उधर कुंड, इधर कुआं, चारों तरफ धुआ“ ही धुआ“
प्रो. नवीन मिश्रा

आज की नेपाली राजनीति की दयनीयता देख मुझे भारत के भूतपर्ूव प्रधानमन्त्री अटल-बिहारी वाजपेयी का यह जुमला याद आ रहा है। सर्न्दर्भ ऐसा था कि भारत की तत्कालीन प्रधान मन्त्री इन्दिरा गांधी के द्वारा आपातकाल की घोषणा के बाद सभी विरोधी राजनीतिक दलों ने एकजूट होकर जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में आन्दोलन शुरु किया और उसके बाद हुए आम चुनाव में जनता दल को भारी बहुमत प्राप्त हुआ और मोरार जी देर्साई प्रधानमन्त्री बने। इन्दिरा जी की पार्टर्ीीो बहुत बडÞी हार मिली और यहाँ तक कि इन्दिरा जी खुद भी चुनाव हार गईं। चुनाव के समय जैसा इन्दिरा जी ने आरोप लगाया था कि जनता दल एक नारंगी के सामान है, ऊपर से देखने में एक और अन्दर से सभी फाँक अलग-अलग। हुआ भी कुछ ऐसा ही। जल्द ही जनता दल रुपी नारंगी का छिलका ऊपर से हट गया और इस में शामिल सभी घटक दल कुनबे की तरह विखर गए। इसके बाद न जाने कितने प्रधानमन्त्री बदले और शुरु हुआ, भारतीय राजनीति में अस्थिरता का दौर। इसी सर्न्दर्भ में वाजपेयी जी जयप्रकाश नारायण से मिलने पटना आए थे। उनके बाहर निकलते ही पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया। और सवालों की झडÞी लगा दी। प्रतिउत्तर में कवि हृदय वाजपेयी जी ने सिर्फइतना ही कहा, “उधर कुंड, इधर कूआँ, चारों तरफ धूआँ ही धूआँ।” आप को बता दूँ कि जयप्रकाश नारायण का निवास पटना के कदम कुआँ मुहल्ले में था और दिल्ली के सूरजकुंड इलाके में जनता दल के एक वरिष्ठ नेता का निवास था। आज नेपाल में भी चारों तरफ धूआँ ही धूआँ नजर आ रहा है।
जलेश्वर, बर्दीबास और जनकपुर में कार्यालय हस्तान्तरण को लेकर लगभग एक महीने तक हडÞताल, यातायात बंद तथा छिटफुट हिंसक घटनाएँ होती रही, जिससे इस क्षेत्र का जीवन नारकीय हो गया था। जीवन की रोजमर्रर्ााी वस्तुएँ, नमक, मिट्टी तेल और गैस की जो किल्लत हर्ुइ, वह किसी से छुपा नहीं है। घर में बिजली और टेलिफोन का बिल आना वर्षो से बन्द है। आप मालपोत का पैसा चुकाने जाएँ, गाँव विकास में सचिव नदारद। हालात यह है कि कई मालपोत कार्यालय ने तो पुरानी रसीद पर ही रजिष्ट्री का काम करना शुरु कर दिया है। दिनों-दिन शिक्षा के स्तर का ह्रास हो रहा है। स्कूल तथा काँलेज के शिक्षकों की नैतिकता समाप्त हो गई है। कई जगहों पर कला के शिक्षक पैसों के लालच में विज्ञान पढÞा रहे हैं। अपनी पत्नी और बच्चों को चिट पहुँचाने वाले शिक्षक ही आज परीक्षा नियन्त्रक बने हुए हैं। कदाचार की पराकाष्ठा हैर्।र् इमानदार शिक्षकों पर भी जबरन कदाचार करने का दबाब डÞालते हैं। मना करने पर गाली गलौज पर उतर आते हैं। शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र है, जहाँ योग्यता और इमान्दारिता को तरजीह दी जाती है। सभी तरफ जातीयता, चाटुकारिता तथा पैसों का बोलबाला है। नेताओं के भ्रष्टाचारों के किस्से सुन सुन कर तो कान पक गए हैं। आखिर यह सब कब तक चलेगा – यदि ‘यदा यदा ही धर्मस्य ….’ की बात सही है तो नेपाल में तो अब अवतार हो जाना चाहिए। भारत में इन्ही परिस्थितियों से ऊब कर आपातकाल की सभी घटनाओं को भुलाकर फिर इन्दिरा गाँधी तथा उनकी पार्टर्ीीो जनता ने सत्ता में वापस लाया था। कुछ ही समय के बाद श्रीमती गाँधी दक्षिण के चिकमंगलूर क्षेत्र से चुनाव जीत कर संसद में वापसी की थी। उस समय का बहुत ही प्रचलित नारा था, एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर भाई चिकमंगलूर। काश नेपाल में भी कोई शेर या शेरनी पैदा होती जो इन सभी मुसीबतों से निजात दिला, देश को सही दशा दिशा प्रदान करती।
