उतराखण्ड का जल प्रलय

कुमार सच्चिदानन्द:वर्षा को ऋतुओं की रानी कही गई है। प्रचण्ड गर्मी के बाद जब आषाढÞ के प्रथम मेघ आसमान में घुमडÞते हैं और बरसते हैं तो तन-मन शीतलता और शांति का अनुभव करता है। लेकिन यही वषर् जब रौद्र रूप धारण करती है तो व्यापक विनाश की भूमिका प्रस्तुत करती है। प्राकृतिक आपदा की विभीषिका को बढÞाने में मनुष्य की प्रकृति से छेडÞछाडÞ की बड भूमिका है। छल-कपट, प्रलोभन और दमन के दम पर लागू किए जा रहे विकास के आक्रमणकारी माँडल ने प्रकृति के कहर को कई गुणा बढÞा दिया है। वैसे भी मनुष्य के जीवन विकास और सभ्यता की यात्रा एक तरह से प्राकृतिक शक्तियों पर उसके विजय की यात्रा है। इस विजय के अहंकार में उसने न केवल प्रकृति के पारम्परिक स्वररूप को छेडÞा वरन् उसका अन्धाधुन्ध दोहन भी किया। इसी का खामियाजा समय-समय पर विभिन्न रूपों में मानव को भुगतना पडÞता है। पन्द्रह जून की रात केदारनाथ में जो कुछ हुआ और तबाही का जैसा मंजर आया उसे इसी का परिणाम माना जा सकता है। विडम्बना यह रही है कि यह समय तथाटन का था। न केवल भारत के विभिन्न भागों वरन् विश्व के अनेक देशों के धर्मावलम्बी श्रद्धा और भक्ति से लबालब होकर इस समय केदारनाथ की यात्रा पर थे। इसलिए आकस्मिक रूप से आयी इस बाढÞ से जान माल की व्यापक हानि हर्ुइ। यह क्षति इतना व्यापक है कि इसका सही मूल्यांकन फिलहाल सम्भव नहीं।

उत्तराखण्ड त्रासदी को बयाँ करते हुए कृष्ण कुमार रत्तू के शब्द उद्धरित किए जा सकते हैं कि ‘क्या आप जान सकते हैं कि अभी-अभी श्रद्धा से सराबोर जिन्दगी की जो यात्रा चल रही थी और किसी अनन्त मोक्ष के लिए दुआएँ माँग रही थी, वह अचानक खामोश हो जाएगी – अभी जो मेरी आँखों के सामने है, खामोश और पसरा हुआ सन्नाटा शायद कह रहा है कि कोई कभी रहा होगा, इन मंदिरों की बजती हर्ुइ घण्टियों का गवाह। चार धाम यात्रा पर मोक्ष की तलाश में निकले हुए हजारों हजारों श्रद्धालु उत्तराखण्ड की इस भूमि में अन्ततः प्रकृतिक विपदा के शिकार हो गए।

देश विदेश से आए हुए श्रद्धालुओंर्-पर्यटकों में से कितने कहाँ गुम हो गए- मलबे, कीचडÞ, गंगा, भागीरथी एवं अलकनंदा के तेज तूफानी प्रवाह में, कोई नहीं जानता। ये दृश्य सचमुच डरावने हैं।…..सबसे ज्यादा प्रलय का प्रकोप अथाह श्रद्धा के प्रतीक केदारनाथ में हुआ। समुद्रतल से ११,६५७ फुट की ऊँचाई पर स्थित यह स्थान, जिस पर प्राचीन केदारनाथ मंदिर एवं परिसर स्थित था, अब वहाँ पर सिर्फमंदिर का गुंबद खडÞा है। आसपास का सबकुछ तहस-नहस हो चुका है। बादलों का गुस्सा जिस प्रलयंकारी अंदाज में केदारनाथ की इस पवित्र भूमि पर उतरा है, ऐसा पहले कई शताब्दियों में नहीं घटा है।

उदास, मौन केदारनाथ का मंदिर अपने श्रद्धालुओं की मृत्यु, उनका मोक्ष बहती हर्ुइ लाशों के रूप में देख रहा है। आसपास का बाजार, विश्रामघर तथा दुकानें पूरी तरह तबाह हैं। एक भुतहा दृश्य यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या प्रकृति के इस तरह के प्रकोप से, बादलों के गुस्से में आने से, इस तरह कहर बरपाने से क्या आदमी का वजूद, उसकी श्रद्धा का खात्मा हो सकता है – जबकि इस भयावह हादसे से शेष बचे हुए यात्री डर और सहम के साथ भूख और प्यास से बेहाल हैं श्री केदारनाथ की यात्रा इस तरह की भी हो सकती है, यह सोचते हुए लगता है कि आदमी प्रकृति के साथ जो खिलवाडÞ कर रहा है, वह कहीं न कहीं उसका भी नतीजा है।’

