आस्था का तंत्र

सतीश वर्मा

अगर  इस बात के  ठो स आंकडे  जुटाने  की को शिश हर्इ कि धर्म के  नाम पर  कितने  लो गों को  परोक्ष-अपरो क्ष रुप से  रोजगार  मिला हुआ है , तो  आंकडे काफी चौंकाने  वाले  आएँगे । संभवतः यह आकंडे करो डो  को  पार  कर  जा एगा । जितना रो जगार  आज धर्म दे  र हा है , उतना न तो  सरकारी तंत्र औ र  ना ही निजी क्षे त्र दे  पा र हा है  । इसमें कोर् इ दो  राय नहीं हैं कि पिछले  पंन्द्रह-बीस वषोरं में तमाम सामाजिक राज नीतिक कारणों से  आर्थिक उदार वाद के  इस ओ र  धर्म के  नाम पर  र जगार  भी बहुत बढा है । धर्म औ र  आस् था का अर्थतंत्र काफी फला-फूला है  औ र  सबसे  बडी बात है  कि इस अर्थतंत्र में रो जगार  हर  मजहब के  लो गों को  हासिल हो  र हा है । दे श के  कई धार्मिक स्  थान हर  साल करो डों रुपए के  व्यापार  औ र  लाखों लोगों के  रो जगार  का जरि या है ।
एक आंकडे  के  मुताबिक वै ष्णो ं दे वी की तर्ीथयात्रा से  सलाना ४७५ करोड रुपये  की आमदानी हो ती है  औ र  २७ हजार  लो गो ं को  र  ो जगार  मिलता है  । इसी धार्मिक तर्ीथयात्रा के  कार ण यहाँ के  कर  ीबी पर्यटन स्  थाल पटनीटाँप से  भी कई लो गो ं को  अस् थायी र ो जगार  हासिल हो ता है  । ऐ से  ही अमर नाथ यात्रा के  दौ र ान कश्मीर  के  हजार ो ं लो गो ं को  र ो जगार  हासिल हो ता है  । यही वजह है  कि कई तर ह के  तन ावो ं के  बावजूद इस तर्ीथयात्रा मे ं यहाँ का आम नागरि क तर्ीथयात्रियो ं को  सहयो ग कर ता है  । जिससे ं टै क्सी, घो डÞे  पिठ्ठ, हो टल वाले  से  ले कर  छो टे -बडे Þ दुकानदार  तक शामिल है  ।
उत्तर ाखण्ड मे ं मुनि की र े ती या फिर  ऋषिके श के  तमाम लो गो ं की र ो जी-र ो टी यहाँ के  आश्रमो ं से  पूर ी हो ती है  । यहाँ पर  यो ग-ध्यान से  ले कर  पर्यटन तक के  लिए आध्यात्म र ो जगार  का कार ण बनता है  उत्तर ाखण्ड मे ं हर  माह तक चलने  वाली चार  धाम यात्रा भी यहाँ के  लो गो ं को  बडÞे  पै माने  पर  र ो जगार  दिलाती है  । जगह-जगह पर  छो टे -छो टे  दुकानदार ो ं, हो टलो ं एवं ढाबो ं औ र  ऊन के  वस् त्र बे चने  वालो ं की आमदनी इस यात्रा मे ं आने  वाले  तर्ीथयात्रियो ं की संख्या पर  टिकी हो ती है  । इस यात्रा मे ं पहाडÞ के  रि ंगाल उद्यो ग से  भी स् थानीय लो ग अपना र  ो जगार  चलते  है  । बद्रीनाथ यात्रा के  प्रवे श द्वार  पर  गरुण गंगा मे ं टिंबर  बे चकर  कई लो ग वषोर् ं से  अपनी जीविका चलाते  है ं ।
बदलते  वक्त के  साथ मंदिर  धार्मिक पाल औ र  मे ले  बाजार  की शक्ल ले ते  जा र हे  है  । यहाँ आने  वाले  व्यक्तियो ं के  बीच क्रे ता-बिक्रे ता का संबंध र ह गया है  । दीवाली मे ला, दशहर ा मे ला, श्रावण मे ला, कुंभ मे ला सभी जगह आपको  एक बडÞा बजार  दिख जाएगा । जिससे  दे श के  ला खो ं लो गो ं को  र ो जगार  हासिल हो ता है  । कुंभ जै से  मे ला मे ं पे शवाई के  दौ र ान अखाडÞो ं के  झंडे  थामने  से  ले कर  बडे Þ-बाजा बजाने  ओ र  खाना- पीना बनाने  वालो ं से  ले कर  व्यवस् था मे ं लगे  कर्मचारि यो ं तक को  अच्छी-खासी आमदनी हो  जाती है  । धर्म से  जुडÞी गतिविधियो ं को  अब इवे ंट मै ने जमे ंट की तर ह संपन्न कर ाया जाने  लगा है  । तीज त्यौ हार ो ं औ र  पर्व अब ग्लो बल हो  गए है ं । जिनका संबंध आप के  धर्म संस् कृति या र ाज्य से  भले  ही न हो , उसकी धूम अब आपके  मो हल्ले  मे ं दिखाई दे ने  लगी है  । मसलन गणे श चतर्ुर्थी सिर्फमहार ाष्ट्र औ र  गुजर ात भर  मे ं सीमित न र हकर  दे श-दुनियाँ के  को ने  को ने  तक पहुँच गयी है  । बात चाहेर् र् इद की हो  या दि वाली की, मल्टीने शनल कंपनियाँ इन मौ को ं पर  लो गो ं की जरुर तो ं के  अनुरुप आकर्ष वस्  तुओ ं का उत् पा दन कर ने  लगी है  । इस क्षे त्र पर  दबदबा चाहे  चीन का हो  या चाँदनी चौ क का उसको  बे चकर  