एकीकरण एक मात्र विकल्प

बृषेशचन्द्र लाल:मधेश के तीन अग्रणी राजनैतिक शक्तियाँ -तर्राई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीमधेशी जनअधिकार फोरम तथा सद् भावना पार्टर्ीीजन्हानंे े मधशे आन्दाले न का नते त्ृ व किया ह ै एकीकरण की प्रि क्रया म ंे ह।ंै सच कहा जाय ता े इन तीना ंे म ंे मानसिक एकता हा े ही गर्इ ह।ै तीना ंे क े शीषर् नते त्ृ व संयुक्त विचार-विमर्श से अब साझी रणनीति पर चल रह े ह ंै आरै दसू री पं िक्त क े नते ाआ ंे का े एकीकरण का संयुक्त प्रस्ताव तैयार करने को कहा गया ह।ै मधशे क े पम्र खु राजनै ितक दला ंे के बीच एकीकरण से नेपाली राजनैतिक परि दश्ृ य एव ं सत्ता सतं लु न म ंे महत्वपण्ू ार् बदलाव हागे ा। राजनै ितक क्षत्रे म ंे यह महत्वपण्ू ार् ही नहीं ऐतिहासिक घटना भी होगी। नेपाल के राजनै ितक क्षत्रे आरै सचं ार म ंे इस े महत्व क े साथ देखा जाना इस बात का प्रमाण है। मूलतः पृथ्वीनारायण शाह एवं उनके वंशज द्वारा किया गया राज्य विस्तार – तथाकथित नेपाल का एकीकरण) के बाद से ही मधेशी जनता को राज्य की गतिविधियों में न्यायोचित सहभागिता नहीं दी गई। मधेशी निरन्तर चाहते रहे कि अर्द्धऔपनिवेशिक मानसिकता के तहत उन्हें पीडिÞत नहीं किया जाय।

बृषेशचन्द्र लाल

बृषेशचन्द्र लाल

उन पर जारी राजनैतिक विभेद और परिणामतः उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक विभेद से उन्मुक्ति के साथ ही बराबरी का अधिकार दिया जाय। अपनी इस आकांक्षा की परपर्ूर्ति के लिए मधेशी जनता प्रथम मधेश व्रि्रोह से ही मधेश में एक प्रभावकारी राजनैतिक शक्ति का निर्माण एवं संघटित अभियान के पक्ष में थी, जिसे पहले ही समझा जाना चाहिए था लेकिन शर्ीष्ा नेतृत्व में व्यक्तिगत अहंजन्य भ्रम के कारण ऐसा न हो सका। परिणामस्वरुप लक्ष्य एक होते हुए भी ताकत विभाजित रही। मधशे विदा्र हे क े क्रम म ंे मचे ी स े महाकाली तक के मधेशी एवं थारू जनता के बीच देखी गर्इ अभतू पवर्ू एकता पद्र शर्न स े दा े बात ंे स्पष्ट हर्ुइ थी – १. बराबरी का अधिकार और स्थान पान े क े लिए सम्पण्ू ार् मधे िशया ंे का एक हाने ा जरुरी है तथा २. संघीय प्रणाली अर्न्तर्गत स् वशासन एवं सह-शासन से ही पहचान और सम्मान के साथ बराबरी पाई जा सकती है। संघीय प्रणाली और मधेश एक स्वायत्त प्रदेश मधशे क े सभी राजनै ितक दला ंे का सयं त्तु m एजेण्डा तो बना मगर इसके लिए अपरिहार्य एकता सम्भव न हो सकी। मधेश व्रि्रोह-२ से ही मधशे अधिकारवादिया ंे क े बीच एकता आरै अधिकार सम्पन्नता के लिए वृहत् राजनीतिक शक्ति निर्माण का प्रयास प्रारम्भ हुआ था मगर उस े सफलता नही ं मिल सकी थी। उन पय्र ासा ंे म ंे मधशे आधारित इन राजनै ितक दला ंे क े बीच एकता का स्वरुप और सारभूत सम्भव प्रणाली की खोजी पर जोर दिया जाता था। लोग नजदीक भी पहचँु त े थ े ले िकन एकता क े लिए अनिवार्यतः आवश्यक तत्व संधि-मानसिकता का ही आभाव था। सारे प्रयास र्व्यर्थ हो जाते थे। संविधानसभा- २ के निर्वाचन पश्चात् शर्ीष्ा नते त्ृ व पं िक्त म ंे इस आवश्यकता का बाधे हअु ा है। मजबूती से एक होने की मानसिकता बनी ह।ै आरै लगता ह,ै अब मधे िशया ंे का पभ्र ावकारी राजनैतिक शक्ति का निर्माण तथा बराबरी के लिए सुदृढÞ संयुक्त अभियान निश्चित है। चनौतीपर्ूण्ा स्थिति विघटित संविधानसभा से संविधानसभा- २ में मधेश एजेण्डा तथा स्वायत्तता प्राप्ति का संर्घष्ा कुछ अधिक ही चुनौतीपर्ूण्ा होगा।

वैसे समानुपातिक मत संख्या में ज्यादा अन्तर नहीं है मगर मधेशवादी दल प्रत्यक्ष की तरफ अवस्य सिमट गई है। इसका असर भी पडÞेगा। संघीयता तथा स्वायत्तता के सम्वन्ध में नेपाली काँग्रेस और नेकपा एमाले की मनोवृति एवं प्रवृति को देखते हुए पहचानयुक्त संघीयता तो क्या वहाँ संघीयता के मांग को ही खारिज करने का भरपूर कोशिश होगी। संघीयता के स्थान पर विकेन्द्रीकरण का वकालत होगा, जिसमें सभी संघीयता विरोधी खस वर्चस्ववादी इकÝे होंगे। वे लगातार अपनी अभिव्यक्तियों में जातिय तथा क्षेत्रिय पहचानयुक्त संघीय संरचना की अवधारणा जनता द्वारा अस्वीकृत हो गई, ऐसा कह कर स्पष्ट संकेत दे रहे हैं। नेकपा एमाले और राप्रपा ने अपने सभासदों को शपथ ग्रहण के वक्त दाउरा-सुरुवाल पहनने के लिए उर्दी ही जारी कर दी। इस से एक भाषा एक भेष की नीति आगे बढÞाने की कसरत फिर से शुरु की जाएगी और देश की अन्य भाषायी तथा पहनावे वाली संस् कृति को नकारने का अभ्यास चालू होगा। इन दलों के मधेशी सभासदों ने जिस सहजता से उस उर्दी का पालन किया है उससे बराबरी के लिए जारी संर्घष्ा में उनकी कायरतापर्ूण्ा नकारात्मक भूमिका का ही संकेत मिलता है। इसका यह भी अर्थ है कि नेपाली काँग्रेस, एमाले और अन्य खस वर्चस्ववादी शक्तियाँ विविधता को परिभाषित करना नहीं चाहते।

आवरण @ बृषेशचन्द्र लाल एकीकरण एक मात्र विकल्प मधेश के मुद्दों में एकरुपता होते हुए भी मधेशवादी दल एक दूसरे से लडÞते रहे हैं। जिससे सांगठनिक मजबूती पर प्रतिकूल असर पडÞा है। एकीकरण से सशक्त सांगठनिक आधार बन सकता है। यदि आप अपने अवगुण कचरा भगवान को दे दें तो कोई भी व्यक्ति आप पर कीचडÞ नहीं उछालेगा। उनके अर्द्धऔपनिवेशिक मानसिकता में अभी भी परिवर्तन नहीं हुआ है। जातीय तथा क्षेत्रीय पहचानयुक्त संघीय संरचना देश में जातीय और क्षेत्रीय आधार पर विभेदपर्ूण्ा स्थिति में रहने के लिए बाध्य सिमान्तकृत नागरिकों का प्रमुख एजेन्डा है। सभी जानते हैं, वर्चस्व को प्रमुखता देकर संविधान निर्माण के वक्त अगर इसे नकारा गया तो समान अधिकार न मिलने तक देश टकराव के बवंडर में फंस जाएगा। लगता है, कुछ लोग इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं या इस भयंकर परिणाम से अनभिज्ञ हैं। संविधानसभा- २ में संविधान निर्माण का काम निश्चय ही विघटित संविधानसभा की तुलना में कठिन और ज्यादा द्वन्द्वपर्ूण्ा र हेगा।

काँग्रेस-एमाले, एमाओवादी, मधेशवादी- आदिवासी-जनजाति और राप्रपा नेपाल जैसे चार शर्ीष्ास्थ नेताओं की उपस्थिति से उत्पन्न स्थिति की अगर सही व्यवस्थापन नहीं कीर् गई तो संविधान निर्माण का कार्य आसान नहीं होगा। वैसे भी माओवादी वैद्य समूह संविधानसभा से बाहर होने के कारण इस से निर्मित कोई भी संविधान विवादास्पद तो बनी ही रहेगी। इन सब मस्तुलों में मधेशी तथा आदिवासी जनजातियों का शर्ीष्ास्थ नेता विभेद पीडितों और सीमान्तकृतों का प्रतिनिधित्व कर ते हैं। अतः संविधानसभा-२ में जातीय तथा क्षेत्रीय पहचानयुक्त संघीयता, समावेशिता एवं स्वशासन के अधिकार के लिए लडÞने की जिम्मेदारी इसी शर्ीष्ास्थों को उठानी होगी। और सभी तो सत्ता और सत्ता में हिस्सेदारी के लिए ही भागेंगे। पहचान, विविधता की सहभागिता और समावेशिता इनके वास्तविक एजेण्डा में नहीं हैं। अतएव, मधेशवादी और आदिवासी जनजातियों का सशक्त धुरी का निर्माण एवं मधेशी तथा आदिवासी जनजातियों के बीच कार्यगत एकता जरूरी है। इसके लिएर् र्सवप्रथम मधेशियों के बीच सम्पर्ूण्ा एकता की आवश्यकता होगी। ऐसी एकता के आभाव में मधेशी पहचान और स्वशासनयुक्त स्वायत्त मधेश की स्थापना होना सम्भव नहीं है। ललकार के साथ-साथ अवसर भी बहुराष्ट्रीय नेपाल में मधेशियों का अपना हर्ीर् इतिहास, संस्कृति, भूगोल, आर्थिक प्रणाली और आवोहवा है।

इस तरह मधेशी समुदाय एक अलग राष्ट्र होते हुए भी मधेशी जनता कभी अपने आप को देश की मुख्य धारा से अलग रखना नहीं चाहा। सदैव समता के आधार पर और अपनी उपस्थिति के अनुपात में राज्य के सम्पर्ूण्ा गतिविधियों में सहभागिता और उसके लिए आवश्यक समावेशी समायोजन की मांग करती रही। लोकतन्त्र से इसका समाधान निकलेगा, यह सोचकर राणा, पंचायत, प्रतिगमन सहित सभी आन्दोलनों में पर्ूण्ा सक्रियता के साथ लडÞे। मगर अन्तरि म संविधान लागू करते वक्त संघीयता के विरुद्ध षड्यन्त्र और धोखाधरी किया गया तो मधेशियों में अपनी राष्ट्रियता का पुनर्जागरण हुआ, जो मधेश व्रि्रोह के क्रम में प्रस्फुटित हुआ। प्रथम संविधानसभा के निर्वाचन में इसे स्पष्टतः महशूस किया गया। फिर भी उस निर्वाचन में भी मधेशी के ऊपर मधेश में व्याप्त जातिवाद हावी रहा। विगत निर्वाचन में अवसरवाद के साथ फिर से जातिवाद का कलंक देखा जा रहा है। मधेशवादियों के सामने यह सबसे बडÞी चुनौती है। जब तक मधेश का विकास नहीं होगा, मधेशियों की आकांक्षा का पूरी नहीं होगी। एकीकरण और उसके बाद नेतृत्व की एकजूटतापर्ूण्ा एकीकृत अभियान से ही जातिवाद को कमजोर और मधेशी को मजबूत किया जा सकता है। मधेशियों में राजनैतिक जागरुकता का बांछनीय अभिवृद्धि मधेश अधिकारवादी र ाजनैतिक शक्तियों के लिए दूसरी बडÞी चुनौती है।

