उत्सव जो मातम में बदल गया

विभा दास:त्रेतायुग में विदेह राजा जनक की पुत्री माँ सीता का विवाह, अयोध्या के राजा दशरथ के जेष्ठ पुत्र पुरुषोत्तम राम के साथ मार्ग शुक्ल पक्ष पञ्चमी के दिन सम्पन्न हुआ था । इसी दिन को लेकर सम्पूर्ण मिथिलावासी प्रत्येक वर्ष जनकपुरधाम में विवाहपञ्चमी मनाते आ रहे हैं । विवाहपञ्चमी के दिन जानकी मन्दिर को दुलहन की तरह सजाया जाता है । पूरे वर्ष इस दिन का जनकपुरवासी इंतजार करते हैं । जनकपुर ही नहीं सम्पूर्ण मिथिलावासी में इस उत्सव को लेकर उमंग और हर्षोल्लास छाया रहता है । यह वह समय होता है जब हर घर आतिथ्य के लिए तैयार रहता है क्योंकि विवाहपञ्चमी में शायद ही ऐसा घर बचा होता है, जिस घर में अतिथि नहीं आए हों । ऐसा लगता है, जैसे जनक नन्दिनी का विवाह न होकर सम्पूर्ण जनकपुरवासी की बेटी का विवाह हो । इस दिन की तैयारी जनकपुरवासी महीनों से कर रहे होते हैं । पहले विवाहपञ्चमी का पर्व एक महीने तक मनाया जाता था । किन्तु अब यह सप्ताह से भी घटकर कुछ दिनों में सिमटकर रह गया है, फिर भी बड़ी धूमधाम के साथ मिथिलावासी इसे मनाते हैं । नेपाल में ही नहीं, भारत में भी इस त्योहार का बहुत महत्व है । प्रत्येक वर्ष भारत के विभिन्न क्षेत्र और अन्य देशों से इस पर्व को मनाने लाखों संख्या में तीर्थालु भक्तजन जनकपुर आते हैं । व्यापारियों को इस महीने का इंतजार होता है, क्योंकि यह उनके व्यापार का समय होता है और वर्ष भर की कमाई भी हो जाती है । व्यापार करने का दिन यही होता है इसलिए नगरवासी और व्यापारियों में उत्साह छाया रहता है ।
विवाहपञ्चमी में विवाह के सभी रस्मों को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है– विवाहपञ्चमी से एक दिन पहले जानकी मन्दिर के महन्थ राम मन्दिर में भगवान राम का तिलक उत्सव करते हैं । उसी दिन मटकोर का कार्यक्रम भी होता है । विवाह पञ्चमी के दिन में माँ जानकी का दुल्हन की तरह श्रृंगार कर जनकपुर के रंगभूमि बारहबीघा में शादी की रस्म पूरी करते है । राम मन्दिर से बारात सजधज कर जानकी मन्दिर आती है । जानकी मन्दिर में उनका भव्य स्वागत किया जाता है । उसके बाद विवाह की पूरी रस्म विधि विधान से की जाती है ।
किन्तु इस बार लगातार चार महीनों से बन्द और मधेश आन्दोलन का प्रभाव विवाह पञ्चमी पर पूर्ण रूप से पड़ा । जनकपुरवासी इस बार विवाह पञ्चमी धूमधाम के साथ न मनाकर वर्षो. से चली आ रही परम्परा का निर्वाह करना चाह रहे थे क्योंकि मधेश इस हालत में नहीं है कि कोई भी पर्व उत्साह के साथ मना सके । हर घर उदास है और अभाव की जिन्दगी जी रहा है । कइृ घरों के चिराग बुझ गए हैं, कई घायल होकर अस्पताल में पड़े हुए हैं । लगातार चार महीनों से बन्द आन्दोलन के मार में पड़ी जनता अपनी लोक संस्कृति और परम्परा को बचाने में लगे हुए थे । चार दिन बाजार खोलने के लिए सम्पूर्ण नगरवासी राजी हुए थे । सबकी सोच थी कि हमारी परम्परा है और इसे बचाए रखना हमारा कर्तव्य है । हम आन्दोलन कर रहे हैं अपने अधिकार के लिए यह लड़ाई अपनी जगह है इस का असर हम माँ जानकी विवाह उत्सव पर नहीं पड़ने देंगे बाहर से आए अतिथि को हम सम्मान के साथ रखेंगे, उनके सम्मान में कोई कमी नहीं होने देंगे, इसी बीच थोड़ी सी ही सही शांति की साँस लेंगे । किन्तु ऐसा नहीं हो पाया, उनका सपना–सपना ही रह गया ।
