इंगलैंड का दंगा नई पीढी के असंतोष का विस्फोट है:
अवधेश कुमार

   इंगलैंड के लिए यह असाधारण संकट का समय है। लंदन से आरंभ पुलिस विरोधी पर्रदर्शन धीरे-धीरे देशव्यापी दंगे में परिणत हो गया। लंदन से लकेर बर्मिघम, कैंट, लिवरपुल, नोंटिंघम, ब्रिस्टल, लीडस्, उत्तरपर्ूव के शहर मैनचेस्टर से लगे साल्फोर्ड एवं मध्यक्षेत्र के पश्चिम ब्राँमबीच तक पहुँच गई। लंदन में सभी पुलिस स्टेशन भर गए हैं। हवालात में केदियों को रखने की जगह तक नहीं रही। हालांकि भारत या दूसरे एशियाई देशों में दंगों के दौरान होने वाली मौतों से तुलना करें तो यह कतई भयावह नहीं लगेगा। लेकिन दंगाइयों द्वारा इमारतों को जलाना, दुकानों में लूटपाट, गलियों में संर्घष्ा, तोडफोड, पुलिस पर पेट्रोल बमों से हमले आदि एक सभ्य देश पर कल के समान ही है। प्रधानमन्त्री कैमरन के शब्दों में यदि १२-१३ वर्षके किशोर लूट एवं आगजनी से खुशियाँ मना रहे हैं, घायलों के पास सहायता के लिए जाकर उन्हें लूट रहे हैं तो इसका अर्थ है कि इंगलैड के समाज में गंभीर संकट गहर्राई से समा चुके हैं।
ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री एवं राजनेताओं के बयानों से यह आभास मिलता है कि मुख्यधारा का पूरा राजनीतिक समुदाय सामान्य घटना के देशव्यापी भीषण दंगें में परिणत होने पर अचंभे में हैं। टोटेनहम में पुलिस ने एक वैन चेक करनी चाही, जिसमें पुलिस के अनुसार अंदर बैठे अश्वेत मार्क डुग्गन ने गोली चला दी। उसके बाद फायरिंग हर्ुइ और डुग्गन की मौत हो गई इसके बाद विरोध पर््रदर्शन शुरु हो गया और इसने द्रगों का रुप ले लिया। पहले दिन सरकार ने भी एवं पुलिस प्रशासन ने भी उसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया। वे इसे सामान्य घटना मानकर चले रहे थे। लेकिन दो दिनों बाद ही कैमरन को अपनी छुट्टी बीच में रद्द कर वापस आकर स्थिति संभालने के लिए १० हजार अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती का आदेश देना पडÞा। उन्हें काँमन सभा की आपात बैठक बुलानी पडÞी। सरकार की आँथोरिटी का प्रमाण देने तथा अराजकता से देश के बचाने को लिए ऐसा करना अपरिहार्य हो गया था। टी.वी. चैनलों पर कैमरन को दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित काँयटाँन के इलाके में हालत का जायजा लेते देखा गया। कैमरन ने घोषणा किया कि स्थिति को संभालने के लिए जितने पुलिस चाहिए मिलेगा। पुलिस को जो भी तरीका इस्तेमाल करना हो करे, उसे सारे कानूनी अधिकार प्राप्त होंगेे। उप प्रधानमंत्री लिबरल डेमोक्रेट निक क्लेग्ग को बर्मिघम में वापस जाओ के नारे का सामना करना पडÞा। कंजवर्ेर्ीी की पहचान कानूनी एवं व्यवस्था के मामले में सख्ती की रही है – इस दंगे ने आरंभ में इसके विपरीत संदेश दिया और ऐसा लगा जैसे सरकार की आँथोरिटी ही नहीं है। यही कारण था कि कैमरन ने कठोर शब्दों में दंगाइयों को चेतावनी दिया कि अपराध और गलत करने वालों के लिए बिल्कुल स्पष्ट संदेश है। आप कानून की पूरी ताकत महसूस करेंगे और यदि आप ये अपराध करने की आयु के हैं तो आप सजा झेलने की आयु भी पा चुके हैं।
स्वाभाविक ही कानून और व्यवस्था की दृष्टि से हमेशा सिर उठाकर चलने वाले इंगलैड का सिर शर्म से झुक गया है और देश में इस बात पर बहस चल रही है कि इतनी संख्या में दंगाई कहाँ से पैदा हो गए और उन पर नियन्त्रण न करने की जिम्मेवारी तो पुलिस के सिर आ रही है जिसने आरम्भ में एक प्रकार से गलियों का नियन्त्रण का काम बदमाशों के हाथों दे दिया। इससे दूसरों को प्रेरणा मिली एवं जो दर्शक थे वे भी दंगाई बन गए, लूटपाट, आगजनी करने लगे। लेकिन लंदन की पुलिस निहत्थे अपनी भूमिका निभाती है। उसे डंडे या बंदूक लेकर चलने की इजाजत नहीं। अपराधी प्रवृति के लोगों की इनमें संलिप्तता थी, लेकिन पूरे दंगे को अपराधियों की करतूत बताना सच नहीं। इसमें १२-१३ वर्षकी आयु के ऐसे किशोर तथा युवा भी हैं, जिसने न कभी अपराध किया और उन उसके बारे में सोचा भी। यह ऐसा पहलू है, जिसका विश्लेषण दंगों के वास्तविक कारण तक हमें पहुँचा देता है। दंगा ऐसी जटिल घटना है, गहर्राई में जाए बगैर जिसके कारणों की पहचान संभव नहीं। इसे अनेक कारणों से लोगों के मन में घर करते असंतोष के बगैर व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। यह असंतोष मनमाना रोमाञ्च का अवसर न मिलने से, रंगभेद से, पैदा हो सकता है, शिक्षा के अवसरों से वंचित रहने एवं आय की असमानता के कारण उत्पन्न हो सकता है।
