ऊर्जा समझौताः सम्भावनाओं की दस्तक

ओम प्रकाश:आज से अडÞतालीस वर्षपर्ूव अभियंता हरिमान श्रेष्ठ ने मास्को पावर इन्स्टीच्यूट में पीएचडÞी के लिए प्रस्तुत किए शोध-प्रबन्ध में नेपाल में तिरासी हजार मेगावाट जल विद्युत् उत्पादन की सम्भाव्यता की बात क्या कही थी, यहीं से ऊर्जा के क्षेत्र में मुँगेरीलाल के हसीन सपने देखने का जो दौर प्रारम्भ हुआ, वह आज तक जारी है । तस्वीर का दूसरा रूख यह है कि अपनी क्षमता की पहचान के आधी शताब्दी गुजर जाने के बाद भी हमारी उत्पादन-क्षमता हजार मेगावाट तक भी नहीं पहुँच पाई है । फिर स्थिति का एक पक्ष यह भी है कि हमारी सम्भाव्य क्षमता का अनुमान उस समय की तकनीकी क्षमता के आधार पर किया गया था । लेकिन आज की परिस्थितियाँ बदली हैं और आज के सर्न्दर्भ में इस क्षमता का पुनर्मूल्यांकन होना शेष है ।
आज भारत के साथ अत्यधिक व्यापार घाटा नेपाल के अर्थतंत्र की चुनौती मानी जा रही है । विदेश जाने वाले नेपाली कामदारों से प्राप्त होने वाला रेमिटेंस हमारे भुक्तान-संतुलन को कुछ हद तक ठीक तो करता है, लेकिन उसका सामाजिक प्रभाव वीभत्स है । हमेें सोचना होगा कि हमारे व्यापार घाटे को ठीक करने के ठोस उपाय क्या हो सकते हैं – हमारा यथार्थ यह है कि कृषि उत्पादन के द्वारा इस क्षेत्र में हम ऊँची छलाँग लगा नहीं सकते, औद्योगिक उत्पादन के लिए कच्चे माल के लिए भारत पर हमारी निर्भरता बहुत अधिक है । वन सम्पदा का दोहन हम कर नहीं सकते क्योंकि इससे प्राकृतिक रूप से सुन्दर देश का पर्यावरण संतुलन बिगडÞने का खतरा है । इसलिए बढÞते व्यापार-घाटे को नियंत्रित करने के लिए जलस्रोत, पर्यटन और प्राकृतिक औषधियाँ ही बेहतर विकल्प हो सकती हैं । इसमें भी र्सवाधिक महत्वपर्ूण्ा जलविद्युत का व्यापार है । मान भी लिया जाए कि भविष्य में नेपाल की आवश्यकता विद्युत् के क्षेत्र में बहुत बढÞ जाती है तो भी ठीक उसी तरह हमारे लिए इसका व्यापार आवश्यक है जिस तरह किसान स्वयं द्वारा उत्पादित अनाज या कृषि उत्पादन की बिक्री कर अपनी अन्य आवश्यकताओं की पर्ूर्ति करते हैं । इसलिए भारत के साथ संभावित विद्युत-व्यापार का विरोध किसी भी रूप में राष्ट्र के लिए शुभकारक नहीं हो सकता ।
हम भविष्य के एक ऐसे नेपाल की कल्पना करें जहाँ दो रूपए प्रति यूनिट विद्युत् उपलब्ध होती है । बिजली आप जितनी चाहें उपभोग करें, विद्युत् कटौती -लोडशेडीङ्ग) भी नहीं । आर्थिक परिसूचकों की बात करें तो नेपाल का व्यापार घाटा तकरीबन समाप्त हो गया हो और हमारा प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन दक्षिण एसिया में सबसे अधिक हो । हम नेपाली नागरिक अपने घर, कार्यालय, कारखानों के साथ खाना बनाने और मोटरर्साईकिल और गाडÞी चलाने के लिए भी करीब-करीब मुफ्त बिजली का उपयोग करते हों । प्रदूषण का स्तर तो लगभग शून्य हो गया हो । अगर यह सपनों का नेपाल बन सकता है तो सिर्फभारत और नेपाल के बीच जलविद्युत-समझौता से ही बन सकता है । आज नेपाल की जनता यह सपना दिल में संजोए हुए है ।
