उत्थान भाेजपूरी कविता

 

उत्थान / आचार्य महेन्द्र शास्त्री

आज आकाश में भी बथान भइल रे
चान सूरज पर आपन मकान भइले रे।

रोज विज्ञान के ज्ञान बढ़ते गइल,
लोग ऊँचा-से-ऊँचा पर चढ़ते गइल
आज सगरे आ सबकर उथान भइल रे-

जबले हमनी के मनवाँ छोटा रहल
तबले सब लो के मनवाँ खोटा रहल
आज हमनी के मनवाँ महान भइल रे-

फेर ए देस के मॉथ ऊँचा भइल
फेर ई देस नीमन समूचा भइल
बूढ़ भारत अब सब से जवान भइल रे-

मन में सेवा के हमरा अथाह चाह बा,
हमरा पुरुखन के ईहे पुरान राह बा
आज हमनी का ओही के ध्यान भइल रे-

आज सबसे बड़ा सब किसान भइल रे-
आज सबका से इहे प्रधान भइल रे
किन्तु आनन्द सबका समान भइल रे….

मन के अरमान अपना पूरा भइल,
आज बापू के सपना पूरा भइल
आज हमनी के छाती उतान भइल रे-

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