ईमानदारी ही सफलता की राह प्रशस्त करती है

नेपाल के प्रसिद्ध उद्योगपति और डी.ए.वी स्कूल एवं कॉलेज के संचालक श्री अनिल केडिया जी से हिमालिनी की महा प्रबन्धक कविता दासकी बातचीत का सम्पादित अंश–
० आप एक उद्योगपति हंै, साथ ही आप शिक्षा व्यवसाय से भी सम्बद्ध हैं, आपकी विशेष रुचि किधर है ?
– हर कार्य के लिए आदमी का ईमानदार होना आवश्यक है । आप किसी भी क्षेत्र से और कितने भी अलग अलग क्षेत्र से क्यों नहीं सम्बद्ध हों अगर आप में लगन है, सच्चाई है, ईमानदारी है तो आप निश्चय ही सभी क्षेत्र में सफल होंगे, क्यों ईमानदारी ही सफलता काी राह प्रशस्त करती है । जहाँ तक सवाल है उद्योग और शिक्षा से जुड़े क्षेत्र की तो मैं यही कहूँगा कि एक सफल व्यवसायी शिक्षा क्षेत्र में भी सफल होने की क्षमता

Anil  kediya

डी.ए.वी स्कूल एवं कॉलेज के संचालक श्री अनिल केडिया

रखता है । कई बार मुझपर यह आरोप लगता रहा है कि अरे यह तो व्यापारी है शिक्षा को भी व्यापार बना देगा । मेरा मानना यह है कि एक सफल व्यवसायी की निगाह और सोच काफी दूर तक जाती है वह समय और बाजार दोनों को समझता है और उसकी महत्ता को भी पहचानता है । वो यह जानता है कि समय की माँग क्या है और गुणस्तरीय उत्पादन ही बाजार में जगह पा सकता है । इसलिए मैं यह मानता हूँ कि एक सफल व्यवसायी शिक्षा के क्षेत्र की भी जरुरत को समझता है, उसकी बारीकियों को समझता है और उसके अनुसार ही छात्रों की जरुरत को पूरा करता है, उसे सफलता के मूलमंत्र के साथ तैयार होने का वातावरण देता है । ताकि वह एक गुणस्तरीय  शिक्षा को प्राप्त कर के स्कूल से निकले और अपने भविष्य का निर्माण कर सके । स्कूल व्यवसाय भी उद्योग के अन्तर्गत ही आता है । दुनिया में व्यवसाय के अन्तर्गत ही इसको मान्यता प्राप्त है हाँ नेपाल में इसकी परिभाषा थोड़ी अलग जरुर है, पर आप जहाँ भी देखें तो बड़े बड़े व्यवसायी शिक्षा व्यवसाय से भी जुड़े हुए हैं और स्कूल कालेज संचालन कर रहे हैं और सफलता के साथ कर रहे हैं । जहाँ तक मेरी विशेष रुचि का सवाल है तो शिक्षा के प्रति मेरा ज्यादा झुकाव है । क्योंकि यहाँ से जुड़ने के पश्चात् एक बौद्धिक वातावरण मुझे मिलता है, यह शिक्षा का क्षेत्र है तो यहाँ जो भी कार्यरत हैं, उनका बौद्धिक स्तर ऊँचा होता है और मैं इनके संसर्ग में अच्छा महसूस करता हूँ । दूसरी बात यह है कि बच्चे समाज और देश का भविष्य होते हैं, माता पिता की उम्मीद होते हैं । इस क्षेत्र में जाने का एक कारण यह भी है कि मुझे लगता है कि मेरी संस्था एक अच्छे नागरिक का निर्माण कर रही है जो सुसंस्कृत है, सभ्य है और अनुशासनशील है और इस तरह हम एक परिवार को, एक समाज को और एक देश को, एक सही व्यक्ति दे रहे हैं । यह एक महत् कार्य है जिसे करने में मुझे संतुष्टि मिलती है ।
० शिक्षा के क्षेत्र में आपका कितना योगदान है ? इस क्षेत्र में कठिनाई क्या है ?
