आसान नहीं विकल्प

श्रीमन नारायण :मधेशवादी दलों का तकरीबन ६ माह पुराना सड़क –आन्दोलन एवं चार महीनों से जारी सीमा केन्द्रित नाकेबन्दी के कारण देश की माली हालत काफी खराब एवं जर्जर हो चुकी है । नेपाल की सत्ताधारी पार्टिया न सिर्फ मधेशवादी दलो को अपितु दक्षिणी पड़ोसी देश भारत को भी इसके लिए जिम्मेवार मानती रही है । भारत पर अघोषित नाकाबन्दी करने का आरोप नेपाल की सत्ताधारी पार्टियाँ हीं नही अपितु प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस भी लगाती रही है । जबकि भारत का मानना है कि यह नेपाल का आन्तरिक मामला है तथा यहाँ की सरकार एवं राजनीतिक दल मिल जुल कर वर्तमान समस्याओं का सही हल ढूंढे । नाकाबन्दी का प्रभाव राजधानी काठमाण्डु सहित देश के दूर–दराज पहाड़ी गाँव में ही नही अपितु आन्दोलनकारी मधेशियाें के रसोइघर तक पड़ता हुआ स्पष्ट रुप में देखा जा सकता है नाकाबन्दी के कारण पेट्रोल, एल.पी. गैस एवं डीजल की आपूर्ति भारत से कम मात्रा में होने के कारण नेपाल की सरकार इसका विकल्प ढूंढना चाहती है । लेकिन विकल्प ढूंढने के अबतक के प्रयास प्रभावी साबित नही हुए ।
नेपाल में इन दिनों वामपन्थियों की सरकार है तथा इसकें सहयोगी के रुप मे पूर्व राजा समर्थक पार्टी राप्रपा नेपाल भी है । ये पार्टियाँ शुरु से ही भारत के विरोध के लिए जानी जाती रही है । हाल ही में नेपाल के विदेश मन्त्री जिनके पास उपप्रधानमन्त्री का कार्यकार भी है, ने चीन का भ्रमण किया है । उनके भ्रमण के दरम्यान आठ विभिन्न विषयों पर सहमति बनी हैं । परन्तु महत्वपूर्ण विषय स्वतन्त्र व्यापार सम्झौता,विप्पा तथा इन्धन की सहज आपूर्ति जैसे मसलों पर सहमति नही बन पायी क्याेंकि चीन की सरकार को इसके लिए और अधिक वक्त चाहिए । जिन विषयों पर सहमति बन पायी उनमें चीन से जुडेÞ उच्च राजपथों का द्रुत गति में निर्माण के लिए प्राथमिकता में रखना, भूकम्प के बाद पुनः निर्माण के कार्य को द्रुत गति में आगे बढ़ाना, नेपाल के स्वतन्त्र विकास की रणनीति अनुरुप औद्योगिक विकास प्रणाली में मदद करना, दीर्घकालीन रूप मे तेल एवं गैस का व्यापार, सीमा पार विकास पर बल देना तथा विद्यमान सीमा नाकाओं के स्तर को बढ़ाना, सहमति बन चुके नाकाआें को खोलना तथा नयी नाकाआें की सम्भावना के बारे में अध्ययन करना, सीमा आर्थिक तथा व्यापार के सहकार्य के सम्भावनाओं का अध्ययन करना तथा पारवहन सन्धि एवं सीमा सन्धि के लिए सक्रिय अध्ययन कर इसमें हस्ताक्षर के लिए माहौल बनाना । नेपाल एवं चीन के बीच संखुवासभा के कीमाथांका, मुस्ताङ के कोरला, ताप्लेजुङ के ओलाङचुङगोला, दोलखा के लामावगर, गोरखा के लारके, हुम्ला के यारीङ तथा मुगु जिलाके सीमावर्ती क्षेत्रमे नाका खोले जाने पर कुछ ही पहले दोनो देशों के बीच सहमति बनी है । ये नाका रसुवा के केरुङ तथा सिन्धुपालचोक के तातोपानी के अलावे के नाकें हैं ।
इसके अलावा चीन फिलहाल नेपाल की सीमा से जुडेÞ जिलों के लिए उपहार में अतिरिक्त इन्धन देगा । इसके अलावे चीनी पर्यटकों को नेपाल नहीं जाने के लिए जारी नोटिस को चीन ने वापस लिया है सम्भवत यह निर्णय भूकम्प के कारणों से लिया गया हो सकता है । नेपाल भी चीनी पर्यटकों को प्रोत्साहित करने के लिए भीसा शुल्क माफ कर फ्री भीसा जारी करने का ऐलान किया है । चीन ने नेपाल के प्रधानमन्त्री के.