आसान नहीं हैं रास्ते

कुमार सच्चिदानन्द:अनके अनिश्चितताआ ंे का े चीरत े हएु द्वितीय संविधानसभा का निर्वाचन सफलता पर्ूवक सम्पन्न हो गया और इसके परिणाम भी आ चकु े ह।ंै इस निवार्च न क े परि णाम को अप्रत्याशित और अस्वाभाविक भी नही ं कहा जा सकता क्यांेि क विशष्े ाज्ञा ंे की बात तो दूर, घटनाक्रम पर समान्य नजर रखनेवाले संवेदनशील एवं सामान्य नागरिक भी प्रायः आश्वस्त थे कि एनेकपा माओवादी तृतीय र ाजनै ितक शक्ति क े रूप म ंे सचू ीकतृ हागंे ,े क्षत्रे ीय राजनै ितक शक्ति क े रूप म ंे मधशे ानगु ामी र ाजनैतिक शक्तियाँ अतीत के कार्यकलाप और दला ंे क े अत्यधिक विभाजन क े कारण कमजारे हागंे ी आरै रापप्र ा जसै ी दक्षिणपथं ी शक्तिया ँ आगामी सं िवधानसभा म ंे अपक्ष्े ााकतृ सशक्त उपस्थिति दर्ज करेगी। इस निर्वाचन का परि णाम भी प्रायः ऐसा ही है। अस्वाभाविक सिर्फयह है कि एनेकपा माओवादी और मधेशी दल इस शमर्न ाक अवस्था म ंे पहचँु गंे ,े इसका अनमु ान सामान्यतः लागे ा ंे न े नही ं किया था आरै न ही इन दला ंे क े नते ाआ ंे ही न े एसे ा अनमु ान किया था।maobadi leaders

यद्यपि चनु ाव परिणामा ंे क आने के बाद जिस तरह की प्रि तक्रिया इन दला ंे के द्वारा आई उससे तो यह बात तय है कि इसका सत्य आभास न होना भी चुनाव आयोग और देश के राजनैतिक भविष्य के लिए सकार ात्मक रहा। अन्यथा चुनाव जितना सफल और सहज ढंग से हो पाया, वह सम्भव नहीं था। यद्यपि अनियमितता के आरोप तो आए, जिसे शत-प्रतिशत गलत तो नहीं कहा जा सकता, ले िकन यह आरापे आम लागे ा ंे की नजर म ंे पा्र यः वसै ा ही ह ै जा े हारन े पर लागे ा ंे की सामान्य प्रि तक्रिया क े रूप म ंे आता ह।ै वसै े भी ‘हार े का े हरिनाम’ की स्थिति कबूल करने के लिए कम से कम राजनैतिक क्षेत्र आसानी से तैयार नहीं होता। होना भी नहीं चाहिए। लेकिन लोकतंत्र म ंे जनादशे का सम्मान ता े किया ही जाना चाहिए। द्वितीय संविधानसभा के निर्वाचन के बाद इसक े जा े परिणाम सामन े आए ह ंै उसम ंे किसी दल म ंे जीत का जश्न ह ै ता े कही ं पराजय का गम। पराजय क े गम की बात ता े समझ म ंे आती ह ै ले िकन जीत की खशु ी नपे ाली कागँ से्र आरै नके पा एमाल े क े खमे े म ंे ह।ै जा े खशु ी का आलम इन खमे ा ंे म ंे दखे ा जा रहा ह ै उस े अस् वाभाविक माना जा सकता है। यह सच है कि इन दला ंे की स्थिति पहल े की तलु ना म ंे बहे तर हर्ुइ है लेकिन विजय किसी को भी नहीं मिली। स्पष्ट बहुमत किसी भी दल के लिए दिवास्वप्न बनकर ही रह गया। वैसे जश्न मनाने के बहाने तो चाहिए, वह तो मिल गया है। यह सच है कि नपे ाली कागँ स्रे पनु ः एक बार दशे की बडीÞ र ाजनैतिक शक्ति के रूप उभरी है, koirala-shushil

