उलझनों का दौर जारी

श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति

बड़े ही तामझाम के साथ सुझाव संकलन की प्रक्रिया सम्पन्न हो गई । नेताओं का उनके ही चुनाव क्षेत्र में विरोध किया गया तो कही. नेतागण बन्द कमरे और प्रहरी सुरक्षा के बीच सुझाव संकलन करते नजर आए जहाँ नागरिक कम प्रहरी अधिक थे । खैर, लोकतंत्र की परिभाषा को सिद्ध करने की कोशिश सरकार के द्वारा की गई, ये और बात है कि ये परिभाषा देश के कई हिस्सों में खण्डित होती नजर आई ।
मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गई पहले से हो गया है जहा“ और भी खराब ।
फिलहाल श्रावण में संविधान लागू होने की सम्भावना दूर–दूर तक नजर नहीं आ रही और इसकी वजह से सत्ता पक्ष में खासकर एमाले समूह में बैचेनी बढ़ती नजर आ रही है । संघीयता और सीमांकन तथा नागरिकता के मुद्दों पर मधेश की जनता पूरी तरह से, मसौदे को नकार चुकी है । ऐसी हालात में मधेशवादी नेतागण मधेशी जनता की इच्छाओं के विपरीत जाकर अगर समझौते करती है तो यकीनन उन्हें मधेश के कोपभाजन का शिकार होकर भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है और अगर सत्ता पक्ष बहुमत के आधार पर संविधान जारी करती है तो देश के एक महत्वपूर्ण हिस्से को वह प्रतिरोध के उस आग में झोकेगी जिसकी तपिश पूरा राष्ट्र महसूस करेगा । हर ओर विरोध की हवा चल रही है । आदिवासी जनजाति, महिला, दलित, मुस्लिम सभी असंतुष्ट हैं । धर्मनिरपेक्षता या धर्म स्वतंत्रता विरोध इस विषय पर भी है । और सत्ता फास्टट्रैक पर संविधान लाने के लिए आतुर है । सवाल यह उठता है कि जब किसी पक्ष को संतुष्ट ही नहीं किया जा रहा है, सम्बोधित ही नहीं किया जा रहा है तो यह संविधान आ किसके लिए रहा है ?
सुझाव या दवाब, वजह चाहे जो भी हो संघीयता और सीमांकन पर एक बार फिर सहमति का प्रयास जारी है किन्तु यहाँ भी बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने के लिए तैयार है । अब देखना यह है कि छोटी मछली अपने अस्तित्व को कितना सुरक्षित रख पाती है । सीमांकन का जो प्रारूप सामने आ रहा है उस शक्तिविहीन संघीयता को मधेश की जनता तो कभी नहीं मानेगी यह जाहिर सी बात है । खैर, उलझनों का दौर जारी है और जनता निष्कर्ष की प्रतीक्षा में नजरें बिछाए हुए है ।
हिमालिनी परिवार को साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति के प्रति समर्पित व्यक्तित्व संस्कार भारती के संस्थापक योगेन्द्र बाबा जी का सम्मान करने का सुखद अवसर प्राप्त हुआ । कुछ लोग सचमुच समय से परे होते हैं वो समय की सीमा में कैद नहीं होते समय उसके साथ चलता है । वयोवृद्ध बाबा जी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा ही है । उनके सान्निध्य ने हमें गौरवान्वित किया ।
एक परिवर्तित युग की तलाश में हम सब हैं, देश की दशा और दिशा पर उम्मीद भरी नजरें टिकी हैं किन्तु इन सब के बीच दुष्यन्त की ये पंक्तियाँ मस्तिष्क में कौंध रही हैं—
मूरत सँवारने में बिगड़ती चली गई
पहले से हो गया है जहा“ और भी खराब ।shwetasign

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