उफनती शर्मनाक वारदातें:प्रियंका पाण्डेय

जिम्मेवार कौन ?

 

वैसे तो नेपाल में महिलाओं के ऊपर हिंसा होने की घटना कोई नई बात नहीं है। इस देश में महिलाएं हमेशा से ही हत्या, हिंसा, बलात्कार की शिकार होती आई हैं। हमारे देश के सामाजिक विभेद के कारण भी ऐसी वारदातें होती रहती हैं। कहने के लिए तो नेपाल में महिलाओं की जनसंख्या पुरूषों की अपेक्षा में कहीं अधिक है। लेकिन समाज अभी भी पितृसत्तात्मक सोच से उबर नहीं पाया है। देश में महिलाओं के ऊपर होने वाले ऐसे जघन्य अपराधों की रोकथाम हेतु हर वर्षसरकारी और गैर सरकारी स्तर पर करोडों रूपये खर्च किए जाते हैं। लम्बे लम्बे भाषण दिए जाते हैं। इससे हकीकत बदलना तो दूर महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी भी नहीं आ पा रही है।

उफनती शर्मनाक वारदातें

सबसे दुखद पहलू तो यह है कि जिस समय देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले हिंसा के विरूद्ध १६ दिनों का अभियान चल रहा था, उन्हीं १६ दिनों के दौरान १२ महिलाओं की हत्या, कई बलात्कार की घटना होना ऐसे अभियान पर ग्रहण लगाता है। इतना ही नहीं ऐसे अभियान चलाकर आगे महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कमी लाने का प्रयास भी इस बार धरा का धरा ही रह गया और उसके बाद बलात्कार और हत्या की इतनी वारदातें हर्ुइ, जिससे पूरा का पूरा समाज हिल गया है। ऐसे में सवाल यह भी उठने लगा है कि आखिर ऐसे अभियानों पर करोडों रूपये खर्च का औचित्य कहीं समाप्त तो नहीं होते जा रहा है -! अभियान के दौरान ही महिलाओं के खिलाफ होने वाले अभियान पर जब न्याय नहीं मिल पाता है तब बांकी समय और क्या होता होगा।
इस बार उदाहरण ढूंढने के लिए हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। इस बार ऐसी ऐसी घटनाएं हर्ुइं, जिससे हमारा रूह कांप जाए। भोजपुर की एक युवती के साथ त्रिभुवन अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल पर कार्यरत कर्मचारियों ने ना सिर्फउसके पैसे लूट लिए, बल्कि उसका शारीरिक शोषण भी किया। यह मामला इतना नहीं उछलता यदि बर्दिया की शिवा हासमी को जिन्दा नहीं जलाया जाता। हासमी को कथित रूप से उसके प्रेमी के द्वारा जिन्दा जलाए जाने की बात सामने आने के बावजूद इसके कई पहलू बाद में खुले और अब शंका यह जताई जा रही है कि शिवा हासमी को उसके परिवार वालों ने ही जिन्दा जलाया है। इसके कई तथ्य सामने आए है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी अपनी जांच में इस बात पर गहरी शंका जाहिर की है। पुलिस को भी यह शक है। वैसे कहते हैं कि शिवा को बचाया जा सकता था यदि उसका सही इलाज समय पर होता। लेकिन पुलिस प्रशासन की लापरवाही और राजनीति के भंवर में फंसी सरकार तथा निरीह बन चुकी महिला आयोग की जरा सी देरी ने शिवा की जान ही ले ली। ९० प्रतिशत पूरी तरह से जल चुकी शिवा को तीन दिनों के बाद नेपालगंज से काठमाण्डू के वीर अस्पताल में दाखिल कराया गया। जब उसकी हालत काफी गम्भीर बन गई थी और उसके बचने की कोई भी संभावना नहीं थी। चूंकि शिवा किसी राजनीतिक दल से ताल्लुक नहीं रखती थी और ना ही वह इस देश की कोई पर्ूव मंत्री या नेता थी नहीं तो उसको भी एयर एम्बुलेन्स के जरिये बाहर भेजा जाता।
अभी हासमी का मुद्दा लोगों की जेहन से उतरा भी नहीं था कि बारा जिले के प्रस्टोका में विन्दु ठाकुर का जला हुआ शव मिला। पहले तो लोगों को समझ में नहीं आया लेकिन बाद में उसमें भी जो सच्चाई सामने आई वह दिल दहला देने वाली थी। विन्दु को किसी और ने नहीं बल्कि उसके ही पिता ने जिन्दा जला कर मार डÞाला। मामला अभी पुलिस की जांच के दायरे में है।
इतना ही नहीं इसके बाद तो सरकार भी जगी, महिला आयोग भी और पुलिस प्रशासन भी। बावजूद इसके ऐसी वारदातें रूकने के बजाए और बढÞती ही जा रही है। आए दिन किसी न किसी महिला के साथ बलात्कार की घटना सामने आ रही है या फिर उसकी हत्या की जा रही है। कभी र्सलाही की ममता महतो को उसका पति हत्या कर देता तो कहीं दैलेख की एक महिला को उसका पति सिर्फइसलिए मार देता है क्यों कि उसके मुताबिक वह बीमार औरत उसके साथ सोने से इंकार कर देती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सिर्फपुलिस प्रशासन और सरकार पर सारा दोष मढÞ देने से समाज अपने दायित्व से नहीं बच सकता है। समाज को अपनी जिम्मेवारी लेनी ही होगी। समाज को अपना नजरिया बदलना ही होगा। पुरूष की मानसिकता को बदले बिना ऐसी घटनाओं को चाह कर भी हम नहीं रोक सकते हैं। पुलिस प्रशासन तो उन्हें पकडÞ कर सजा देने का काम कर सकती है लेकिन जब घर में ही बेटियां बाप से असुरक्षित हों, जब एक बाप ही अपनी बेटी को जिन्दा जलाने पर अमादा हो जाए, एक पति ही अपनी जीवन संगिनी का गला काट कर हत्या कर दे, एक निर्दयी इंसान ही जब अपनी पत्नी के यौनांगों पर जलती हर्ुइ अंगीठी झोंक कर हत्या कर दे, एक पडÞोसी ही अपनी प्रेमिका को पेट्रोल छिडÞक कर जिन्दा जलाने पर आमादा हो जाए, महिलाओं की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मी ही जब उसका बलात्कार करे, दहेज के लिए ससुराल वाले ही उसे जहर देकर मार डÞालें या गले में फंदा डÞालकर मार डाले तो नियम कानून या अदालत कुछ नहीं कर सकती है।
आज जरूरत है, महिलाओं के खिलाफ होने वाली हत्या हिंसा के विरूद्ध कठोर कानून और सजा की, जरूरत है पुलिस प्रशासन को चुस्त दुरूस्त बनाने की, जरूरत है- सरकार को सजग होने की लेकिन उससे भी अधिक जरूरत है समाज को महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदलने की। महिलाओं को देखने के नजरिये में जब तक बदलाव नहीं आएगा तब तक नारी की अस्मिता यूं ही लूटी जाएगी, दहेज के लिए यूं ही जलाई जाएगी, प्रेम करने पर यूं ही जिन्दा दफनाई जाएगी।