लेकिन नेकपा एमाले ने भी लगभग समानान्तर शक्ति के रूप म ंे स्वय ं का े स्थापित किया ह।ै यह सच ह ै कि जा े परिणाम सामन े आए ह ंै उसक े अनसु ार इन दाने ा ंे दला ंे क े ऊपर सरकार स े लके र सं िवधान निर्माण तक की भारी जिम्मेवारी है। यह भी सच ह ै कि नए सं िवधानसभा क े सयं त्तु m आकँ ड ेÞ इनक े पक्ष म ंे ह।ंै सरकार स े लके र सं िवधान की धाराआ ंे तक क े लिए इन्ह ंे किसी भी दल का मोहताज नहीं होना होगा, लेकिन इन दाने ा ंे दला ंे म ंे आपसी समझ आरै तालमले की आवश्यकता ह।ै अतीत म ंे इन दला ंे क े भीतर और बाहर आपसी खींचतान की प्रवृत्ति सतह पर आती रही है, उसके मद्देनजर यह तो कहा ही जा सकता ह ै कि राह ंे इतनी आसा ं नही।ं कछु असंतुष्ट राजनैतिक शक्तियाँ संविधानसभा के अन्दर ह ंै जा े बहमु त क े बावजदू इन दाने ा ंे दला ंे क े निर्णर्य का े सहज ढगं स े चलन े नही ं दगंे े आरै विभिन्न दिशाआ ंे स े सहमति का जा े राग अठ लापा जा रहा है, इसका हश्र तो अतीत म ंे परू े दशे न े दखे ा ह ै कि छः साल म ंे पाचँ सर कार ंे बनी ं आरै अन्ततः सं िवधान निमार्ण् ा क े मलू लक्ष्य म ंे असफलता मिली। यह इस देश का यथार्थ रहा है कि देर ही सही अन्ततः हमने लक्ष्य को प्राप्त किया है। जिस तरह अनके अनिश्चितताआ ंे क े बावजदू

संविधानसभा का सफल निर्वाचन सम्पन्न हअु ा, उसी तरह हम ंे यह मान लने ा चाहिए कि नवीन संविधानसभा अन्ततः अपने लक्ष्य को प्राप्त करेगी। आखिर प्रारम्भ से ही हम निर ाशा क्या ंे पाल ंे – ले िकन पहली समस्या ता े सर कार गठन म ंे आन े की सभं ावना ह।ै माजै दू ा संविधानसभा का जो गणित है उसके अनुसार किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला है। सबसे बडीÞ पार्टर्ी  क े रूप म ंे नपे ाली कागँ से्र उभरी ह ै और इस आधार पर सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करना उनके लिए लाजिमी है, लेकिन इसकी सुगबुगाहट के साथ ही नेकपा एमाले ने समानान्तर शक्ति क े रूप म ंे स्वय ं का े घाे िषत कर दिया है और बारी-बारी से सरकार का नेतृत्व करने का दावा भी प्रस्तुत कर दिया है। अब महइभ्वपर्ूण्ा यह है कि उसके इस दावे स े नपे ाली कागँ से्र कितना इत्तफाक रखती ह।ै उसकी

विवशता यह है कि न माने तो सरकार न बने और माने तो तोल-मोल और बाँट-फाँट की शुरुआत यहीं से मानी जाएगी। वैसे सत्ता के लिए समझौतापरस्ती नेपाली राजनीति की विशेषता रही है और यह विश्वास किया जा सकता है कि समाधान निकल ही आएगा मगर इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि कटतु ा क े बीज भी यही ं स े पनपगंे े जिसका फल देश को भुगतना पडÞ सकता है। संघीयता का सवाल भावी संविधान के लिए सबसे महइभ्वपर्ूण्ा मुद्दा है। मुख्य रूप से यह माओवादी व्रि्रोह और तर्राई आन्दोलन से उठी हर्ुइ जनसंवेदना है। यह एक अप्रत्याशित सच्चाई है कि संघीयता की माँग को ऊँचाई दने े वाल े दाने ा ंे ही राजनै ितक दल एकीकतृ नेकपा माओवादी और मधेश आधारित र ाजनै ितक दल माजै दू ा सं िवधानसभा म ंे सशक्त उपस्थिति नही ं दजर्  करा पाए ह।ंै पम्र खु ता पा्र प्त करनवे ाल े दाने ा ंे ही दल उत्साहित ह ंै आरै विजय का मनेविज्ञान भी उनके साथ है जबकि इन दाने ा ंे पाटिर्य ा ंे पर सघं ीयता का विराधे ी हाने े का आरोप भी रहा है। यद्यपि संघीयता के सवाल का े दाने ा ंे ही दला ंे न े सद्धै ान्तिक रूप म ंे स्वीकार कर लिया है और अधिक अविश्वास की भी गजंु ाइश नही ं ह ै क्यांेि क माजै दू ा सन्दभार् ंे म ंे अगर कोई दल इससे फिसलने का तर्क या विचार देता है तो उसका औचित्य नहीं और इसके बिना कार्इर्े  भी सं िवधान दशे म ंे स्वीकायर्  नही ं हा े सकता। इस बात का े य े दल भी जानत े ह।ंै अब सवाल उठता है कि संघीयता के सवाल पर माआवे ादिया ंे का दृ िष्टकाण्े ा, मधशे ी दला ंे का दृ िष्टकाण्े ा आरै इन दला ंे का आपसी दृ िष्टकाण्े ा म ंे कितना तालमले हा े सकता ह,ंै इस पर आगामी संविधान की सफलता

निर्भर करती ह।ै तथाकथित पराजित इन राजनै ितक शक्तिया ंे की भावनात्मक उपक्ष्े ाा इनक े पय्र ासा ंे की निर्रर् थकता सिद्ध करेगी। आगामी सं िवधान म ंे दशे का शासकीय स् वरूप भी दला ंे क े बीच विवाद का मद्दु ा बन सकता है। एनेकपा माओवादी कार्यकारी र ाष्ट्रपति की बात करता है, जो जनता द्वार ा प्रत्यक्ष निर्वाचित हो। नेकपा एमाले प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रधानमंत्री की बात करता है, जबकि नपे ाली कागँ से्र ससं दीय व्यवस्था म ंे विश्वास कर ता है। इस दृष्टि से नेकपा एमाले तथा एकीकृत नेकपा माओवादी लगभग समान भूमि पर स् िथत ह।ंै सिर्फ  पद क े नाम म ंे अन्तर ह,ै सवं दे ना उनकी एक ह।ै नपे ाल की लाके तां ित्रक यात्रा म ंे सरकारा ंे का जा े उत्थान पतन हाते ा रहा ह ै उस े दखे त े हएु दशे म ंे स्थिर सरकार क े लिए दशे का कार्यकारी प्रमुख निर्धारित अवधि के लिए जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित होने का तर्क दिया जाता है। लेकिन अब तक का जो इतिहास र हा ह ै उसम ंे हमार े लाके तत्रं क े नायका ंे न े जिस अपरिपक्वता और अदूरदर्शिता का परिचय दिया ह ै उस े दखे त े हएु इस तरह की व्यवस्था म ंे तानाशाह के पनपने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर राप्रपा नेपाल जैसे दल की इस बार अपेक्षाकृत सशक्त उपस् िथति सं िवधान सभा म ंे दखे ी जा रही ह ै जा े स् पष्ट रूप से आलंकारिक राजतंत्र की परिकल्पना लके र आए ह ंै आरै उन्ह ंे इस बार कछु हद तक जनर्समर्थन भी मिला है। वे अपने स्तर से दबाब बनान े का पय्र ास करगंे ।े यद्यपि शासकीय स्वरूप पर मधशे ानगु ामी दला ंे क े भी अपन-े अपन े विचार ह ंै जा े मलू तः पा्र रम्भिक दा े पद्धतिया ंे के प्रति अपना विश्वास प्रकट करते है, यद्यपि शासकीय स्वरूप के प्रति इनके विचार

बहुत आवश्यक नही ं ह ंै क्यांेिक इनका मलू एजण्े डा क्षेत्रीय है। इन समस्त परस्पर विरोधी विचारधार ाआ ंे म ंे तालमले बठै ाना माजै दू ा सं िवधान सभा की चुनौती होगी। संविधानसभा के निर्वाचन के परिणाम आन े क े साथ ही दाने ा ंे पम्र खु दला ंे की र ाजनै ितक महत्वाकाक्ष्ँ ााए ँ तीव ्र हाने े लगी ह।ंै र ाष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का निर्वाचन का मुद्दा भी सतह पर आने लगा है। यद्यपि नेकपा एमाले न े सबस े बड ेÞ दल हाने े क े नात े सहमतीय सर कार का गठन का आगह्र नपे ाली कागँ से्र स े किया है। यह एक राजनैतिक सदाशयता है और मर्यादा भी। लेकिन अब उसकी निगाह नपे ाली कागँ से्र की आरे ह ै कि वह उसक े प्रि त कितना लचिला बनती है। दरअसल वह पैकेज म ंे समझातै ा चाहती ह ै आरै समस्त पदा ंे आरै अवसरा ंे का समतल्ु य विभाजन की ग्यारण्े टी भी। यह इतना आसान भी नही ं ह।ै क्यांेि क माजै दू ा राजनीति म ंे पद आरै अवसर इतना महत्वपण्ू ार्  हा े गया ह ै कि पा्र यः व्यक्तिया ंे म ंे इसकी ललक दखे ी जाती ह।ै इन दाने ा ंे दला ंे म ंे जीत े हएु सदस् या ंे की सख्ं या अधिक ह ै इसलिए महत्वाकाक्ष्ँ ाााए ँ भी अधिक लागे ा ंे क े साथ ह।ंै ले िकन अवसर निश्चित ही इस अनपु ात म ंे नही ं हागंे ।े इसलिए अवसरा ंे का सम्यक ् बटँ बारा भी इन दाने ा ंे दला ंे के बीच कटुता उत्पन्न करने के कारक तत्व हा े सकत े ह ंै आरै यहा ँ क े असन्तनु की छाया संविधान निर्माण की प्रक्रिया पर भी पडÞने की संभावना है। यह सच है कि इन दोनों दलों में विजय का उत्साह है और इस उत्साह में माओवादी तथा मधेशानुगामी दलों की पराजय भी चस्पा है। जहाँ तक माओवादियों की बात है तो नव चेतना के वाहक के रूप में उन्हें माना गया था। संघीयता का उनका स्वरूप भी इन दलों के स् वरूप से अलग है। विगत संविधानसभा चुनाव में माओवादी जो अग्रपंक्ति में दिखलाई दे रहे थे, उसका कारण था कि लोग आशान्वित थे कि वह संविधान निर्माण कर पाएगा, देश में स्थायित्व लाएगा और राष्ट्र को समृद्धि के पथ पर ले जाएगा। लेकिन कारण जो भी रहा हो इन समस्त मोर्चा पर उन्हें असफलता मिली। इसलिए उनके मतदाता अपनी पारम्परिक र ाजनैतिक शक्तियों की ओर इस चुनाव में उन्मुख हुए। जहाँ तक मधेशी दलों का सवाल है तो उनकी भी पराजय अस्वाभाविक नहीं। क्योंकि अत्यधिक विभाजन का जो त्रास ये दल झेल रहे थे और विगत में जिस तरह का कार्यकलाप इनके नेताओं ने प्रस्तुत किया उसमें इस संविधानसभा में सम्मानजनक स् थान पाना उनके लिए एक चमत्कार ही होता। लेकिन यह सच है कि इन दलों की घोर पर ाजय हो चुकी है और मौजूदा संविधानसभा का जो गणित है, उसमें मौजूदा संविधान सभा के गणितीय समीकरण हेर-फेर करने में उनकी भूमिका नगण्य हो सकती है। लेकिन उन्होंने जो मुद्दे स्थापित किए हैं, उसकी