उत्साह के इस माहोल में जनकपुर के लोगों ने जैसे ही सुना कि नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी आ रही है, वैसे ही उनमें नैराश्यता और नाराजगी छा गयी । ऐसा लगा, जैसे उनपर एक बज्रपात हुआ हो । कोई और समय होता तो ऐसा नहीं होता । क्योंकि मधेश की धरती अपने आतिथ्य के लिए जानी जाती है । वहाँ भी अतिथि देवो भव को माना जाता है । लेकिन राष्ट्रपति के जनकपुर आने की खबर ने चार महीनों से पीड़ा झेल रही जनता के लिए आग में घी डालने का काम किया । किसी भी देश का राष्ट्रपति सम्पूर्ण देश की जनता का अभिभावक होता है । राष्ट्रपति बनने से पहले भले ही विद्या भण्डारी किसी पार्टी से सम्बन्धित थीं किन्तु देश का सर्वोच्च पद सम्भालने के बाद वो सम्पूर्ण नेपाल की थीं । किन्तु उन्होंने पद सम्भालने के बाद मधेश के सम्बन्ध में यही कहा कि उन्हें मधेश की माँगों के विषय में कोई जानकारी नहीं है और मधेश की कोई समस्या ही नहीं है । यही कारण था कि उनके आने की खबर सुनते ही, आने से एक दिन पहले ही उनका पुतला दहन हुआ । मधेशी मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने उन्हें पहले ही कहा था, आप के आने से जनकपुर तनावग्रस्त हो जाएगा । हमारा त्योहार और पर्यटकों पर इसका पूर्ण असर होगा । पर हमारी राष्ट्रपति को भला जनता से क्या मतलब, उन्हें तो अपनी शक्ति और तानाशाही दिखानी थी । उन्हें यह दिखाना था कि हम राष्ट्रप्रमुख हंै, हमारे पास सेना है, हम जहाँ चाहें जा सकते हैं । जनता की लाचारी या उनकी खुशी से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता । विवाहपञ्चमी के दिन हवाई सुरक्षा के साथ चप्पल पहने हुए ही जानकी मन्दिर प्रवेश करते समय मधेशी मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काला झण्डा दिखाया । उनके निकलते ही मन्दिर परिसर पूर्णरूप से तनावग्रस्त हो गया । नेपाल प्रहरी, सशस्त्र प्रहरी और जनता के बीच झड़प शुरु हो गयी । नेपाल पुलिस जनता पर अश्रु ग्यास, कुछ राउण्ड हवाइ फायर भी किए । जिससे सैकड़ों कार्यकर्ता और तीर्थालु भी घायल हुए । इस तरह का तनाव पूरा दिन रहा । इस से सम्पूर्ण नगरवासी और तीर्थालु भक्तजन में एक डर त्रास की भावना घर कर गई । भारत से आए हुए तीर्थालु उसी दिन बिना कुछ देखे हुए ही अपने घर को लौट गए, जानकी मन्दिर में जहाँ फूलों की वर्षा होनी चाहिए थी, वहाँ इस बार पत्थर की वर्षा हुई । जहाँ हर्षोंल्लास के साथ सभी इस त्योहार को मनाना चाह रहे थे, वहाँ डर और त्रास का वातावरण बना रहा । बाजार चार दिन के लिए खुलने की जगह चार मिनट के लिए भी नहीं खुल सका । विवाह पञ्चमी का कार्यक्रम राष्ट्रपति के आने से पूर्णरूप से बोधत हो गया ।
किसी भी देश का राष्ट्रपति उस राष्ट्र का प्रमुख होता हंै और सर्वोच्च भी । यह प्रत्येक राष्ट्र के लिए एक सम्माननीय पद है । जनता उसमें अपने अभिभावक को देखती है और अभिभावक वह होता है जिसकी निगाह हर सदस्य पर एक सी हो । अगर अभिभावक की नजर दो तरह की हो जाय तो वहाँ उसका विरोध होना स्वाभाविक हो जाता है । यही जनकपुर में भी हुआ । जनता उनसे नाराज थी और यही नाराजगी उनके विरोध के रूप में बाहर निकली । उनके आने से उनके ही देश में इस तरह का व्यवहार उनके साथ होना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है । किन्तु इसकी वजह भी वह स्वंय हैं । अपने ही देश के एक हिस्से के लिए नकारात्मक सोच इस बात की वजह बनी जिसे बाद में दूसरा ही रूप दिया जाने लगा जो और भी दुखद है । सत्ता और महिला संगठन इस घटना को महिला का अपमान कह कर आन्दोलन को पूरी तरह से बदनाम करने पर तुले हुए हैं किन्तु उन्हें यह समझना होगा कि यह मधेश की ही धरती है जिसके सपूत देश के लिए बलिदान देने में न तो पहले पीछे हटे थे और न आज अधिकार की लड़ाई में अपनी जान देने से पीछे हटेंगे

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