उग्र राष्ट्रवाद की ओट में वंचित समुदायों की हकमारी

संजय पाण्डेय :मधेश पांँच महीनों से अधिकार प्राप्ति के लिए अनवरत रूप से संघर्षरत है । इस दरम्यान लगभग पाँच दर्जन लोगों ने अपने प्राणो की आहुति दे दी । हजारों लोग घायल होकर उपचाररत हैं । अरबों रुपयों की क्षति देश और मधेश को उठानी पड़ी । किन्तु आज भी समस्या ज्योंं की त्यों बनी हुई है । यह आन्दोलन इतना लम्बा और सशक्त रूप से चला जितना नेपाल में कोई भी आन्दोलन नहीं चला है । मधेश के घर घर से बच्चे, बूढे, युवा और महिला इस आन्दोलन में एक साथ लाखों की संख्या में शामिल होते रहे हैं और प्रशासन कु्ररता पूर्वक दमन करती रही है । आन्दोलनकारी हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुति देते रहे हैं किन्तु विचलित नहीं हुए हैं तो इसके पीछे महज भावनात्मक आवेग नहीं है वरन् मधेश की अस्मिता और अस्तित्व पर हो रहे आक्रमण का प्रतिकार है ।
मधेश विद्रोह एक और दो के द्वारा अन्तरिम संविधान में स्थापित किए गए अधिकारों की कटौती कर जिस तरह मसौदा संविधान सार्वजनिक किया गया, उसके विरुद्ध प्रतिक्रया तो होनी ही थी और हुई भी । बावजूद इसके संविधान सभा में अपने संख्या बल के मद में विभेदकारी संविधान जारी कर दिया गया । अब मधेशियों के सामने करो या मरो की स्थिति आ गई और मधेशी अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए और ज्यादा उत्साह पूर्वक प्राण पण से आन्दोलन में जुट गए । उधर शासन द्वारा चलाया जा रहा क्रूर दमन चक्र और तीव्र हो गया । देखते ही देखते शहीदों की संख्या पचास पार कर गई । अब बाध्य होकर मधेशियों ने भारत नेपाल नाका बन्द करने का निर्णय लिया । नाका बन्दी के बाद खसवादियों ने एक अनर्गल दुष्प्रचार का अभियान चलाया जिसमें कहा जाने लगा कि, यह नाकाबन्दी मधेशी नहीं कर रहे हैं वरन् ये भारत सरकार द्वारा की गई अघोषित नाका बन्दी है । साथ ही यह भी प्रचारित किया गया कि, मधेशियों की जो मांग है वह भारत द्वारा अपने लाभ के लिए उठवाइ गई है । इस तरह यह नेपाली सार्वभौमसत्ता, स्वतन्त्रता, अखण्डता और स्वाभिमान पर आक्रमण है । यह दुष्प्रचार खसवादियों की सोची समझी रणनीति के तहत किया गया । क्योंकि जारी संविधान में जनजातियों के साथ भी धोखा हुआ था इसलिए पहाड़ की जनजातियाँ भी आन्दोलित हो रही थीं । इसलिए भारत का भय दिखाकर उग्र राष्ट्रवाद को उभारा गया, जिससे पहाड़ की जनजातियों का ध्यान उनके अधिकारों की मांग की तरफ से भटकाया जा सके ताकि कोई बड़ा आन्दोलन न खड़ा हो सके और सम्पूर्ण पहाड़ी समुदाय मधेश आन्दोलन के खिलाफ खड़ा हो जाय और ऐसा ही हुआ । इस तरह एक बड़े समुदाय को राष्ट्रवाद के नाम पर शान्त कराने में वो कामयाब हो गए । परन्तु मधेशी आन्दोलित थे और उन्हें पता था कि भारत कोई हस्तक्षेप नहीं कर रहा है, बल्कि एक हितैषी मित्र की तरह सुझाव दे रहा है, जो मधेश और देश के हित में है । इसलिए मधेशी भारतीय रुख के साथ अपनत्व महसूस करने लगे ।
यद्यपि भारत विरोध के नाम पर पहाड़ के दोनों समुदाय (खस आर्य और जनजाति) एक तो हो गए और आसन्न जनजाति आन्दोलन को तो रोक लिया गया, लेकिन एक ही देश में दो राष्ट्रवाद का उदय होने लगा । एक पहाड़ी राष्ट्रवाद और एक मधेशी राष्ट्रवाद । यह स्थिति किसी भी देश के लिए घातक होती है । इसे ठीक करने की जरुरत है और एक समावेशी नेपाली राष्ट्रवाद, जो यथार्थ के धरातल पर आधारित हो, स्थापित करने की आवश्यकता है । यदि ऐसा नहीं किया गया तो देश का भविष्य अन्धकारमय होने की पूरी संभावना है ।
अब प्रश्न उठता है कि इस नेपाली राष्ट्रवाद को कैसे स्थापित किया जाय ? उत्तर सरल है किन्तु राह कठिन है, जिसपर चलने के लिए राष्ट्रप्रेम से ओत प्रोत शुद्ध अंतःकरण और दृढ इच्छा शक्ति चाहिए । इसके लिए सदियों से अपमानित, प्रताडि़त और शोषित समुदायों को राज्य के हरेक अंगों में समानता के आधार पर समाहित करना होगा । जिससे देश का सबसे कमजोर व्यक्ति भी यह अनुभव कर सके कि, वह भी राज्य द्वारा प्रदत्त सम्पूर्ण अधिकारों और सुविधाओं का, बिना भेदभाव के उतना ही उपभोग कर सकता है जितना देश का सबसे शक्तिशाली और पहुँच वाला व्यक्ति कर सकता है । इस तरह की व्यवस्था जारी संविधान को संशोधित कर किया जाना अपरिहार्य है । तभी देश में शान्ति स्थापित होगी और देश प्रगति के पथ पर तेजी से आगे बढ़ सकेगा । अन्यथा देश अब और अन्ध भारत विरोध तथा उग्र राष्ट्रवाद के आधार पर आगे नहीं बढ़ सकता है ।

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