न योजनाओं पर विचार करने लगे । नेपाल जनवादी मोर्चा का गठन भी जेल यात्रा की ही उपज है ।
राजा के प्रत्यक्ष शासन में उन्हें निरंकुशता की बू आ रही थी । अतः राज संस्था को निर्मूल करने की नीयत से आषाढ ६ गते के विष्फोटन को एक सांकेतिक घटना के रूप में प्रशासन के सामने लाने का उन्होंने फैसला किया । लेकिन प्रशासन ने जो रुख अपनाया और रामराजा प्रसाद सिंह को जिस प्रकार १४ वर्ष तक भूमिगत जीवन बितानी पड़ी उसके फलस्वरूप वह अपने अभियान कोे निरंतरता देने मे असमर्थ रहे । लेकिन एक दशक के बाद नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी ने जिस युद्ध का सहारा लिया उसके फलस्वरूप उनके सपने साकार हुए ।
देश में गणतंत्र के सूर्योदय को देखने का उन्हें सौभाग्य मिला । पर वह गणतांत्रिक नेपाल को संस्थागत होते नही देख पाए । वि.सं. २०६९ साल भाद्र २७ गते के दिन उनका निधन हो गया ।
नेपाल के इतिहास में वि.सं. २०५२ साल का जन युद्ध और २०६३ साल का अन आंदोलन गणतंत्र के लिए एक माइल स्टोन के रूप में अंकित तो हो गए पर २०४२ साल आषाढ ६ गते की वह घटना, जिसने २०५२ साल के जन युद्ध और २०६३ साल के जन आंदोलन के लिए मार्ग प्रशस्त किया था, इतिहास की एक भूली बिसरी घटना बनी रही, लेकिन गणतंत्र प्रेमी लोगों के लिए यह दिन आज भी एक पावन दिन के रूप में स्मरणीय है ।

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