उमाकान्त दास नहीं रहे

एक थका-हारा पत्रकार या सिद्ध सन्त

रामाशीष:नेपाल की राजधानी काठमांडू में ‘न्यूज एजेन्सी जर्नलिज्म -समाचार सेवा)’ की शुरूआत करनेवाले पत्रकारों में एक तथा पहाडÞी-मधेशी राजनीतिक नेताओं, कार्यकर्ताओं, समाजसेवियों तथा पत्रकारों के श्रद्धेय, मर्ूद्धन्य पत्रकार उमाकान्त दास, अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका शनिवार २६ जनवरी की शाम काठमांडू के माँडेल हाँस्पीटल में निधन हो गया। वे ८२ वर्षके थे और पिछले कई महीने से सांस एवं वृद्धावस्थाजन्य अनेक रोगों से ग्रस्त थे। उन का उसी शाम पशुपतिनाथ मंदिर से लगे आर्यघाट पर दाह संस्कार भी सम्पन्न हो गया। उनके भतीजे विजयकुमार दास ने उन्हें मुखाग्नि दी। उनकी एकमात्र पुत्री मीरा भारत के दर्ुगापुर में शिक्षिका हैं तथा वे स्वयं असाध्य रोगों से ग्रस्त रहने के कारण, अपने पूज्य पिता के दाह संस्कार में शामिल नहीं हो सकीं। हां, मीरा-पुत्र को अन्तिम दर्शन का सौभाग्य जरूर प्राप्त हुआ।
दाह संस्कार में उनके परिजनों और जाति-बिरादरी के सदस्यों के अतिरिक्त उनके प्रति श्रद्धावान कुछ ही लोग शामिल हो सके। पता चला सूचना के अभाव और कडÞाके की ठंड के कारण उनके सादा जीवन और संत स्वभाव के प्रति श्रद्धावान बहुत सारे लोग अन्तिम दर्शन एवं श्रद्धा के दो सुमन चढÞाने से वंचित रह गए। मैं उन चुने-गिने नाचीज में से एक हूं जिसे अन्तिम दर्शन और उस पवित्र शव पर श्रद्धा के दो फूल अर्पित करने का अवसर मिला। परमपूजनीय श्री उमाकान्तजी, आपको शत-शत प्रणाम !
मैंने उमाकान्त जी को पहली बार १९६४ में काठमांडू के ओम बहाल टोल के एक मकान में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के श्रीगुरूदक्षिणा कार्यक्रम में देखा था। संघ की ओर से नेपाल में कार्यरत प्रचारक श्री लक्ष्मण राव भिडÞे और श्री जयगोपाल जी के सानिध्य में कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। उस समय भारतीय न्यूज एजेन्सी हिन्दुस्थान समाचार की ओर से श्याम खोसला नेपाल में कार्यरत थे जिनसे मेरा परिचय पटना में हुआ था। तब से लेकर आज तक वह संबंध उमाकान्त जी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में बना रहा। मुझे अफसोस है कि जबतक वे जीवित रहे, होश में रहे, उन्हांेने अपना पांव छूने नहीं दिया और यह अवसर तभी मिला जब वह बेहोशी अवस्था में माँडेल हाँस्पीटल के एक बेडÞ पर लेटे हुए थे।
मैं पांव इसलिए नहीं छूना चाहता था कि वह वरिष्ठ पत्रकार थे और बुजर्ुग थे। बल्कि, इसलिए कि मैंने उनमें मां काली के दिव्य प्रकाश का दर्शन किया था, सपने में नहीं, जागृत अवस्था में ही। घटना १९८० के आसपास की है, मैं हिन्दुस्थान समाचार के दिल्ली कार्यालय से स्थानान्तरित होकर पटना हिन्दुस्थान समाचार में कार्यरत था। एक दिन अचानक पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डाँ. राजेन्द्र राम ने महेन्द्र मुहल्ला स्थित अपने निवास से मुझे फोन किया और कहा आप जल्द से जल्द मेरे घर