जो कुछ भी देश में घटित हो रहा है, कहना कठिन है कि उस में कितना मौलिक है, कितना भराऊ और कितना ऊबाऊ। ऊबाऊ को बासीपन भी कहा जा सकता है। जहाँ कोई संवेग उत्पन्न न हो, जहाँ इतिहास ठहरता-सा नजर आए, जहाँ गतिशीलता बंद हो जाए और जहाँ पृष्ठ-पोषण ही प्रमुख हो, उसे हम ऊबाऊ ही कह सकते हैं। देश का चिंतन गम्भीरता से दूर होता जा रहा है। लोक जीवन की मर्यादाएं अब नैतिक आधारों पर नहीं फूल फल रही हैं। नेतृत्व चाहे किसी भी दल का हो उसके अंदर कोई ज्वाला नजर नहीं आती।
महात्मा गांधी ने एक बार कहा था- पार्लियामेंट तो बांझ और वेश्या है। ये दोनों शब्द बहुत कडÞे हैं तो भी उस पर अच्छी तरह लागू होते हैं। मैने उसे बाँझ कहा, क्योंकि अब तक उस पार्लियामेंट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर दबाव डÞालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है। और वह वेश्या है, क्योंकि जो मन्त्रिमण्डल उसे रखे उसके पास वह रहती है। इतना तो सब कबूल करते हैं पार्लियामेन्ट के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाए जाते हैं। सब अपना मतलब साधने का सोचते है। सिर्फडÞर के कारण ही पार्लियामेंट कुछ काम करती है। जो काम आज किया, वह कल उसे रद्द करना पडÞता है। आज तक एक भी चीज को पार्लियांमेंट ने ठिकाने लगाया हो ऐसा कोई मिसाल देखने में नहीं आता। बडÞे सवालों की चर्चा जब पार्लियामेन्ट में चलती है, तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियाँ लेते हैं। उस पार्लियामेंट में मेम्बर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो जाते हैं। एक महान लेखक ने उसे दुनिया की बातूनी जैसा नाम दिया है।
स्वायत्तता के अभाव में संसदीय प्रणाली को मानव समूह का शोषण करने के लिए पूरा अवसर मिला हुआ है। संसदीय प्रणाली को लोकतन्त्र में घोलकर निकालने पर भी उसका मानवीय आस्थावाला स्वरुप नहीं बन सका। लोकतन्त्र में संसदीय प्रणाली के कारण तन्त्र की ही प्रधानता रह गयी। लोक तो केवल इस तन्त्र के लिए इस्तेमाल हुआ। जब तक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में लोक की प्रतिष्ठा नहीं बनती, तब तक ‘लोकतन्त्र’ एक प्रकार की शासन प्रणाली ही रहेगी, उसमें से स्वराज्य का आविर्भाव कैसे होगा – लगता है कि इस देश में कहीं कुछ हो नहीं रहा है। जो हो रहा है, वह र्सार्थक कम, निर्रथक अधिक। जीवन जीने और देश को सही राह दिखलाने की आकांक्षा में हम कहीं घिसटते चले जा रहे हैं। जरुरत यह है कि पद और मद, दोनों से हटकर कोई एक बार सतह से ऊपर उठकर चिंतन की डÞोर को निर्मतापर्ूवक खींचे। आवश्यक नहीं कि इसके लिए राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री या किसी दल के नेता का मुखौटा समीचीन हो।   ±±±

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