हम अपनी संस्था से शत प्रतिशत कामयाब छात्रों को बाहर भेजते हैं । आज के समय में सिर्फ पास होना महत्व नहीं रखता है । छात्रों को विशेषांक के साथ उत्तीर्ण होना पड़ता है । लोग सोचते हैं कि हम सिर्फ पैसा कमाने के लिए स्कूल या कालेज चला रहे हैं । ऐसी बात नहीं है । मैंने पहले भी कहा कि हम एक सही व्यक्ति के निर्माण पर जोर देते हैं जो अपने क्षेत्र में एक उदाहरण बन सके । वह किसी भी क्षेत्र में जाए चाहे वह डाक्टर बने, इंजीनियर बने, व्यवसायी बने तकनीशियन बने सफल बने । हमारी संस्था यही चाहती है और ऐसी ही शिक्षा प्रदान करती है । हम शुद्ध आचरण और अनुशासन पर बल देते हैं और उसे छात्रों के अन्दर पैदा करने की कोशिश करते हैं ताकि उसका सही चरित्र निर्माण हो सके ।
जहाँ तक कठिनाइयों का सवाल है तो यह देश ऐसा है कि यहाँ कठिनाइयाँ हीं कठिनाइयाँ हैं । इसके बिना तो कोई काम हो ही नहीं सकता । सरकार की मानसिकता ऐसी है कि वो निजी क्षेत्र को या व्यवसाय को अजीब सी मानसिकता के साथ देखते हैं । कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम इस ग्रह के हैं ही नहीं, यहाँ के नागरिक भी नहीं हैं । यह हमें झेलना पड़ता है । दूसरी बात कि नेपाल में जितना टैक्स लिया जाता है उतना विश्व के किसी भी देश में मेरी जानकारी में नहीं लिया जाता होगा । तो टैक्स की मार को भी हम झेलते हैं । हम जिस तरह काम कर रहें हैं या शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान दे रहे हैं उसे नजरअंदाज किया जाता है । सबकी सोच यह होती है कि हम छात्रों का या अभिभावक का आर्थिक शोषण करते हैं । हमें शिक्षा माफिया के तहत जोड़कर देखा जाता है । सबकी नजरों में एक हिकारत होती है । यह सब हमें सहन करना पड़ता है ।
० नई शिक्षा नीति में क्या सुधार होनी चाहिए ?
– मैंने जिन कठिनाइयों की बात कही अगर सरकार उस पर ध्यान दे दे तो सुधार स्वयं हो जाएगा । हमारे काम को महत्व दिया जाय । टैक्स सरकार अगर कम लेती है तो छात्रों पर आर्थिक दबाव कम पड़ेगा  और हमारी जो आमदनी होगी उसे हम छात्रों के ऊपर खर्च कर सकेंगे जिसका प्रत्यक्ष फायदा उसे मिलेगा । हमें अच्छे माहौल में काम करने दिया जाय । शिक्षा के क्षेत्र को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाया जाय । एसी नीति बनाई जाय कि बच्चे अपने ही देश में शिक्षा प्राप्त करें । यहाँ से बच्चे बाहर जाते हैं तो पैसा भी तो बाहर जाता है । अगर वो पैसा देश में ही रहे तो शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर सुधार हो सकता है । सरकार का ध्यान इस ओर जाना चाहिए और देश के पैसे को देश में ही रहने की नीति का निर्माण करना चाहिए । अगर देश में ही गुणस्तरीय शिक्षा मिलेगी तो छात्र बाहर क्यों जाएँगे । इस ओर सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है ।
० भूकम्प के बाद शिक्षा पर क्या असर पड़ा है ?
– भूकम्प के बाद जो डर था वह धीरे धीरे अब खत्म हो चुका है । जो बच्चे यहाँ से चले गए थे वो भी वापस आने लगे हैं । डर से निकालना है तो काम करना होगा । आप उसमें व्यस्त हो जाते हैं तो मन से डर निकल जाता है ।