पर्ूण्ातः उपेक्षा आगामी संविधान की र्सवस्वीकार्यता पर प्रश्न चिह्न खडÞा करेगी। एक महत्वपर्ूण्ा बात यह भी है कि इस संविधानसभा के निर्वाचन के बाद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की भी चर्चा जाडे Þ पकडनÞ े लगी ह।ै विगत सं िवधानसभा म ंे मधशे वादी शक्तिया ँ सशक्त स्थिति म ंे थी। आरै नव चेतना के तथाकथित वाहक माओवादी भी अगप्र ं िक्त म।ंे इसलिए राष्टप्र ति आरै उपर ाष्टप्र ति दाने ा ंे ही पदा ंे पर मधशे पत्रु ा ंे का चयन हुआ। इस बार की स्थिति र्सवथा विपरीत है। प्रकारान्तर से यह भी कहा जा सकता है कि मधशे न े भी खदु स े हारकर राष्टी्र य दला ंे क े साथ अपनी सहमति की संवेदना जाहिर की है। अब सवाल उठता है कि क्या ये दल नवस् थापित पर्ूव परम्परा को दुहरा कर मधेश के प्रि त अपनी कतृ ज्ञता व्यक्त करगंे े – अगर नही ं तो यहीं से मधेश के मोहभंग की जमीन तैयार होगी। इसके साथ ही आनुषंगिक सवाल ये भी ह ंै कि सघं ीयता क े सवाल पर मधशे की सवं दे ना का े समटे न े का पय्र ास य े दल करगंे े – मधशे म ंे जा े उपक्ष्े ाा का मनाे िवज्ञान ह ै उस े दरू करन े क े लिए सामाजिक न्याय की दिशा म ंे अपनी आरे स े पहल करगंे े – यह सच है कि वर्तमान संविधानसभा से जनाकाक्ष्ँ ााए ँ अधिक ह।ंै राष्ट ्र का े सत्रं mमण स े निकालना और जनता को सुशासन का एहसास कराना इनका दायित्व है और हर वर्ग की कसौटी पर खरा उतरना इनकी सबसे बडÞी चुनौती है। यह सच है कि संविधानसभा का गणित संयुक्त रूप स े इन दाने ा ंे दला ंे क े पक्ष म ंे ह ै आरै इसक े लिए बहुत खींचतान की आवश्यकता भी नहीं, ले िकन बहतु कछु इन दला ंे क े आपसी तालमले पर निर्भर करता है। यद्यपि सत्ता और स्वार्थ को लेकर इनका भी इतिहास गौरवशाली नहीं रहा है। व्यक्ति वही, मनोविज्ञान वही। लेकिन विगत की असफलता से शिक्षा लेकर इनसे सत्पथ पर गमन की आशा हम कर सकत ह।ंै सही मायन े म ंे इसी म ंे दशे का भी कल्याण ह ै आरै जनता का भी।

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