आ जाईए, बहुत ही गंभीर स्थिति है। उस समय मैं पास ही के गंगा किनारे स्थित रानीघाट के एक मकान में रह रहा था। लगभग पन्द्रह मिनट में ही राजेन्द्र बाबू के यहां पहुंच गया। उन्होंने एक चादर में लिपटे पलंग पर कराह रहे आवाज की ओर इशारा किया और पूछा आप जानते हैं- उस चादर के अन्दर कौन हैं – मैंने कहा, बताइए कौन हैं – राजेन्द्र बाबू ने कहा कि ”यह उमाकान्त जी हैं, मैंने उनके भाई के डेरे से जबर्दस्ती खींचकर उनको अपने यहां लाया है, क्योंकि इन्हें इनके परिवारवालों ने मानसिक रूप से विक्षिप्त करार कर दिया है। जबकि, मेरा विश्वास है ऐसा कुछ भी नहीं है।
मैं कुछ देर तक सोचता रहा, क्या किया जाए – मुझे भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ और मैंने धीरे से उन्हें उठाया और उंची आवाज में कहा ‘उमाकान्त जी, मैं रामाशीष हूं, आप चलिए मेरे यहां। यह कहते ही वह थोडÞा सामान्य हुए। वह कुछ बुदबुदा रहे थे- बस अब अन्त आने ही वाला है, कोई नहीं बचेगा। – मैंने उनके कान में फिर उंची आवाज में कहा- जब सभी का अन्त होना ही है तो फिर चिन्ता किस बात की – आप चलिए मेरे साथ। वह लडÞखडÞाते हुए उठे और मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो गए। मेरा कंधा पकडÞकर चलने लगे। राजेन्द्र बाबू यह परिवर्तन देखकर दंग रह गए, इशारा किया, आप चलिए मैं आपके पीछे-पीछे आ रहा हूं। करीब पन्द्रह- बीस मिनट में हम तीनों रानी घाट पहुंच गए। गर्मी का समय था और लगभग पांच-साढÞे पांच बज रहे थे। मैंने उमाकान्त जी को कहा- चलिए गंगा स्नान करने। वह सहज ही तैयार हो गए। राजेन्द्र बाबू गंगा घाट तक हमलोगों को पहुँचाकर लौट गए। हम दोनों गंगा स्नानकर, अपने डेरे में आ गए। मैंने पूछा कुछ भोजन होगा, उन्होंने कहा क्या भोजन करना, अब तो प्रलय होनेवाला है, सबों को जाना होगा। मैंने कहा, ठीक है जब जाना होगा तो सभी जाएंगे, अभी तो थोडÞा भोजन कीजिए। मैं रोटी सब्जी बनाता हूं। उन्होंने कहा ठीक है कोई फल हो तो ले लेंगे। मुझे स्मरण है मेरे पास केला था और उन्होंने बहुत ही जोर दबाब देने पर एक या दो केला खाया। उसके बाद उन्होंने घर परिवार की थोडÞी बहुत बातें की। और मैंने यह सोचकर सुना कि कहीं इसी बहाने उनके दिमाग में जो भ्रम पैदा हो चुका है, वह दूर हो जाए। इसी उधेडÞ-बुन में रात के लगभग १० बज गए।
तब मैं उन्हें अपने पूजावाले कमरे में ले गया, जहां एक सामान्य मंडप में मां काली तथा दर्ुगा की मर्ूर्ति और कुछ अन्य देवी-देवताओं की तस्बीरें स्थापित थीं। मंडप के सामने एक छोटी सी चौकी पर पूजा के बर्तन, घंटी तथा शंख आदि रखे थे। कुछ फूल भी मैं ले आया था। मैंने उमाकान्त जी से अनुरोध किया ”आपको दर्ुगा सप्तशती कंठस्थ है, आप उसका सस्वर पाठ कीजिए ताकि मुझे भी अभ्यास करने में सुविधा हो। क्योंकि, कहीं-कहीं संस्कृत शब्दों के शुद्ध उच्चारण करने में मुझे कठिनाई होती है। उन्होंने मेरा आग्रह मान लिया और पाठ शुरू किया। उनकी खूबी यह थी कि वह बिना रूके सम्पर्ूण्ा सप्तशती