आ बैल मुझे मार

कञ्चना झा:सन १९९६ की बात है। भारत में एक र्सर्वेक्षण हुआ था, ये जानने के लिए कि आखिर महिला विरुद्ध यौन हिंसा के बढने का कारक तत्व क्या है। र्सर्वेक्षण का परिणाम बडÞा चौंका देनेवाला था। लगभग ६८ प्रतिशत लोगों ने बताया कि अश्लील और भड किले पोशाक महिला विरुद्ध यौन हिंसा और खास कर बलात्कारको आमन्त्रित कर रहा है। ये बात नहीं कि र्सर्वेक्षण में सिर्फपुरुषों की सहभागिता थी, र्सर्वेक्षण मंे महिलाओं की भी बराबर की सहभागिता थी। वैसे तो पहले भी, लेकिन इस र्सर्वेक्षण के बाद भारत में स्कूल, काँलेज, सडÞÞक या अन्य र्सार्वजनिक स्थलों में पहनावा कैसा होना चाहिए इसके बारे मंे बहुत बहस हो रही है।
कुछ महिने पहले भारत की राजधानी नई दिल्ली में जब एक लडÞÞकी सामूहिक बलात्कार का शिकार हर्ुइ और दिल्ली की सडÞकें पर््रदर्शनकारियों से भरी हर्ुइ थी, ठीक उसी समय भारतीय जनता पार्टर्ीीाजस्थान के एक विधायक ने बोल दिया कि मिनी र्स्कर्ट यौन अपराध को बढÞावा दे रहा है। उन्होने ये भी कहा कि महिलाओं को अपने पहनावे पर ध्यान देना चाहिए। बेचारे विधायक बडÞी मुश्किल में पडÞ गये। पर््रदर्शन में उतरी हर्ुइ कुछ कथित आधुनिक महिलाएँ हल्ला करने लगीं कि मैं क्या पहनूं ये दूसरे के सरोकार का विषय नहीं। बस हमें सुरक्षा चाहिए। सुरक्षा देना सरकार का काम है लेकिन क्या सरकार अकेले यह काम कर सकत्ाी है – हर महिला के पीछे सुरक्षाकर्मी तो नहीं लगाया जा सकता है और जिस सुरक्षाकर्मी को लगाया जाए, उसीकी नीयत में खोट आ गयी तो –rapa-against-women
पिछले कुछ दिनों से नेपाल की अखबारें भी महिला विरुद्ध यौन हिंसा और बलात्कार जैसी खबरों से पटी रहती है। यह एक सामाजिक समस्या बन गयी है और जब तक समस्या की जडÞ मालूम नहीं होता, समाधान भी संभव नहीं। अधिकांश लोग सिर्फबीमारी के उपचार के बारे में सोचते हैं जबकि होना तो यह चाहिए कि रोग ही न लगे।
बात दो सप्ताह पहले की है। राजधानी काठमांडू के दरबारमार्ग स्थित एक रेष्टुराँ में जाने का अवसर मिला। मेरे बगल की टेबल पर दो लडके और दो लडकियाँ बैठी हर्ुइ थीं। लडकियों का पहनावा बड अजीबों गरीब था, संवेदनशील अंग भी दूर से ही नजर आ रहा था। आनेवाले हर ग्राहक की नजरें एक बार उन लडÞकियांे पर पडÞती ही थीं। इतने में ही मनचले युवकों का एक समूह रेष्टुराँ में पहुँचा, लडकियों पर फब्ती कस्ा दी। फिर क्या था थोडÞ ही देर में रेष्टुराँ रणभूमि बन गया। पुलिस आयी तब जाकर मामला रफा दफा हुआ।
मनचले युवक कह रहे थे- लडÞकियां नग्नता पर््रदर्शन कर रहीं थीं तो हमने फब्ती कस्ा दी। उनका कहना था- आपके पोशाक आपकी सोच पर््रदर्शन करते हैं। उनकी सोच ही ऐसी है तो हम लोगों की क्या गलती – उधर लडÞकियांे का कहना था कि कपडÞा पहनना हमारी स्वतन्त्रता है, जो मन में आयेगा पहनेंगे।
मगर बहुत सारी लडÞकियां भी समझ गयी हंै कि महिला विरुद्ध यौन हिंसा मंे सिर्फपुरुष ही जिम्मेवार नहीं होते। चिकित्सा विज्ञान अध्ययन की तैयारी में जुटी राजविराज की काजोल झा का भी मानना है कि पत्ते गिरते नहीं, हवा उसे गिरा देती है। वैसे ही लडÞके बिगडÞे हुये नहीं होते उन्हे लडÞकियाँ विगाडÞ देती हैं। उनका कहाना है कि पहनावा ऐसा होना चाहिए, जो आपके व्यक्तित्व को निखारे। दूसरों की आँख को खटक जाये ऐसा पहनावा छोडÞ देना ही बेहतर होगा।
पहनावे को लेकर देश विदेश सभी जगह बहस हो रही है और बात आ जाती है- व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की। वैसे भी स्वतन्त्रता शब्द दो शब्दों के योग से बना है। स्व अर्थात मंै या हम और तन्त्र का अर्थ होता है, पद्धतियाँ या कानून। अपनी अनुसार कोई कार्य करनेका अधिकार ही स्वतन्त्रता है। लेकिन इसका मतलब कदापि यह नहीं है कि जो मन में आये वो करें। अपना अधिकार उपयोग करते वक्त दूसरों के बारे में भी ख्याल करना चाहिए। नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ ने भी स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदत्त किया है। नेपाल के अन्तरिम संविधान की धारा १२ ने हरेक व्यक्ति को स्वतन्त्रता का अधिकार दिया है। लेकिन उसी धारा की तीसरी उपधारा एक में स्पष्ट रुप से लिखा गया है कि नैतिकता और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करने का अधिकार किसी को नहीं।
पहनावा व्यक्ति का अधिकार है लेकिन र्सार्वजनिक स्थल पर अंग पर््रदर्शन तो वर्जित है। इतना ही नहीं नेपाल में विद्यमान र्सार्वजनिक अपराध का कानून भी लोगों को अश्लील हरकत करने से रोकता है। वैसे तो अश्लील शब्द का अर्थ जगह और समाज के अनुसार र्फक होता है। सामान्यतः समाज जिस चीज को पचा नहीं पाता है उसे अश्लील कह दिया जाता है। नेपाली समाज जिस चीज को आसानी से नहीं पचा सकता नेपाल में उसे अश्लील कह दिया गया है। बन्द कमरे में आप क्या करते है ये दूसरों के सरोकार का विषय नहीं लेकिन सडÞक, पार्क, सिनेमाहाल, खेल मैदान, होटेल, रेष्टुराँ लगायत र्सार्वजनिक स्थलों में किसी को भी अश्लील हरकत करने की छूट नहीं देता है कानून। अश्लील बात बोलना, इशारा करना वा किसी भी तरह से अश्लील पर््रदर्शन करना वर्जित है। लेकिन कौन मानता इस बात को, और सारी फसाद की जडÞ यहीं से शुरु हो जाती है।
काठमाडÞौ स्थित हेडÞलाइन्स एन्डÞ म्युजिक रेडिÞयो मंे स्टेशन मेनेजर के रुप मंे कार्यरत तुलसा बस्नेत कहती हैं- पहनावा इस तरह का होना चाहिए जिसमंे अपने आपको आराम महसूस हो। वह जगह के हिसाब से कपडÞा पहनती है। ऐसा नहीं कि वह मिनी र्स्कर्ट नहीं पहनती है लेकिन पहनने से पहले कहाँ जा रही है, किस सवारी साधन से जा रही है सोचती है। वह आगे कहती हैं- डÞ्रेस अप होते समय कुछ बातों पर विचार कर लिया जाए तो बहुत से खतरों से हम बच सकते हैं।
वास्तव में देखा जाय तो एक जिम्मेवार व्यक्तिके लिए स्वतन्त्रता वरदान है लेकिन व्यक्ति गैर जिम्मेवार हो तो वही स्वतन्त्रता अभिशाप बन जाती है। खासकर नब्बे के दशक में नेपाल में गूंजी महिला अधिकार की आवाजांे ने महिलाओं को बहुत हद तक अपने आपको पहचानने में मदद की है। लेकिन इसके साथ ही बहुत सारी विकृतियां भी फैल गयींहैं । स्वतन्त्रता के नाम पर अश्लीलता बढÞ रही है। लोग एक बार फिर से महिला को भोग की बस्तु के रुप मंे देखने लगे हैं। और इसका मुख्य कारण महिला स्वयं है। महिला काम से नहीं नग्नता के माध्यम से पहचान बनाने मंे लगी जो कि बहुत खतरनाक है।
काठमाडÞौ स्थित एक नीजि कम्पनी मंे कार्यरत दीपाली सिटौला का मानना है कि अधिकांश लडÞकियां अश्लीलता और सुन्दरता में र्फक ही नहीं समझती। स्वीमिङ पुल में एक लडÞकी स्वीमिङ सुट पहनकर प्रतिस्पर्धा करती है, उसकी फोटो जब अखबार में छपती है तो कोई भी उसे अश्लील नहीं कहता। सभी उसकी काबिलियत की तारीफ करते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि बाजार में स्वीमिङ सुट पहन कर निकला जाय। दिपाली की नजरों में बाजार में स्वीमिङ सुट पहनकर कोइ निकले तो भद्दा दिखता है। वह कहती हैं- भद्दा पहनावा नहीं पहनना चाहिए।
दीपाली की बातों को सही बताते हुए अपना नाम प्रकाशित न करनेे की शर्त पर एक लडÞकी अपनी आप बिती सुनाती है। वह कहती है- जब मिनीज पहनती हूँ तो बहुत सारे गन्दे कमेन्ट सुनने पडÞते हैं लेकिन सलवार कर्ुता पहनती हूँ तो उसे कोई कुछ नहीं कहता। अगर कह भी दिया तो उस कमेन्ट को पचाने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। वैसे भी समाज में बहुत तरह के लोग हैं और कुछ लोग बीमार होते हैं। मानसिक रुप से या कहें यौन विक्षिप्त होते हैं। बाहर से दिखने में ऐसे लोग पागल नहीं लगते हैं लेकिन इनकेे आगे कुछ इस तरह की हरकत हो जाये तो वह यौन अपराध पे उतर जाते हंै। उसे कानून का डÞर नहीं। अगर कानून से यौन अपराध रोका जा सकता तो अमेरिका, इंग्ल्याण्डÞ या इस्लाम राष्ट्रो में यौन अपराध होते ही नहीं। बहुत कडÞा कानून है वहाँ, सजाये-मौत तक की व्यवस्था है कानून में। ऐसे विक्षिप्त लोगों से आप तो बच जाते हंै या आपको सिर्फफब्ती सहनी पडÞती है लेकिन शिकार बन जातें हैं वे लोग, जो कमजोर हैं खासकर बच्चे। नेपाल का भी तथ्याँक देखा जाय तो अधिकाँश बच्चे लोग ही यौन हिंसा के शिकार हुए हैं।
अपनी स्वतन्त्रता, अपने अधिकार और स्वाभिमान को लेकर चलना अच्छा होता है, पर उसे अहं के दायरे में बाधना कदापि ठीक नहीं। ऐसा करके वह पुरुष वर्ग को बडÞी सहजता से दोषी बना देती हैं, पर सारे पुरुष अत्याचारी या संकर्ीण्ा विचारों वाले नहीं होते हैं। जैसा कि नर्वे में अध्ययनरत सविता ठाकुर कहती हैं- सारा दोष पुरुष पर मढÞ देना विल्कुल गलत है। उनका मानना है कि महिलाओं का पहनावा ही कुछ इस तरह का होता जा रहा है कि विक्षिप्त लोग अपने आपको रोक नहीं पाते। वह आगे कहती हैं- महिला सुरक्षा के लिए अभिभावक को जिम्मेवार बनना चाहिए। उन्हे भी देखना चाहिए कि मेरी पत्नी, बहन या बेटी क्या पहन रही है, कहाँ जा रही है।
वैसे बहुत सी महिलाएं पहनावे की स्वतन्त्रता के पक्ष में जोडÞदार भाषण करती हंै। उनकी माँग है कि पुरुष अपने आपको नियन्त्रण में रखे, पहनावा उनकी पहिचान है। काठमाडÞौ बल्खु की पिंकी झा का भी यही मानना है कि पहनावे पर कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए। लेकिन वह खुद कथित अश्लील या भद्दा पहनावा नहीं पसन्द करतीं। कहती हैं- उसकी अनुमति, संस्कृति नहीं देती है। कर्ीर्तिपुर में स्नातकोत्तर द्वितीय वर्षमें अध्ययनरत संगीता झा का मानना भी यही हैं- अनुशासित पहनावा ही पहनना चाहिए।
सही कहें तो पहनावा व्यक्ति की पहचान होती है। पहनावा आरामदेह होना चाहिए न कि नकल से भरा। नकल ही करनी है तो विचारों को अपनायेंं न की सिर्फपोशाक को। अन्यथा बात तो वही होगी ना- आ बैल मुझे मार।

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