क्या बलात्कार की कीमत डेढ लाख रूपये है

देश में लगातार बढÞ रहे बलात्कार की घटनाओं के बीच सरकार के एक फैसले ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया। मंत्रिपरिषद की बैठक ने त्रिभुवन विमानस्थल पर वहीं कार्यरत अध्यागमन विभाग के तीन कर्मचारियों के द्वारा सामूहिक बलात्कार किए जाने की घटना के उजागर होने और कई संगठनों द्वारा दोषियों को सजा दिए जाने की मांग के बाद पीडिÞत लडÞकी को डेढÞ लाख रूपये मुआवजा देने की घोषणा कर दी। उस पीडिÞत लडकी को बन्धक बनाकर सामूहिक बलात्कार करने वाले उसकी कमाई की सारी रकम लूटने वाले कर्मचारियों पर कानूनी कार्रवाही की तत्परता दिखाने के बजाय पीडिÞता को आर्थिक मुआवजा देने से ऐसा लगा जैसे कि सरकार मामले को दबाना चाह रही है। बलात्कार करनेवाले कर्मचारियों पर कोई भी कार्रवाही नहीं करना और जांच के नाम पर सिर्फआश्वासन देना सरकार के लिए महंगा पडÞ गया।
सरकार के इस फैसले के बाद आम लोगों में आक्रोश और अधिक बढÞ गया और सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पडÞा। आम लोगों की चेतना जागी और बलात्कार की खिलाफ लोगों का जमावडा प्रधानमंत्री के सरकारी आवास पर पर््रदर्शन के दौरान दिखाई दिया। हालांकि सरकार ने आम लोगों की भावना को समझते हुए तत्काल ही इस घटना में दोषी तीनों कर्मचारियों को गृह मंत्रालय ने बर्खास्त कर दिया। लेकिन लोगों का गुस्सा इतना में ही शान्त होता नहीं दिख रहा है। लोग दोषियों को कानूनी दायरे में लाने और कडी सजा देने की मांग पर अभी भी अडÞे हुए हैं।
सरकार के इस फैसले के खिलाफ प्रधानमंत्री के सरकारी आवास के बाहर जो पर््रदर्शनों का दौर चल रहा था उसी में हाथों में तख्ती लिए लोग पूछ रहे थे कि क्या किसी लडÞकी से बालात्कार की कीमत डेढÞ लाख रूपये है – क्या डेढÞ लाख रूपये में सरकार बलात्कार की इजाजत दे सकती है – पीडित लडÞकी के लिए न्याय की गुहार लगाने वाली महिलाएं कहती हैं कि यह संपर्ूण्ा नारी जाति का उपहास है। बलात्कार के दोषियों को कठघरे के पीछे पहुंचाने के बजाए मामले को दबाने की कोशिश सरकार की तरफ से होना वाकई शर्मनाक है। इस तरह से तो न्याय नहीं मिल सकता है।
साउदी अरब से मार्ग ३ गते स्वदेश वापस आने पर त्रिभुवन अन्तर्रर्ाा्रीय विमानस्थल के अध्यागमन विभाग के कर्मचारियों ने पाया कि भोजपुर की एक युवती किसी और के पासपोर्ट पर अरब देश जाकर आई है। र्राई उपनाम की इस युवती ने अरब से अपनी मेहनत द्वारा कमाई कर लाए गए सभी पैसे अध्यागमन विभाग के तीन कर्मचारियों ने लूट लिया। और बागबाजार एक गेष्टहाउस में ले जाकर उस युवती की गलती का और मजबूरी का फायदा उठाकर तीनों ने बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया। मामला यहीं नहीं रुका इन कर्मचारियों ने उसके बाद भी कई बार उस युवती को बुलाकर उसके साथ रेप किया।
पर््रदर्शनकारियों के मुताबिक इस घटना में संलग्न परशुराम बस्नेत और लूटपाट में संलग्न अध्यागमन विभाग के नायब सुब्बा सोमनाथ खनाल के ऊपर फौजदारी मुकदमा चलाने में सरकार आनाकानी कर रही है। कई समाचार पत्रों में यह खबर प्रकाशित होने के लम्बे समय के बाद भी सरकार ने इस मामले में सरकार की अधिक दिलचस्पी नहीं ली थी। इस घटना में उदासीनता के कारण ही आरजू देउवा ने प्रधानमंत्री कार्यालय के मातहत रहे महिला सशक्तिकरण समन्वय समिति के सल्लाहकार पद से इस्तीफा दे दिया। तब जाकर मामला और अधिक उछला और इसने धीरे धीरे तूल पकडÞा लिया। िि
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