पी. शर्मा ओली को अपने देश में भ्रमण के लिए दावत दिया हुआ है सम्भवतः अगले वर्ष वे चीन जा सकते हैं । वही नेपाल की राष्ट्रपति श्रीमती विद्या देवी भण्डारी की ओर से चीन के राष्ट्रपति सी जिनपीङ को नेपाल भ्रमण के लिए निमन्त्रण पत्र दिया गया । उपरोक्त सन्धियों का दूरगामी महत्व है । नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के कारण विगत ६५ वर्षो में यहा“ कोई भी एक प्रधानमन्त्री अपने पा“च वर्ष का कार्यकाल पूरा नही कर पाए हैं । ऐसी अवस्था में सन्धियों का कार्यान्वयन होना भी मुश्किल होता रहा है । मूलतः यह भ्रमण तेल एवं गैस की आपूर्ति मे चीन की सहायता के लिए केन्द्रित माना जा रहा था । अब यह दीर्घकालीन रूप में ही सम्भव हो पाएगा ।
एक विश्लेषण के अनुसार अगर अगले बीस वर्षो तक भगीरथ प्रयत्न करके चीन के साथ सड़क सहित अन्य पूर्वाधार के विकास के लिए ध्यान केन्द्रित किया जाय तो भी हम पचास प्रतिशत तक का कारोबार ही चीन के साथ कर सकते है । फिलहाल चीन से द्विपक्षीय व्यापार में नेपाल को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है । इन्धन की खरीदारी के बाद तो यह और अधिक हो जाएगा । वैसे यह आसान नहीं है ।
भारत के डिपो से आसानी से तेल ला रहे नेपाल के टैंकर को केरुङ में डिपो नहीं होने के कारण चीन के टैंकरो से पम्पीङ करके नेपाल के टैंकरो में इसे डालना काफी कठिन साबित हुआ है । चीन यह कहता रहा है कि सिगाच्छे जाकर नेपाल तेल ले आए । लाख टके का सवाल है अपनी सुरक्षा के प्रति काफी सम्वेदनशील चीन की वामपन्थी सरकार क्या चार सौ किलोमीटर की दूरी तक नेपाल के मालवाहक टैंकरों को प्रवेश करने की इजाजत देना चाहेगा ? ऊपर से दिक्कत यह भी कि नेपाल के टैंकरो मे ड्राइवर की सीट दायीं ओर होती है, जबकि चीन में बायीं ओर, नेपाली सड़कों पर बायीं ओर गाडि़यां चलती हैं जवकि चीन की सड़कों पर दायीं ओर गाडि़यां चलायी जाती हंै । चार सौ किलोमीटर की लम्बी यात्रा वह भी विपरित दिशा मे तय करना नेपाल के ड्राइवरों के लिए जोखिम से भरा होगा । दुर्घटना होने की सम्भावना बनी रहेगी ।
तिब्बत के क्षेत्रो में ठण्ड के मौसम में तापक्रम माइनस बीस डिग्री तक पहु“च जाता है । नेपाल मे चलने वाली गाडि़यां कम तापक्रम में नहीं चल पाएगी क्योंकि कड़ाके की ठण्ड में मोबिल का जम जाना और गाड़ी का स्टार्ट होना कठिन होगा । डीजल भी जम सकता है । नेपाल में अबतक उपयोग हो रहे टैंकरो के केविन मे हिडिङ सिस्टम नही भी हो सकता है कम तापक्रम मे और अधिक ठण्ड मे गाड़ी चलाना नेपाली ड्राइवरों के लिए मुश्किल होगा । चीनी टैंकरो के साथ ऐसा नही होता है क्योंकि चीन के टैंकरो के केविन मे हिडिङ सिस्टम होता है । रास्ते भर बर्फवारी होते रहने के कारण चीन की गाडि़यो मे खास किस्म के टायर लगे होते हैं जिससे बर्फ मे भी चलना कुछ आसान होता है पर नेपाल के टैंकरो मे ऐसी व्यवस्था नही है । अगर रास्ते मे गाड़ी बिगड़ जाए तो मरम्मत करना और कठिन । भारत मे बनी टैंकर ही नेपाल की सड़को पर दौड़ती रही है जाहिर है इसके पार्टपुर्जा चीन के बाजारों में नहीं मिल पाएंगे ।
केरुङ से लेकर सिगाच्छे तक के सफर में नेपाल के ड्राइवरों को भाषायी समस्या से भी दो चार होना पड़ सकता है । खास करके खाना नास्ता स्वास्थ्य उपचार या रास्ते में तेल भी भरना पड़ जाए तो भाषिक समस्या के कारण दिक्कत हो सकती है । एक दूसरे के साथ सम्वाद नही हो पाना या फिर गलत सम्वाद हो जाना नीम पर करेला चढ़ाना जैसा साबित होगा ।