अनुमान के मुताबिक नेपाल मे जल विद्युत् उत्पादन की सम्भावना ८३ हजार मेगावाट है । नेपाल में उत्पादित विद्युत् के दो ही खरीददार हैं । एक नेपाल स्वयं और दूसरा भारत । आज के दिन नेपाल की अपनी विद्युत् आवश्यकता सिर्फ१२०० मेगावाट है । अगर नेपाल अपनी जलविद्युत उत्पादन-क्षमता का दोहन कर आर्थिक रूप से समृद्ध बनना चाहता है तो भारत का बाजार आवश्यक है । निकोला टेसला नाम के एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने सन् १९०० में दावा किया था कि विद्युत् को बेतार -वायरलेस) तरीके से सम्पे्रषित किया जा सकता है । लेकिन उनका दावा सिर्फप्रचार भर बन कर रह गया और सन् १९४३ में उनकी मृत्यु हो गई । अगर भविष्य में विद्युत् का बेतार सम्पे्रषण सम्भव हो पाया तो विश्व में ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत बडÞी क्रान्ति हो सकती है, जो नेपाल के लिए अवसर भी होगा और चुनौती भी । लेकिन हम निकोला टेसला के अविष्कार के इंतजार में बैठे रहे तो हमारी शक्ति और संसाधन का क्षय होता रहेगा, विकास तथा समृद्धि के लिए हम तरसते रहेंगे ।
लम्बे समय से भारत के साथ जलविद्युत सहयोग की बात होती रही है । लेकिन जमीनी स्तर पर जब भी कोई बात बनने को होती है तब भारत एवं नेपाल के कुछ तथाकथित विशेषज्ञ कोई न कोई बखेडÞा खडÞा कर मामले को उलझा देते हैं । पूरे विश्व में ऊर्जा की तीन लाँबियाँ अपने व्यापारिक हितों के पोषण करने के लिए सक्रिय हंै । पेट्रोलियम, कोयला और आणविक ऊर्जा के कच्चे माल का उत्पादन करने वाले देश नहीं चाहते कि विश्व के किसी भी कोने में किसी भी प्रकार की वैकल्पिक ऊर्जा का विकास हो । नेपाल में जल-विद्युत का विकास का सीधा असर उनके व्यापार पर पडÞता है । नेपाल में जलविद्युत के विकास का मतलब उनके पेट्रोलियम, कोयले या यूरेनियम की बिक्री का कम होना है । कदाचित यही कारण है कि सत्ता के गलियारों एवं मीडिया जगत में जल विद्युत् विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय उनके एजंेट नेपाल-भारत के सहयोग से जल विद्युत् विकास में पिछले ५ दशक से बाधा पहुँचाते आ रहे हैं ।
नेपाल-भारत के बीच विद्युत् ऊर्जा के व्यापार की शुरुआत में विलम्ब से जितना नुकसान भारत को हुआ है, उससे कहीं अधिक नुकसान नेपाल का हुआ है । जो पानी और समय बह गया वह वापस नहीं आ सकता । हमें समझना चाहिए कि बहते पानी के रूप में किसी न किसी तरह हमारी ऊर्जा क्षमता बह रही है ।
भारत के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेपाल आगमन ने पारदर्शी, भरोसेमंद एवं विश्वसनीय सहयोग की सम्भावनाओं को एक बार फिर जगा दिया है । आज नेपाल की जनता चाहती है कि किसी न किसी स्तर पर भारत के साथ जल विद्युत् में व्यापार की बात एक तार्किक निष्कर्षपर पहुँचे ।
नेपाल लम्बे समय से चरम विद्युत-संकट के दौर से गुजर रहा है । जनता दैनिक १६-१६ घंटे तक की लोडशेडीङ्ग से गुजर करने के लिए बाध्य है । हम मुँह ताकते रहे लेकिन विश्व का कोई भी तीसरा देश हमारे यहाँ कोई मेगाप्रोजेक्ट लगाने के लिए नहीं आया । वे सिर्फअपनी झोली में लाइसेंस रख कर पाँच सितारा होटलों में सेमीनार करते नजर आए । यह स्पष्ट था कि उनकी रुचि नेपाल के बाजार में नहीं वरन भारत के बाजार में अधिक थी । आज जब फिर से नेपाल-भारत की बातें हो रही हैं तो वे चाहते हैं कि नेपाल में जल विद्युत् का विकास हो तो उसकी मलाई उन्हेें खाने को मिले । तीसरे देश नेपाल के जलविद्युत् से प्राप्त होने वाले मुनाफे में अपना हिस्सा सुरक्षित नहीं होता देख कोई ना कोई व्यवधान खडÞा करवाने की कोशिश में लगे हैं ।