० संस्था से जुड़ी उच्च शिक्षा के विषय में कुछ कहना चाहेंगे ?
– हम चाहते हैं कि हम बेहतर से बेहतर शिक्षा दें किन्तु इस क्षेत्र में हमारे सामने  एक और समस्या आती है कि जो उच्च शिक्षा से जुड़ी हुई है । यहाँ सरकारी निकायों में यह कानून बना दिया जाता है कि जो प्राफेसर वहाँ कार्यरत हैं वो कहीं निजी संस्थान में नहीं पढाÞ सकते, यह सही नहीं है । उनको अपनी शिक्षा का उपयोग करने का अवसर देना चाहिए ताकि दूसरे उससे ज्यादा से ज्यादा लाभान्वित हो सकें । जब आप निजी संस्थान को अध्यापन कराने के लिए मान्यता देते हैं तो उसे विषय से सम्बन्धित विज्ञ की आवश्यकता होती है और अगर आप प्रोफेसर को अनुमति नहीं देंगे तो हमें शिक्षक कहाँ से मिलेंगे । इसलिए इस ओर भी समुचित ध्यान देने की आवश्यकता है ।
गाँवों में प्लस टू तक की पढ़ाई तो सही है किन्तु उसके बाद तो बच्चे शहर ही आते हैं । नेपाल में बच्चे या तो काठमान्डू आते हैं या बाहर जाते हैं । अगर देश में ही सुविधा मिल जाय तो बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होगी । भारत में अधिकांश बच्चे वहीं अध्ययन करते हैं जबकि हमारे यहाँ के अधिकतर बच्चे बाहर जाते हैं ।
० आपके और भी क्या क्या उद्योग हैं ?
– हमारी दो कम्पनियाँ हैं । यती कार्पेट को मैं चलाता हूँ । जब मैं बम्बई से आया तो बाबू जी ने इसकी जिम्मेदारी मुझे दी । मैंने इस बन्द कम्पनी को फिर से शुरु किया । मेरा मानना है कि अगर आप सही तरीके से काम करेंगे अपने कर्मचारियों को खुश रखेंगे तो आप कामयाब होंगे । मैंने चार चार बन्द कम्पनियों को चलाया जिसमें यती फैब्रिक्स, यती कार्पेट, सीताराम दूध आदि कम्पनियाँ हैं और आज ये सभी अच्छी तरह  से चल रही हैं ।
० वत्र्तमान परिस्थिति से आप कितना सन्तुष्ट हैं ?
– जिस देश में हर ओर समस्याएँ हों वहाँ कोई संतुष्ट कैसे रह सकता है ? आज विश्व विकास की बातें करता है और उस ओर तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है किन्तु हम बातें करते हैं ः बिजली की , पानी की, जाति की, संघीयता की, बन्द की, नदी साफ करने की तो ऐसे में हमारी संतुष्टि का तो सवाल ही नहीं उठता । हम अभी भी बहुत पिछड़े हुए हैं । हमें बन्दी झेलने की आदत हो गई है, लोड सेडिंग में रहने की आदत हो गई है अब तो हालत यह है कि जिस दिन चौबीस घन्टे बिजली रह गई तो वह अजीब लगता है । तो अभी की हालत में संतुष्टि का तो सवाल ही नहीं उठता ।
० आपका कोई संदेश ?
– नई पीढ़ी को आगे आने की जरुरत है जिनकी सोच नई हो, जो नए तकनीकि को लागु करना जानते हों, वक्त के साथ अपनी सोच को बदलना जानते हों उन्हें आगे आना चाहिए । युवा पीढ़ी ही देश को विकास की राह पर ले जा सकती है । यह बातें हमारे नेताओं को भी समझना चाहिए और युवाओं को आगे बढ़ने देना चाहिए तभी नए नेपाल का निर्माण हो सकता है ।
हिमालिनी को समय देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
आपने यह अवसर दिया इसके लिए आप का भी आभार ।

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