के सस्वर पाठ कर लिया करते थे। गंगा किनारे के उस एकान्त फ्लैट में भगवती का सस्वर पाठ शुरू हुआ और मैं भी स्वर में स्वर मिलाने लगा। मैं बीच-बीच में रुकता भी तो उसका उमाकान्त जी के पाठ पर कोई असर नहीं पडÞता। मुझे लगने लगा- शायद इसे ही ‘समाधि’ या ‘कुंडली जागरण’ की अवस्था कहते हैं। निश्चित रूप से उमाकान्त जी समाधि में जा चुके हैं, मां भगवती ने मेरी सुन ली, उमाकान्त जी सामान्य स्थिति में आ गए। इसी गुन-धुन में रात के करीब डेढÞ बज गए। मैं भी ध्यान मग्न होता गया और कुछ क्षण के लिए यह भूल गया कि मेरे सामने एक सन्त समाधिस्थ हो चुके हैं। इसी बीच आंख बंद की अवस्था में ही मुझे भूकम्प जैसा एक जबर्दस्त झटका महसूस हुआ। दूसरे ही क्षण मैं चौकी से नीचे र्फश पर औंधे मुंह लुढÞक गया और पूजा का मण्डप उलट गया। सभी मर्ूर्तियां बिखर गईं। पूजा के बर्तन बिखर गए। कलश का गंगाजल कमरे में फैल गया। यह सभी घटनाएं एक साथ घटी। कुछ क्षणों तक मैं विहृवल रहा। सोच ही नहीं पा रहा था कि क्या करूं, क्या नहीं – और, दूसरी ओर, उमाकान्त जी पर इस ‘अवस्था’ का कोई असर नहीं। वह तो एक ही आसन और मुद्रा में मंत्र पाठ से वातावरण पवित्र बना रहे थे। पाठ समाप्त होने पर उनकी आंखें खुलीं। मैं विस्मय की स्थिति में था। मुझे लगा कहीं भूकम्प तो नहीं हुआ है – मैंने खिडÞकी के बाहर झांका तो कहीं से कोई चीख-चिल्लाहट की आवाज नहीं थी। इसी बीच उमाकान्त जी बोल उठे, कहिए कैसा हुआ पाठ – मुझे आर्श्चर्य हुआ यह देखकर कि उन्होंने ‘उस भूकम्पी’ क्षणों के बारे में कुछ भी नहीं पूछा। लेकिन हां, उनके सवाल -पाठ कैसा रहा) ने मुझे सामान्य स्थिति में जरूर ला दिया। मैंने अपना लालच उनसे व्यक्त किया। मैंने कहा- एक बार ‘नारायणी पाठ’ दोहरा दें तो बडÞी कृपा होगी। फिर क्या था, उन्होंने फिर पूरी मस्ती में-‘देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वहृनिपुरोगमास्ताम्’ श्लोक से पाठ प्रारंभ कर दिया। मैंने भी पूरे विश्वास के साथ उनका साथ दिया और आज उन्हीं से सीखा हुआ भगवती वन्दना के श्लोकों का मैं आसानी से पाठ कर लेता हूं। उन का दिया यह मंत्र मेरे मन-मस्तिष्क में अन्त तक कायम रहे, यही भगवती से पर््रार्थना है।
सुबह हर्ुइ, और मुझे लगा आज सबकुछ मिल गया, उमाकान्त जी लगभग सामान्य हो गए। ‘तथाकथित विक्षिप्त अवस्था’ समाप्त हो गई। वह दो दिनों तक मेरे साथ रहे और भगवती पाठ से मेरा कान पवित्र करते रहे। तीसरे दिन हमलोग राजेन्द्र बाबू के यहां गए और उसके बाद उमाकान्त जी को उनके छोटे भाई के डेरे में पहुंचा दिया गया।
मैं एक प्रकाशन संस्था की हिन्दी पुस्तकों के बिक्री-वितरण व्यवस्था के लिए पहली बार नेपाल -काठमांडू) आया था जबकि मैंने एक पत्रकार तथा हिन्दुस्थान समाचार के नेपाल ब्यूरो के प्रमुख के रूप में १९७१ में काठमांडू प्रवेश किया। एक पत्रकार के रूप में उमाकान्त जी, उनका दिल्ली बजार स्थित नेपाली प्रेस और परिवार के अन्य लोगों के साथ मेरी निकटता बढÞ गई। मेरे जीवन के हर उतार-चढÞाव में उमाकान्त जी मेरे मार्ग दर्शक बन गए। इसी बीच उनका चैतन्य महाप्रभु के -गौरांगीय मठ, दर्ुगापुर) से सानिध्य बढÞ गया और अन्तिम क्षण में उन्होंने अपने को ‘राधे-राधे’ में विलीन कर दिया। गौरांगीय मठ में दीक्षा लेने के बाद जब वह मुझे दर्शन देने के लिए मेरे यहां आए तो मैंने ‘श्रद्धा भरी चुटकी लेते हुए कहा- आप अब दल-बदलू हो गए, आपने हमारी मां को छोडÞ दिया, आपने सप्तशती को भुला दिया, अब आपसे बात नहीं करूंगा। इस पर वह खिलखिलाकर हंसने लगे और कहा ‘नहीं जानते हो उन्हीं की प्रेरणा से में कृष्ण के शरण में गया हूं, अरे राधा भी वही हैं न। मां काली, दर्ुगा और राधा में कोई अन्तर नहीं’। यह कहकर वह खिलखिला उठते थे और इसलिए भी हर भेंट में मैं उन्हें दल-बदलू कहने से नहीं चूकता था, मुझे उनकी खिलखिलाहट में आनन्द आता था।
नेपाल के पंचायत काल का एक वह कालखंड भी था, जब पंचायती शासन और जनता की स्थिति के बारे में अपने दिल की कसक निकालने के लिए काठमांडू में ऐसा कोई केन्द्र नहीं बच गया था। और, उसमें भी खासकर प्रजातंत्रवादी मधेशियों के लिए एक कप चाय पीने का कोई अड्डा नहीं था। दिल्ली बजार गुरूज्यू चौर स्थित उस ढहते-ढनमनाते गुरूज्यू परिवार के गोशाला के कमरों में बैठायी गई नेपाली प्रेस की मशीनें और उसके दो तीन कमरों में उमाकान्त जी का निवास, ही दशकों तक पंचों, कांग्रेसियों, पत्रकारों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडÞे बन्धुओं का संगम स्थल बना रहा। उनके सामने बैठकर लोग शान्ति महसूस करते थे। लेकिन, हां, अच्छे लोगों के साथ ही, नेपाली प्रेस की टूटी-फूटी कर्ुर्सियांे और बेंचों पर, राजा के प्रति वफादार खुफिया भी अपना आसन जमा लिया करते थे। उमाकान्त जी उनका भी आदर किया करते थे लेकिन जवान पर पूरे नियंत्रण के साथ।
परम सात्त्विक विचार के पत्रकार उमाकान्त, जब कोई सम्पादकीय लिख मारते और मुझे सुनाते तो मैं कह बैठता था ‘आपने क्या लिखा, मैं समझ नहीं पाया। तो वह सम्पादकीय वाक्यों की व्याख्या करना शुरू करते। तब पता चलता कि तानाशाह राजा महेन्द्र और उनके पुत्र वीरेन्द्र के प्रति उनके मन में कितना आक्रोश है। उनके मन-मस्तिष्क में क्रान्ति की धधकती कितनी आग भरी थी, यह तो उनके लेखों के अर्थ समझने के बाद ही पता चलता था। तब भी मैं चुटकी लेने से बाज नहीं आता और कहता ‘उमाकान्त जी, सम्पादकीय के साथ-साथ, उसके शब्दों और वाक्यों की व्याख्या भी छाप दिया कीजिए ताकि मुझ जैसे नाचीज कलम घिस्सू को आपका सम्पादकीय सहज ही समझ में आ जाए। क्योंकि, आपके दार्शनिक विचार तो मुझ जैसों के पल्ले नहीं पडÞता। इस पर भी खिखिला उठते थे। दरअसल बात ऐसी थी तानाशाही पंचायती शासन के दौरान कलम प्रतिबंधित थी और ‘छायावादी लेखों के सिवा, आज की तरह खुल्लमखुल्ला लिखने की तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। ‘दार्शनिक या छायावादी सम्पादकीय’ का यही कारण हुआ करता था जिसे नेपाल से प्रकाशित बुलेटिननुमा अखबार अपनाया करते थे।
सन् २००४ में मैं नई दिल्ली, नागपुर और मुर्म्बई से अपने हृदय रोगों की जांच कराकर लौटा था। उमाकान्त जी भी दर्ुगापुर के गौरांगीय मठ से काठमांडू पहुंचे थे। मैं सेतोपुल के पास एक डेरे में रह रहा था। उमाकान्त जी लगभग रोज मुझे दर्शन देने आ जाया करते थे। वह अपने मन का गुब्बार यदा-कदा निकाला करते थे। इसी क्रम में उन्होंने कई बार कहा ”मुझसे जब घट्टेकुल्लो स्थित घर में कोई मिलने आते हैं, उसमें भी खासकर कोई पत्रकार मित्र, तो मेरा मन अपने ही प्रति घृणा से भर उठता है, मैं ‘डिमोरेलाइज’ हो जाता हूं। मुझे एक ही विचार कचोटने लगता है कि जिस ‘नेपाली हिन्दी दैनिक’ अखबार की ख्याति के सहारे हमारे परिवार में दर्जनों प्रोफेसर, डाँक्टर और इंजीनियर बन गए। इस प्रकार की अट्टालिकाएं खडÞी हो गईं, वही पर ‘नेपाली हिन्दी दैनिक’, ‘न्यूज-प्रिन्ट कागज’ और ‘लेटर प्रिंटिंग प्रेस’ से ऊपर नहीं उठ सका। नेपाली हिन्दी दैनिक, केंचुली नहीं फेर सका, वह उंगली पर गिनने लायक संख्या से अधिक नहीं हो सका। वह अपने चार पेज के दयनीय स्वरूप को नहीं बदल सका। यह कहते-कहते उनका गला रूंध जाता था। उनकी आंखों में आंसू देखकर मैं भी अपने को नहीं रोक पाता था।
उन्होंने एक बार मुझसे कहा ‘मैंने एक बार अपने नाम पर कायम इस कलंक ‘नेपाल हिन्दी दैनिक’ को सदा-सदा के लिए बन्द करने का निर्ण्र्ााले लिया था लेकिन मेरी एकमात्र बेटी मीरा को जब इसकी जानकारी मिली तो उसने ऐसी मार्मिक बात कह दी कि मेरे दिल को छू गया। मीरा ने कहा ‘एहन कोनो काज नहि करबै कि हम्मर नहिरा सदा सदा के लेल छुटि जाए और हमर बेटा के ननिहाल’। अर्थात्, आप ऐसा कोई भी काम नहीं करेंगे जिससे मेरा मायका और मेरे बेटे का ननिहाल सदा-सदा के लिए छूट जाए। उमाकान्त जी ने कहा- मैं मीरा के सामने झुक गया और अखबार का रजिस्ट्रेशन खारिज करने की अर्जी को फाडÞ दिया। लेकिन, मैं यह महसूस करता हूं कि इस अखबार को जिन्दा रखकर मैंने पाप किया। यही कारण है कि मैं आज नेपाल के पत्रकारों के बीच आत्मसम्मान के साथ नजरें मिलाते हुए यह नहीं कह सकता कि नेपाल की हर असहज राजनीतिक परिस्थिति में भी ‘नेपाली हिन्दी दैनिक’ सम्मान के साथ सिर उंचा किए हुए जीवित है’। श्री उमाकान्त दास जी के जीवन की यह कसक, उनकी यह पीडÞा किसे नहीं कचोटेगी – क्या, इससे भी बडÞा ‘पत्रकार’ आज के किसी पत्रकार के दिलो दिमाग में देखने की हम कल्पना कर सकते हैं –
इसलिए आज श्रद्धा भरे मन और दर्द भरे दिल से मैं यह पूछना चाहता हूं- उमाकान्त जी, ‘आप पत्रकार थे या सिद्ध सन्त’ – मेरा शत-शत प्रणाम स्वीकार करें, मेरी कमियों को तो आपने कभी देखा ही नहीं, क्योंकि किसी की कमी के लिए आपके हृदय में कोई स्थान ही नहीं बचा था। आपने तो जाते-जाते अपने हृदय पटल के सारे स्थान, राधे-राधे को सौंप दिया था। हार्दिक क्षमापर््रार्थना के साथ एक बार फिर मेरा शत-शत नमस्कार स्वीकार करें। जय श्रीराधे – जय श्रीकृष्ण।

 

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