उद्धार और विकास की राह देखता, रामेछाप :विनय कुमार

विनय कुमार

विनय कुमार

मेरी आठ बकरी मर गई, अब तो जीवन गुजारने के लिए भी कुछ नहीं बचा, भूकम्प ने मेरा सब कुछ ले लिया”– रामेछाप लखनपुर डोरखानी के एक विस्थापित परिवार की आवाज है ये । ये एक आवाज नहीं है बल्कि आज रामेछाप के हर घर की तकरीबन यही कहानी है । न तो जीविकोपार्जन का कोई उपाय है और न ही खाने के लिए दो वक्त की रोटी । प्रकृति के कहर से रामेछाप भी नहीं बच पाया है । भूस्खलन और भूकम्प ने नेपाल के नक्शे पर रामेछाप की तस्वीर ही बदल दी है । रामेछाप जनकपुर अञ्चल में पड़ने वाला एक दुर्गम जिला है । सेवा और सुविधा के दृष्टिकोण से भी अति विकट माना गया रामेछाप को बैशाख १२ के विनाशकारी भूकम्प ने और भी डरावना बना दिया है । डोरखानीबासी के डरने का दूसरा कारण भू–स्खलन है । वहां पर समय–समय में निरन्तर भू–स्खलन होता रहता है ।
गत साल के भाद्र माह में हुए भू–स्खलन से आठ दलित बस्ती ही विस्थापित हो गई थी । इस महाभूकम्प से अभी भी निरन्तर रूप मे भू–स्खलन हो ही
रहा है । स्खलन से झिलिङ्गे पर्वत गिर जाने का बहुत बड़ा डर है– रामेछाप के स्थानीय सञ्चारकर्मी बिदुर ढुङ्गेग ने बताया, बस्ती को दूसरे जगह पर स्थापित करने के लिए राज्य और प्रशासनिक पक्षों से निरीक्षण तो हुआ है लेकिन कोई भी सुनवाई अभी तक नहीं हुई है । सञ्चारकर्मी ढुङ्गेल ने आक्रोस व्यक्त करते हुए कहा कि अगर इस बस्ती को जल्द ही पुनस्र्थापित नहीं किया गया तो बड़ी कठिनाई को भुगतना पड़ सकता है । इसी तरह वहीं गाविस के वडा नं. ५ स्थित लप्सीबोट की अवस्था भी दर्दनाक है । बीस साल से भू–स्खलन की चपेट में पड़ते आने पर भी राज्य ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है । इस महाभूकम्प की वजह से कई चुनौतियाँ  लप्सीबोट बासिन्दा के सामने है । भीमबहादुर थापा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर समय में ही सरकार ने उचित व्यवस्थापन नहीं किया तो कोई बड़ी बात नहीं है कि रामेछाप का अस्तित्व ही खत्म हो जाय । रामेछाप का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है । बुजुर्गों ने अपने समय को याद करते हुए कहा कि जमाने में झिलिङ्गे पवर्त से सुन्धारा स्थित
धरहरा में बिजली के बल्ब जलते देखा जाता था  । उसी जगह के एक पर्वत में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतिमा भी देखी जाती है । यहाँ सलाना भव्य तरीके से बड़े मेला का भी आयोजन होता आया है ।
अपने में ऐतिहासिकता को समेटे रामेछाप की स्थितिआज अत्यन्त जर्जर है । वहाँ के बहुत विद्यालय भवन टूट चुके हैं । टूटे हुए भवन में से एक श्री भीमेश्वर माध्यमिक विद्यालय भी है, जो लखनपुर गाविस के वडा न.ं ७ थापागाउँ में अवस्थित है ।
भीमेश्वर विद्यालय की स्थापना ०२८ साल में हुई थी । आज विद्यालय अपनी अवस्था पर स्वयं आँसू बहा रहा है । विद्यालय का हर कमरा पत्थराें से भरा है । सभी सामान नष्ट हो चुके हैं । प्रधानाध्यापक गणेश बहादुर नगरकोटी ने कहा, –‘विद्यार्थियों को पढ़ाने की जगह नहीं है, हमारा कार्यालय सिर्फ पाल के भीतर सीमित है ।’ उन्होंने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि  विद्यालय को व्यवस्थित बनाने के लिए राज्य को विशेष ध्यान देना चाहिए । इस पीड़ा को मीडिया के मार्फत आवाज उठाने के लिए पत्रकारों से आग्रह भी किया । उक्त विद्यालय को सिर्फ आठ थान पाल मिला है । विद्यालय भवन
निर्माण के लिए गाविस से दो लाख रूपैया पाने की बात थापागाउं के स्थानीयवासी एवं एमाओबादी नेता कमानसिंह लामा ने जानकारी दी । लेकिन भीमेश्वर विद्यालय की दयनीय अवस्था पर रामेछाप के जिला शिक्षा अधिकारी का ध्यान अब तक नहीं पहँुच सका है । पाल रखने के लिए मैदान का भी अभाव है तो विद्यर्थियों को बैठने के लिए जगह नहीं है । इसी तरह स्वास्थ्य चौकी का भवन भी पूर्णरूप से ध्वस्त हुआ है ।
स्वास्थ्य चौकी के इन्चार्ज रामनारायण साह ने कहा कि गर्भपतन या जच्चा–बच्चा के लिए
स्वास्थ्य चौकी में कोई सुरक्षित और गोप्य स्थान नहीं है । दवाईयाँ रखने की जगह भी नहीं है । रोगियों के लिए बिस्तर और चौकियों का अभाव है जिसकी वजह से हमें रोज इन समस्याओं का सामना करना पड़ता है । रामेछाप को तीन ‘लाल’ के जिला से भी जाना जाता है । इस जिला में यातायात, शिक्षा, स्वास्थ्य और सञ्चार का पहुँच होने पर भी इसे विकट और दुर्गम ही माना गया है ।  नेपाली इतिहास के पहले शहीद कृष्णलाल अधिकारी, शहीद गंगालाल श्रेष्ठ, नेपाली कम्युनिष्ट पार्टी के संस्थापक महासचिव पुष्पलाल श्रेष्ठ का जन्म भी रामेछाप में ही हुआ है । रामेछाप में राजनीतिकर्मी, साहित्यकार, उद्योगी, व्यापारी लगायत विभिन्न प्रतिभाओं ने जन्म लिया है इसके बावजूद आज तक इसका सही विकास नहीं हो पाया है । कई महान हस्तियों को जन्म देने वाला रामेछाप आज बरबादी के कगार पर
खड़ा है, इस ओर सभी निकायों को ध्यान पहुँचना आवश्यक है । अगर ऐसा नहीं हुआ तो रामेछाप का नाम कल खुद इतिहास के पन्नों पर सिमट कर रह जाएगा ।

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