उत्तराखण्ड में आई तबाही पर विभिन्न तरह के दृष्टिकोण आ रहे हैं। सामान्यतया लोगों का मानना है कि उत्तराखण्ड में बारिश और बाढÞ से मची तबाही मानवीय भूलों का नतीजा है। कुछ उपायों से इसे टाला जा सकता था। दरअसल यहाँ १४ जून से बारिश का जो सिलसिला शुरू हुआ जो अगले तीन दिनों तक जारी रहा। इस अतिवृष्टि के कारण केदानाथ के ऊपर स्थित गाँधी सरोवर लबालब भर गया और पानी बाहर बह निकला। यद्यपि भारत की अन्तरिक्ष अनुसंधान संस्था इसरो ने इस क्षेत्र में बादल फटने का पर्ूवानुमान सम्बन्धी रिपोर्ट पहले ही जारी की थी लेकिन सम्बद्ध निकायों एवं सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। अगर समय रहते पहल की जाती या सावधानी बरती जाती तो जान माल की व्यापक क्षति को कुछ कम किया जा सकता था।

यद्यपि इस त्रासदी के कुछ आस्था, विश्वास या अंधविश्वास से भरे हुए कारण भी दिए जा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि धारी माता के मंदिर के विस्थापन के कारण उनके कोप के फलस्वरूप यह तबाही आयी। परंपरागत रूप से धारी माता को चारों धाम की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं और उत्तराखण्ड की जनता की रक्षा करनेवाली माता माना जाता है। लेकिन सरकार ने आधुनिकता, व्यावसायिकता, विकास के नाम पर आम लोगों की आस्था का खयाल न रखते हुए मंदिर का विस्थापन किया, जिसके कारण यह त्रासदी आयी। सवाल है कि अगर हम उनकी अलौकिक शक्तियों पर विश्वास करें तो भी कहा जा सकता है कि अगर उनका कोप हुआ भी तो विशेषतः उन लोगों पर होना चाहिए जो इसके विस्थापन के लिए जिम्मेवार थे, हजारों निर्दोष श्रद्धालु उनके प्राकृतिक कोप का शिकार नहीं हो सकते।

यद्यपि केदारनाथ घाटी में तबाही की वजह पर छाया हुआ कुहासा कुछ हद तक छँट गया है। भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान -आई.आई.आर.एस.) के सेटेलाइट अध्ययन में यह तथ्य उभर कर सामने आया कि यहाँ न तो कोई बादल फटा और न ही केदारनाथ के ऊपर बने गाँधी सरोवर के टूटने के कारण सैलाब आया। वैज्ञानिकों की रिपोर्ट बतलाती है कि केदार घाटी को बर्बाद करने के पीछे दो ग्लेशियर रहे हैं। इनकी उपरी परत पिघलने से पानी का सैलाब फूट पडÞा और रास्ते में पडÞने वाली हरेक चीज को बहा ले गया।

रीसैट(१ न्ााम के सेटेलाइट से ली गई तबाही की जो तस्वीरें जारी की गई है उसके अनुसार केदारनाथ के उत्तर-पर्ूव में पडÞने वाले कंपेनियन ग्लेशियर पिघलने से इतनी मात्रा में पानी फूटा कि वह गाँधी सरोवर की बाँध तोडÞते हुए केदारनाथ की ओर बढÞने लगा। इसी समय उत्तर-पर्ूव के चूरावारी ग्लेशियर पिघलने से फूटा पानी का रेला बडÞे-बडÞे पत्थर और भूभाग को भी बहा ले गया। दोनों ग्लेशियरों से उठा पानी का रेला केदारनाथ मंदिर से कुछ पहले मिल गया और दूगनी रप\mतार से मंदिर की ओर बढÞने लगा। उसके बाद जो तबाही शुरू हर्ुइ उसका मंजर देखकर सारी दुनिया स्तब्ध है।

प्ा्रकृति के आगे हमारे ज्ञान-विज्ञान, हमारे अनुसंधान-आविष्कार कितने निरीह हैं इसका अंदाजा हम उत्तराखण्ड की त्रासदी से लगा सकते हैं। यह सच है कि उत्तराखण्ड में आई बाढÞ की सबसे बडÞी आपदा के बाद उजाडÞ हो गए हिमालयी क्षेत्र के विकास के लिए नई रणनीति के साथ-साथ जिस बात की सबसे बडÞी आवश्यकता है, वह है पर्यावरण के संरक्षण की। हलाँकि इसमें कोई संदेह नहीं कि इस क्षेत्र का आर्थिक विकास बहुत जरूरी है, लेकिन यह विकास कम से कम पर्यावरण की शर्त पर नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा होता है तो पारिस्थिति की दृष्टि से हालात और कमजोर होगी और नई आपदा को आमन्त्रित करना होगा।

आज खुले रूप में यह माना जा रहा है कि पहाडÞों के इस जल-प्रलय में सिर्फकुदरत नहीं हम भी जिम्मेवार हैं। उत्तराखण्ड में १६ जून को ही २४ घण्टे के भीतर २२० मिली लीटर से ज्यादा वारिश हर्ुइ जो कि सामान्य से तीन सौ फिसदी ज्यादा थी। लेकिन मौजूदा तबाही की वजह सिर्फज्यादा वारिश को नहीं माना जा रहा। विकास के मौजूदा रूप ने पहाडÞी क्षेत्रों को या भूखण्डों को ज्यादा नुकसान पहुँचाया है और उसे एक हद तक खोखला किया है। पेडÞों को काट कर ढÞलानों पर मकान और होटलों के निर्माण ने पहाडÞ पर प्रकृति के संतुलन को नष्ट किया है।

बडÞी मात्रा में सडÞकों के निर्माण के कारण पहाडिÞयाँ अस्थिर हर्ुइ हैं। सडÞकों के विस्तार ने हिमालयी क्षेत्र में एक नई किस्म की परिघटना को जन्म दिया है, जो पहाडÞों के विघटन का व्यापक कारण बनता जा रहा है। उत्तराखण्ड राज्य परिवहन विभाग के आँकडÞों से इस बात की पुष्टि होती है कि वर्ष२००५-२००६ में राज्य में पंजकिृत वाहनों की संख्या ८३,००० थी जो २०१२-२०१३ में बढÞकर १,८०,००० तक पहुँच चुकी है। यह र्सवविदित तथ्य है कि पर्यटन में वृद्धि का भूस्खलनों की संख्या से सीधा सम्बन्ध है। उत्तराखण्ड में हर साल पर्यटकों की संख्या लगातार बढÞ रही है। इनके लिए नए-नए होटलों के निर्माण किए जा रहे हैं। पहाडÞों की भंगुर संरचना का खयाल किए बिना बहुमंजली इमारतों का निर्माण किया जा रहा है। फिर उत्तराखण्ड में बडÞी संख्या में हो रहे बाँधों के निर्माण ने भी वहाँ के पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया है। आँकडÞों के मुताबिक इस समय भी वहाँ ५०० से अधिक बाँध परियोजनाओं पर काम हो रहा है।

पिछले दिनों नेपाल के सुदूर पश्चिमी क्षेत्र के विभिन्न जिलों में बाढÞ और भूस्खलन के कारण धन-जन की जो व्यापक क्षति हर्ुइ। उसे भी पर्यावरण असंतुलन का नतीजा माना जा सकता है। यद्यपि यह क्षति उत्तराखण्ड की तुलना में नगण्य थी, तथापि इससे यह संकेत तो मिलता ही है कि यदि नदी और पहाडÞ की प्रकृति को समझे बिना इस क्षेत्र में अंधाधुंध विकास हम करते हैं तो किसी न किसी रूप में यह उत्तराखण्ड जैसी आपदा को आमन्त्रित करेगा। उत्तराखण्ड की पारिस्थिति और नेपाल के हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थिति में एक हद तक समानता है और प्राकृतिक दृष्टि से यह एक जटिल पर्यावरण क्षेत्र है। इसलिए उत्तराखण्ड की यह तबाही नेपाल के लिए भी सावधानी का पाठ पढÞाती है। विज्ञ बतलाते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में ऐसे २६ हिम सरोवर हैं जिसमें छः अत्यन्त खतरनाक अवस्था में हंै , जिसके कारण रसुआ जिले के नीचले हिस्से में बसे लागों को दूसरी जगह पर पुनर्वास कराया गया है। आई.सी.आई.एम.ओ.डी.-इन्टेनशन सेन्टर फाँर इन्टीग्रेटेड माउण्टेन ड्वलपमेण्ट) काम कर रही है जिसका मुख्यालय नेपाल में है। लेकिन पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से यह पर्याप्त नहीं है। वस्तुतः नीति और चेतना दोनों के समन्वय के द्वारा ही पहाडÞी और हिमालयी क्षेत्र के विकास की दिशा तय की जानी चाहिए।

यह सच है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोक लेना हमारे वश की बात नहीं। समय-समय पर इसका प्रचण्ड और भीषण रूप हमारे सामने आते ही रहते हैं। लेकिन प्रकृति के प्रति मानवीय संवेदनहीनता के कारण बडÞी विपदाओं को हम आमंत्रित नहीं करें। हम विकास करें लेकिन नदियों-पहाडÞों की प्रकृति और इतिहास को समझकर ही। विकास के नाम पर पहाडÞों को खोखला करने और नदियों में मलवा डालने की प्रवृत्ति से हमें बचना चाहिए। इस बात के प्रति हमें संवेदनशील होना चाहिए कि प्रकृति पर विजय का स्वप्न लेकर उसके संवेदनशील क्षेत्र में जब हम कोई हलचल करते हैं तो बरदाश्त करने की सीमा तक तो यह शांत रहती है लेकिन जब यह सीमा टूटती है तो यह प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करती है ओर उसका नतीजा विभिन्न कष्टप्रद रूपों में हमारे सामने आता है। त्र

Uttarakhand_rain

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