दिक्कतें और भी हैं । क्या चीन नेपाल के इच्छा के अनुसार करों में छूट देने को तैयार हो सकता है ? क्या चीन हर वर्ष चार हजार करोड़ रुपये बराबर का कर छूट दे सकता है । व्यापारिक नजरिये से तो यह मुमकिन नहीं दिखता है । फिलहाल चीन के तिब्बत मे ९३ अक्टेन के पेट्रोल की कीमत ६.५ युआन है । नेपाल मे यह १०८ रुपए हो जाता है । इससे तिब्बत से नेपाल तक लाने मे खर्च बढेंगे ही । चीन सरकार का आन्तरिक कर, स्थानीय कर, भैट आदि करके ६७ प्रतिशत कर इस पर आएगा । पारवहन का खर्च तो आएगा ही । अब तक भारत के तेल कम्पनी इण्डीयन आयल का पुराना पैसा तो हमने चुक्ता किया नहीं है हमेशा उसका कर्ज बना रहता है । क्या चीन से तेल लाकर हम जनता को सस्ती दराें पर तो तेल देना दूर की बात जिस कीमत पर अबतक देते आए है वैसे ही दे पाएंगे ? शायद नही । भूकम्प की मार से जर्जर नेपाल की अर्थ व्यवस्था को मधेशवादी दलों के आन्दोलन ने और अधिक कमजोर कर दिया है । ऐसी अवस्था में सरकार तेल कम्पनी को सब्सिडी देने की स्थिति में नही है । जाहिर है चीन से तेल लाना कठिन काम है । वैसे भी नेपाल मे अबतक युरो–३ पेट्रोल का प्रयोग होता रहा है । जिसे चीन सन् २०१७ से बिक्री नही करने का निश्चय किया है । महज एक वर्ष के लिए चीन से तेल के लिए सौदेवाजी करना बुद्धिमानी नहीं होगी । चीन के द्वारा अनुदान में प्राप्त तेल को केरुङ से लाने में तो नेपाल के टैंकर ड्राइवर इस कदर परेशान हुए कि गोनु झा की बिल्ली की तरह वे अब उधर जाने का सोच भी नही बना सकते ।
नेपाल सालाना भारत से १.८ मिलियन टन का पेट्रोलियम पदार्थ से खरीद करता रहा है । मधेश आन्दोलन के बाद नेपाल आयल निगम ने पेट्रो चाइना के साथ एक तिहाई पेट्रोलियम पदार्थ खरीद करने का सम्झौता किया है । अर्थात ०.६ मिलियन टन चीन के साथ खरीद का मन बनाया है । जहा“ तक एल.पी. गैस का सवाल है तो दैनिक रुप में १८ टन वजन वाला ५० बुलेट भारत से अब तक आता रहा है । फिलहाल अगर चीन से खरीद किया जाय तो चौड़ी सड़क नहीं होने के कारण १५ टन बुलेट भी हम नही मंगा सकते हैं । इतना जरुर किया जा सकता है कि केरुङ में अगर चीन गैस फिलिङ डिपो रख दे तब कहीं जाकर वहां से सिलिण्डर में भर कर लाया जा सकता है । चीन के बाजारों में १५ टन क्षमता वाले एक गैस बुलेट की कीमत नेपाली रुपया ६६ लाख रुपये आएगी । यह कुछ सस्ती दिखाई देती है लेकिन टैक्स को जोड़ दिया जाय तो फिर हिसाब कुछ अलग ही बैठता है ।
भारत न सिर्फ हमारा पड़ोसी मुल्क है बल्कि यह बुरे वक्त का साथी भी है । दोनाें देशों के बीच के सम्बन्ध को प्रकृति ने बनाया है । वैसे भी पड़ोसी का विकल्प कहां मिलता है ? मित्र बदले जा सकते है पर पड़ोसी नही । फिलहाल उत्पन्न अवस्था को सामान्य बनाया जा सकता है । हमारी सरकार आन्तरिक समस्याओं के समाधान मे अधिक ध्यान दे । लोकतन्त्र एवं गणतन्त्र की हवा चाहे बर्फ के समान शीतल हो या आग की भा“ति गर्म इसकी अनुभूति हिमाल पहाड़ एवं मधेश के लोगों को एक समान होना चाहिए । लोकतन्त्र में गैर बराबरी के लिए जगह नही होता है । सरकार विकल्प जरुर ढूंढे लेकिन देश में जारी आन्दोलन को समाप्त कराने का, राजनीतिक अस्थिरता को दूर करने का, पटरी से उतरी देश के विकास के गति को रास्ते पर लाने का तथा नेपालियाें के बीच उत्पन्न वैमनस्यता, कटुता, तनाव एवं अविश्वास को हटाने का । भारत के साथ मित्रता नेपाल के लिए यथार्थ है । विकल्प हमेशा कमजोर ही होता है वह नेचुरल का स्थान नही ले सकता । चीन भी हमारा पड़ोसी है, पर वह भारत का विकल्प नही हो सकता ।

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