इसका एक विश्लेषण गैर इंगलिश समुदाय यानि प्रवासियों के प्रति मेट्रोपोलिटन पुलिस के व्यवहार पर जाकर ठहर जाता है। पुलिस एशियाई और अप्रिmकी मूल के लोगों के साथ बुरी तरह पेश आती है। यकीनन इस कारण को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन दंगे का यही एकमात्र मूल कारण नहीं हो सकता। कैमरन की गठबंधन सरकार जब से शासन में आई इंगलैड में अनेक छात्र पर््रदर्शन अनेक विश्वविद्यालयों का घेराव, अनेक हडÞताल, टे्रड युनियन के ५ लाख कर्मचारियों का मार्च देश में देखा है। इन सबके तात्कालिक कारण भिन्न थे, लेकिन सभी सकरारी खर्च में बेरहम कटौतियों तथा मितव्ययिता उपायों की पुष्ठभूमि में ही घटित हुए। इंगलैंड के समाजशास्त्री, अपराधविद् दंगाइयों में गरीबों की सवर्ाीधक संख्या देख रहे हैं, जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। इनके अनुसार उनके सामने कोई कैरियर नहीं, जिसकी अंजाम देने की क्षमता है। बिगडÞती आर्थिक दशा तथा आर्थिक मन्दी के कारण कैमरन सकारर ने जो मितव्यायिता के कदम उठाए है, उसका असर निश्चित है। आर्थिक मोर्चे पर इंगलैंड की हालत काफी खराब है। इस वर्षअप्रैल से जून तक औद्योगिक उत्पादन १.६ प्रतिशत तथा निर्यात ४.८ प्रतिशत गिर चुका है। खुले हाथों खर्च करने की जगह अपने हाथ बांधेगी ही। कटौती इतनी हर्ुइ जिसकी कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था। शिक्षा संबंधी भत्ता लगभग रोक देना या युवा केन्द्र तक बंद करना असामान्य स्थिति का परिचायक है। ब्रिटेन के सामाज में निचलर्ीर् इकाई जिनमें गैर इंगलिश समुदाय की संख्या सवर्ाीधक है, सकरार के र्सार्वजनिक कार्यक्रमों पर निर्भर है। सरकार की कटौतियों से सबसे ज्यादा नुकसान इसे ही हुआ है।
वस्तुतः सामाजिक अशांति का सर्ंदर्भ काफी गहरा है। भयावह सच यह है कि अन्य पश्चिमी देशों की तरह इंगलैड में भी समाज के संपन्न एवं विपन्न के बीच की खाई बढÞी है। मार्क डुग्गन को गोली लगना तो बहुआयामी असंतोष को प्रकट करने का कारण बना है। लेकिन किशोरों और युवाओं द्वारा दंगाइयों की दुकानों, स्टोरों को लूटने, संपत्तियों को निशाना बनाने और खुशियों मनाने की प्रवृति एक दूसरे सच की ओर भी इशारा कर रही है। इनमें शामिल नई पीढÞी अपने सामने भोग का चकाचौंध देख रही है और वही जीवन की प्रेरणा भी है, किंतु सबको वह सब नसीब नहीं हो रहा है जो कि संपन्न वर्ग को हो रहा है। इसलिए ऐसे प्रतीकों के खिलाफ उसके अंदर क्षोभ भी है तथा स्वयं उपभोग सामान पाने की लालसा भी खबरों के अनुसार सामान लूटकर ले जा रहे युवा राह चलने वालों की ओर देखकर कह रहे थे कि वे अपना कर वापस वसूल रहे हें। स्वच्छंदता से लूटना किसी अधिकारविहीन व्यक्ति को भी अधिकार का आभास कराता है और इसका असर नशे जैसा है। कुछ संपन्न परिवार के युवा भी लूटेरों में शामिल थे। अमेरिका के लाँसएंजिल्स टाइम्स ने इस दंगे के लिए यौबरी शब्द प्रयोग किया है। जाहिर है, यह दंगा तत्काल भले रुक जाए, लेकिन इसने समाज के ऐसे गहरे संकट को भयावह रुप में उजागर किया हे, जिसमें पूरी दुनिया के लिए आपात संदेश संदेश है। किंतु प्रश्न है कि क्या इस समय की आर्थिक हालात में कोई देश उपभोग उन्माद की प्रेरणा का अंत कर सकता है , क्या पहले की तरह शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, समुदायिक योजनाएँ, नागरिकों के आपसी व्यवहार, सांस्कृतिक केन्द्रों और यहाँ तक कि पुलिस पर भी पहले के समान हाथ खोलकर खर्च कर सकती है – अगर नहीं तो समाज के निचले तबके की बढÞती कठिनाइयों और इससे उपजते स्वभाविक असंतोष से निपटने के क्या उपाय हो सकते हैं ताकि दंगे फिर न भडÞकें। यह यक्ष प्रश्न बनकर पूरी दुनिया के सामने खडÞा है।
– पांडव नगर काँम्प्लेक्स, दिल्लीः ११००९२

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