कमाने  वाला आम आदमी भार तीय ही हो ता है  । दे श के  तमाम बडे  मंदिर ो ं से  जुडÞे  कर्मचारि यो ं को  भी नहीं  पता हो गा कि उनके  पास कितनी धन-संपदा है  । बीते  दिनो ं ही उडÞीसा के  पूर ी मे ं विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर  के  सामने  स् िथत मठ मे ं १४ हजार  किलो  चांदी प्राप्त हर्ुइ, जिसकी कीमत लगभग ७० कर ो डÞ रुपये  आंकी जा र  ही है  । अकूत संपदा वाले  इन मंदिर ो ं के  अलावा कई मंदिर  ऐ से  भी है ं, जिनके  बार े  मे ं कहा जाता है  कि धीर े -धीर े  आध्यात्मिक माँल मे ं परि वर्तित हो ने  जा र हे  है  । जहाँ साधना से  ले कर  मनो र ंजन तक का पूर ा इंतजाम हो ता है  । स् वामी नार ायण संप्रदाय के  दुनियाँ भर  मे ं लगभग ७१३ मंदिर  है  । इसी संप्रदाय द्वार ा दिल्ली मे ं अब अक्षर धाम मंदिर  बनवायी जा र ही थी तो  उस समय इस मंदिर  के  निर्माण मे ं ७,००० कार ीगर ो ं की जरुर त थी, ले किन उस समय सिर्फ१००० कार ीगर  मिले  । मंदिर  निर्माण के  दौ र ान ही मजदूर ो ं के  परि वार  वालो ं को  संस् था की तर फ से  प्रशिक्षित किया गया । तब कहीं जाकर  ७,००० कार ीगर ो ं के  सहयो ग से  मंदिर  का निर्माण हुआ । जबकि एक हजार  से  आसपास मंदिर  के  कार्यकर्ताओ ं ने  भी निर्माण कार्य मे ं सहयो ग दिया । मंदिर  तै यार  हो  जाने  के  बाद भी यहाँ आज तकर ीबन ८०० से  ज्यादा कर्मचार ी काम कर ते  है ं । यहाँ कर्मचारि यो ं की से वा र ाशि तीन हजार  से  बीस हजार  रुपये  निर्धारि त है , जबकि लगभग १०० कर्मचार ी बगै र  किसी र ाशी के  ही कार्य कर ते  है ं । उसके  बदले  उन्हे ं आवास, भो जन आदि की सुविधा मिलती है  ।
तिरुपति मंदिर  के  ट्रस् ट ‘तिरुमला तिरुपति उवस् थानम’ के  तहत कई स् कूल-काँले ज, अस्  पत ाल औ र  हो टल चल र हे  है ं, जिनमे ं विभिन्न शाखाओ ं को  संभालने  के  लिए विभिन्न पदो ं पर  १४ हजार  कर्मचार ी कार्यर त है ं । दुनियाँ भर  मे ं कृष्णभक्ति से  जुडÞे  इस् काँन मंदिर ो ं मे ं भी बडÞी संख्या मे ं लो गो ं को  र ो जगार  मिला हुआ है  । दे श भर  मे ं इस् काँन के  लगभग १५० मंदिर  है ं । बडÞे -बडÞे  ६०-७० मंदिर ो ं मे ं लगभग दो  हजार  कर्मचार ी कार्यर त है ं, इसी प्रकार  दे श के  अन्य क्षे त्रो ं के  मंदिर  जै से  गुजर ात के  अंबाजी औ र  सो मनाथ दक्षिण भारत के  अयप्पा मीनाक्षी श्री लिंगम आदि मंदिर ो ं से  भी हजार ो ं की संख्या मे ं कर्मचार ी जुडे Þ है ं । बीते  सालो ं मे ं धार्मिकता के  प्रचार -प्रसार  के  कार ण र ो जगार  का दायर ा भी बढÞता गया है  । आज तमाम कथा-प्रवचन के  आयो जन मे ं पंडाल से  ले कर  प्रवचन तक मे ं लो गो ं को  अच्छा-खासा काम हासिल हो ता है  । मसलन एक ओ र  कथा कहने  वाले  बाब ा जहाँ अपने  साथ गीत-संगीत, गाने - बजाने  औ र  अभिनय कर ने  वालो  की टो ली साथ ले कर  चलते है ं तो  वहीं श्रो ताओ ं की भीडÞ मे ं उन लो गो ं को  भी अच्छी-खासी आमदानी का वे  कार ण बनते  है ं, जिन्हे ं, बाबा के  इशार े  पर  भीडÞ मे ं खडÞे  हो कर  नाचना या फिर  उनकी बडर्Þाई कर नी हो ती है  । इसे  आप बाबाओ ं का मै ने जमे ंट कह सकते  है ं, जिनके  कार्यक्रम का कवर े ज कर ने  के  लिए एक कै मर ा टीम मे कअप आर्टिस् ट औ र  इन सबके  बाद उस कार्यक्रम को  संपादित कर ने  वाली एडिटिंग टीम को  भी काम मिलता है  । कार्यक्रम स् थल को  आकर्ष बनाने , बाबा के  से ट को  तै यार  कर ने  मे ं फूल वालो ं से  ले कर  से ट डिजायनर  तक को  र ो जगार  हासिल हो ता है  । जबकि इन्हीं कथा पंडालो ं के  पास आपको  जडÞी-बूटी से  ले कर  र त्न-यंत्र-लाँके ट आदि की छो टी-दूकानो ं से  ले कर  टी.वी. पर  हो मशाँप के  जरि ए भी हजार ो ं लो गो ं को  आ जी विका चलाने  का जरि या मिला हुआ है  ।

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