अगर जलविद्युत संयन्त्र स्थापना के लिए द्रुतगति से प्रयास होते हैं तो सम्भव है कि आगामी ७ से १० वर्षो में २० हजार मेगावाट विद्युत् नेपाल से निर्यात हो सकता है । भारत आज अपने यहाँ करीब २ लाख ४७ हजार मेगावाट विद्युत् का उत्पादन कर रहा है । नेपाल का बीस हजार मेगावाट जल विद्युत् भारत की अपनी आवश्यकता के सामने ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ केे समान है । इस २० हजार मेगावाट जल विद्युत् के लिए भारत अपनी सुरक्षा चिंता की अनदेखी नहीं कर सकता है । भारत जैसा देश अपने व्यावसायिक हितों के लिए कोई भी ऐसा काम नहीं करेगा जो उसकी सुरक्षा अवधारणा के विपरीत हो । नेपाल को भी भारत के साथ विद्युत् व्यापार समझौता करते समय भारत की धारणा के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता दिखाते हुए अपने व्यावसायिक हितों को सुरक्षित करने की बात सोचनी चाहिए । नेपाल भारत के बीच विद्युत् व्यापार शुरू होता है तो इसकी अनंत संभावनाएँ हैं । एक बार व्यापार शुरू होता है तो अविश्वास के बादल अवश्य छटंेगे । इसलिए दोनों देशों को चाहिए कि वे परस्पर विश्वसनीय एवं हितकारी होने वाली शर्ताे के साथ विद्युत-विकास और विद्युत-व्यापार समझौता करें ।
विश्व में सभी देश अपने-अपने संसाधनों से वैकल्पिक ऊर्जा के विकास के लिए प्रयासरत हैं । आणविक ऊर्जा में फास्ट रिएक्टर के विकास के लिए कई विकसित देश संयुक्त प्रयास कर रहे हैं । यूरोपीय यूनियन, अमेरिका, भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, जापान एवं रूस संयुक्त शोध भी कर रहे हैं । आने वाले १५-२० वषर्ाें में विद्युत् ऊर्जा उत्पादन के नए स्रोत विश्व के सामने हो सकते हैं । नेपाल ने पाँच दशक का समय गँवा दिया है । नेपाल के सामने अपनी जलविद्युत-क्षमता को देश की समृद्धि के लिए उपयोग करने का अधिक समय नहीं बचा है । अगर सामने से गुजरते हुए अवसर को हम नहीं पकडÞ सके तो वह अवसर सदार्-र्सवदा हमारे सामने उपस्थित रहेगा -ऐसा नहीं होता ।
भारत ने अमेरिका के साथ आणविक ऊर्जा सहयोग समझौता किया । इस समझौते का भारत के सभी विपक्षी दल विरोध कर रहे थे । मनमोहन सरकार ने अपनी सरकार को जोखिम में डाल कर भी यह समझौता किया क्योकि वे समझते थे कि इस समझौते का दूरगामी प्रभाव देश के हित में होगा । नेपाल के सत्तारूढ दल बहुमत में हैं और देश-हित में समझौता करने के लिए उन्हें अपने कदम नहीं डÞगमगाने चाहिए ।
प्रकृति में ऊर्जा का अजस्र स्रोत समाया है । प्रकृति जल को बादल के रूप में हिन्द महासागर से सगरमाथा तक लाती है और फिर वह बादल जल के रूप में हिमालय से सागर तक की यात्रा करता है । यह जल कभी सूखी जमीन की प्यास बुझाता है तो कभी बाढÞ की विभीषिका बन हमारे लिए अभिशाप बन जाता है । आज मानव ने इस जल से विद्युत् निकालने की प्रविधि विकसित कर ली है तो उस अभिशाप को वरदान में बदलने का एक अवसर हमारे सामने उपस्थित है । प्रकृति में उपलब्ध किसी भी शक्ति का मानव सकरात्मक या नकारात्मक प्रयोग कर सकता है । सकारात्मक प्रयोग दैविक वृत्ति है तो नकारात्मक प्रयोग आसुरी वृत्ति है । अगर हम दैविक धर्म का पालन करते हुए सकारात्मकता की दिशा में कदम नहीं बढÞाते है तो भविष्य में आसुरी वृत्तियाँ हावी होंगी । भविष्य के जल युद्ध का उपकरण बनने का या इस देव-भूमि को अपने खोए गौरव की ओर लौटने के विकल्प हमारे सामने है । यह समझौता सिर्फनेपाल-भारत के व्यावसायिक हितों से ही नहीं जुडÞा है बल्कि यह दक्षिण एसिया में सहयोग के एक नए दौर का शुभारम्भ करेगा, इसलिए बिना अवसर गँवाए दोनों सरकारों को सकरात्मकता की ओर अपने कदम बढÞाने चाहिए ।
-इमेल ः omयालभउब२निmबष्।अिom)

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: