उम्मीदों से भरी प्रधानमंत्री ओली की भारत यात्रा : श्वेता दीप्ति (पढ़िये क्या होनेवाला है इस यात्रा में)

तकरार चाहे जितने भी हो जाय वास्तविक सच्चाई यही है कि, दोनों देशों के रिश्तों को जितना सहज बनाया जाएगा देश के विकास की गति उतनी ही सहज होगी ।

डा.श्वेता दीप्ति : काठमांडू , हिमालिनी अप्रैल अंक | प्रधानमंत्री ओली की भारत यात्रा के साथ ही नेपाल में अटकलों का बाजार भी गर्म है । पाने से अधिक खोने के डर के साथ ही सुझावों का सिलसिला भी जारी है । आखिर यह डर कैसा ? अपने आप पर भरोसे की कमी या दूसरे पक्ष पर अविश्वास की अधिकता । कार्य एजेण्डे से अधिक अविश्वास का एजेन्डा लेकर ही आज तक नेपाल के प्रतिनिधि भारत यात्रा करते रहे हैं । नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री का भारत भ्रमण स्वाभाविक भ्रमण है । कई बार यह सवाल उठता रहा है कि नए प्रधानमंत्री की पहली विदेश यात्रा भारत ही क्यों होती है ? सवाल करने वाले चाहे जिस भी मानसिकता के साथ यह सवाल करें पर इन दो देशों के बीच के रिश्तों के इतने आयाम हैं कि उन्हें अनदेखा कर नेपाल की राजनीति सही दिशा प्राप्त नहीं कर सकती है । वह देश जहाँ नेपाल के बीस लाख से भी अधिक लोग रोजगार के लिए निवास करते हैं, जहाँ नेपाल के युवा भारतीय सुरक्षा निकाय में कार्यरत हैं, जिसके साथ देश का सबसे अधिक व्यापार होता है, जिसकी वजह से नेपाल के पर्यटन में इजाफा होता है, उसे नजरअंदाज नेपाल के प्रतिनिधि कर ही नहीं सकते हैं । यह और बात है कि सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी भारत के खिलाफ भाषणबाजी ही होती है पर सत्ता पर काविज होने के बाद वस्तुस्थिति से नजरें नहीं मोड़ी जा सकती हैं ।

हर बार भारत पर यह आरोप लगता रहा है कि, भारत नेपाल को समान दृष्टि से नहीं देखता उसकी नीयत में खोट है और वह सिर्फ अपने हित को आगे रखना चाहता है । अगर एक बार इन सारे आरोपों को सच मान भी लिया जाय तो क्या हम अपनी कमजोरी को अनदेखा कर सकते हैं ? आखिर हमारा नेतृत्व जो नेपाल की जनता के समक्ष भारत का विरोध करते नहीं थकते हैं, वो भारत की धरती पर जाकर इतने निःसहाय क्यों हो जाते हैं ? अपनी बात, अपनी सोच और सबसे बड़ी बात कि अपना एजेन्डा वहाँ जाकर क्यों विस्मृत हो जाता है ? या फिर उनके पास कोई एजेन्डा ही नहीं है सिवा इसके कि उन्हें अपनी सत्ता टिकाए रखने की परवाह है, देश के विकास की नहीं ?

विश्लेषक मानते हैं कि नेपाल भारत का सम्बन्ध समान राष्ट्रीय हैसियत का नहीं है, बल्कि शासक वर्ग की स्वार्थ सिद्धि पर आधारित है । विदेश नीति का आधार राष्ट्रीय हित होता है जो शायद आज तक नहीं हो पाया है । इसलिए आज एक बार फिर प्रधानमंत्री ओली पर नजरें टिकी हुई हैं कि वो भारत जाकर क्या करते हैं ? नेपाल स्वतन्त्र, सार्वभौम राष्ट्र है इस सच से भारत इनकार नहीं कर सकता और यही अपेक्षा नेपाल की जनता भारत से चाहती है कि भारत नेपाल की अस्थिरता, शासक वर्ग की स्वार्थपूर्ति का सहयोगी न बन कर नेपाल के साथ एक स्वस्थ सम्बन्ध का आधार रखे । हालाँकि यहाँ अपेक्षा तो हमें अपने नेताओं से होनी चाहिए क्योंकि बिकने या बेचने का दारोमदार उन पर टिका हुआ है । आप किससे कितना प्रभावित होते हैं और किसे कितना प्रभावित करते हैं यह खुद पर निर्भर करता है ।

दो राष्ट्रों के बीच महत्तवपूर्ण विषयों पर बहस होती रही है और यह स्वाभाविक सी बात है कि सामने वाला पक्ष अपने राष्ट्र के हित की ओर अधिक सतर्क रहेगा । ऐसे में कौन सा रुख अपनाएँ और अपने हित को साधें, ये कूटनीति तय करती है । जहाँ दो राष्ट्रों के बीच किसी विषय पर साझेदारी की बात होती है, वहाँ सबसे पहली आवश्यकता पारदर्शिता की होती है । किसी विषय पर अगर मतभेद है तो क्यों है इसका खुलकर विश्लेषण करना ही समय का सही तकाजा होता है और उस पर चर्चा करने की आवश्यकता होती है । दो राष्ट्रों के बीच किसी साझे विषय पर टक्कर स्वाभाविक है, पर उसका हल निकालने के लिए कूटनीतिक पहल का होना भी नितांत आवश्यक होता है । स्पष्ट विचारों के साथ बहस की जरुरत होती है । साझेदारी के विषय में कोई मसला गोप्य नहीं होता वहाँ विषय से सम्बन्धित हर बिन्दु पर खुलकर विचार और अपना पक्ष मजबूती के साथ रखने की आवश्यकता होती है, चाहे वह किसी प्रकार की पूर्व संधि हो या व्यापारिक योजनाएँ या भौतिक पूर्वाधार की बातें । हम २१वीं सदी में जी रहे हैं जहाँ समानता और स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है और अभी के समय में किसी के दवाब या डर की गुँजाइश नहीं है । विश्व परिदृश्य इसका गवाह है ।

बावजूद इसके एक कटु सत्य यह है कि, हमारी अस्थिरता और कमजोर विदेश नीति ही हमें विकास की राह से पीछे कर रही है । भारत के साथ की परियोजनाओं की जब भी चर्चा होती है तो गण्डकी नहर, उपरी कर्णाली, अरुण ३, पंचेश्वर, हुलाकी परियोजनाओं में हो रही देरी की चर्चा अवश्य होती है । पर क्या सचमुच यह सिर्फ भारत की वजह से हो रहा है ? इसमें नेपाल की कोई कमजोरी नहीं है ? यह विश्लेषण का विषय है । यूँ ही आरोप लगा देना और अपनी कमियों से मुँह मोड़ लेने से समस्या का समाधान सम्भव नहीं है । कर्मचारी तंत्र और राजनीतिक नेतृत्व के द्वारा किया जाने वाला आरम्भिक कार्य ही अगर पूरा नहीं किया जा रहा है तो आगे की राह तो जटिल होगी ही । भारत की तरफ से हो रही कमियों से पहले नेपाल की कमजोरियों पर भी ध्यान देना पहली आवश्यकता है ।

प्रधानमंत्री की यात्रा के साथ ही दो मुद्दों पर विशेष ध्यान बुद्धिजीवियों का जा रहा है पहला यह कि क्या पंचेश्वर की परियोजना कार्यान्वित होने के तरफ कोई मजबूत पहल होगी और दूसरी यह कि क्या प्रधानमंत्री भारतीय निवेशकों को एक सकारात्मक सोच दे पाएँगे ?

बहुत दिन नहीं हुए जब पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा भारत यात्रा में गए थे और वहाँ पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना का विस्तृत प्रतिवेदन एक महीने के भीतर तैयार करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई थी । परन्त इतने महीनों के बाद भी इसमें कोई प्रगति नहीं हुई है । इस विषय को लेकर इस बार फिर प्रधानमंत्री यात्रा में एजेण्डा तैयार किया गया है । सम्बन्धित निकाय के अधिकारियों के अनुसार यह परियोजना तीन मुद्दों पर अटकी हुई है । पहला निचले शारदा बैरेज के पानी पर भारतीय पक्ष द्वारा माँगा गया अग्राधिकार, दूसरा विवाद निवेश का है, भारतीय पक्ष ५५ प्रतिशत निवेश करना चाह रहा है और बाकी का ४५ प्रतिशत निवेश नेपाल के हिस्से में है । जबकि नेपाल सिर्फ ३७ प्रतिशत निवेश करना चाह रहा है । इस मसले पर भारत की ओर से फिलहाल कोई जवाब नहीं आया है परन्तु अधिकारियों का मानना है कि इसमें भारत लचीला हो सकता है । तीसरा विवाद परियोजना से वर्ष भर में उत्पन्न बिजली की मात्रा है । नेपाल द्वारा १९९५ में तैयार डीपीआर में ९७० मेगावाट बिजली उत्पादन की बात थी, जबकि अभी के हालात में पानी के घटते बहाव के कारण बिजली का उत्पादन ७६७ मेगावाट रह गया है । इस विषय को भी अधिकारी मानते हैं कि भारतीय पक्ष की ओर से सहमति हो चुकी है परन्तु लिखित रूप में सहमति होनी बाकी है । पंचेश्वर परियोजना के लिए पूर्व प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा के द्वारा की गई महाकाली संधि को आज तक विवादित माना जाता है, जबकि वर्तमान प्रधानमंत्री ओली को इस संधि के समर्थक और भारत के मित्र के रूप में विगत में पहचान मिली थी । हालाँकि पिछले दिनों में प्रधानमंत्री ओली को भारत के विरोधी के तौर पर ही देखा गया है । परन्तु यह राजनीति है, यहाँ मित्रता और शत्रुता के भावनात्मक पहलू नहीं होते हैं । दो देशों के बीच का रिश्ता देश के हित से आबद्ध होता है । जिस महाकाली संधि को लेकर एमाले दो धार में बँट गई थी आज के परिदृश्य में वो एक हो चके हैं । ऐसे में यह उम्मीद की जा रही है कि पंचेश्वर परियोजना को एक सकारात्मक दिशा मिलेगी । क्योंकि भारत भी इस विषय को लेकर इसके सही निदान की अपेक्षा कर रहा है जिसकी पहल भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल यात्रा के दौरान की थी । इस परिदृश्य में यह आशा की जा सकती है कि शायद इस बार कोई सही निर्णय लिया जा सकता है ।

नेपाल के विकास के लिए नेपाल में विदेशी निवेश की आवश्यकता है और हम सभी जानते हैं कि नेपाल का सबसे ज्यादा व्यापार भारत से होता है और हमारी भौगोलिक संरचना ऐसी है कि भारत से इस दिशा में हम अधिक अपेक्षा रख सकते हैं । पिछले दिनों भारत और नेपाल के रिश्तों में जो तिक्तता आई है, उसका असर यह हुआ है कि भारत के निवेशक स्वयं को नेपाल में निवेश करने के लिए तैयार नहीं कर पा रहे हैं । कोई भी निवेशक अविश्वास के माहोल में अपनी पूँजी नहीं लगाना चाहेगा । ऐसे में प्रधानमंत्री की इस यात्रा से नेपाल यह उम्मीद कर रहा है कि प्रधानमंत्री भारतीय निवेशकों को एक सुरक्षित माहोल देने का आश्वासन जरुर देंगे और उन्हें नेपाल में निवेश के लिए तैयार कर पाएँगे ।

तकरार चाहे जितने भी हो जाय वास्तविक सच्चाई यही है कि, दोनों देशों के रिश्तों को जितना सहज बनाया जाएगा देश के विकास की गति उतनी ही सहज होगी । नारे या दावे विरोध के जितने भी कर लिए जाय, पर भारत के साथ बढ़ी हुई तिक्तता को समाप्त करना ही देश हित में होगा । दोनों देशों को एक दूसरे की आवश्यकता है इसमें कोई संदेह नहीं है बस सुधार के लिए एक कारगर कदम की अपेक्षा है ।

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