राजनैतिक अधिकार प्राप्ति के लिए एक अग्रसर तथा प्रतिनिधि राजनैतिक शक्ति का सुदृढीकरण अत्यावश्यक है। विगत निर्वाचन में ऐसा नहीं देखा गया। राजनैतिक जागरण के अभिवृद्धि में शिक्षित एवं समाज के अग्रिम पंक्ति की प्रभावकारी भूमिका होती है। लेकिन मधेश के शिक्षित, पेशागत और तथाकथित उच्चवर्ग में अवसरवादिता तथा तुष्टिवादी व्यवहार हावी है। सम्पर्ूण्ा मधेश को बृहत्तर हित और दूरदृष्टि के आभाव में तात्कालिक नाफे-नुक्सान की अल्पदृष्टि से देखने की प्रवृति जडÞ जमाये बैठी है। समावेशिता और आरक्षण की व्यवस्था से अधिकतम लाभ पानेवाले ही मधेश बिर ोधी शक्तियों को सहयोग किया है। विगत निर्वाचन को नजदीक से देखनेवालों का यही अनुभव है। इसके औचित्य को प्रमाणित करने के लिए भले ही इसे मधेशी नेताओं को सबक सिखाना कहें मगर आज निर्वाचन के २ महीने बाद वे ही ‘अपने ही पैर पर कुल्हारी’ जैसी उक्ति का अनुभव कर रहें हैं। एकीकृत पार्टर्ीीे समावेशिता और आर क्षण से प्राप्त अवसरों पर अनुशंसा करते वक्त औचित्यपर्ूण्ा योग्यता को आधार बनाए जाने की परम्परा बनाकर मधेशी अधिकार प्राप्ति के लिए आवश्यक राजनैतिक जागर ण आधार मजबूत बनाने का अवसर प्राप्त किया जा सकता है। मधेश में भावनात्मक एकता तो है मगर सांगठनिक आधार का निर्माण नहीं हो सका है। मधेश में रहनेवाले आदिवासी जनजाति तथा अन्य पहाडÞी मूल के नागरिकों के साथ सद्भावपर्ूण्ा समन्वय की कार्यनीति के आभाव के कारण सांगठनिक स्थिति मजबूत नहीं हो सकी है। मधेश के मुद्दों में एकरुपता होते हुए भी मधेशवादी दल एक दूसरे से लडÞते रहे हैं। जिससे सांगठनिक मजबूती पर प्रतिकूल असर पडÞा है।

एकीकरण से सशक्त सांगठनिक आधार बन सकता है। एकीकृत पार्टर्ीीे मधेश के न्यायोचित मांगों के साथ मधेश में बसोबास करने वाले आदिवासी, जनजाति तथा अन्य पहाडÞी मूल के नागरिकों को जोडÞने का प्रयास होना चाहिए। अगर ऐसा हो सका तो संभवतः शीघ्र होने वाले स्थानीय निर्वाचन में मधेशवादी दल अच्छी स्थिति में आ सकती है। गाविस और नपार् इकाईयों में स्थायी मजबूत सांगठनिक निर्माण भी हो सकता है। यह मधेशवादी दलों में एकीकरण नेपाल के राजनैतिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक घटना होगी। मोर्चा के निर्माण से सभा और संसद में सहकार्य को मजबूती प्रदान की जा सकती है। मगर एकीकरण से जन्मा मधेश का एकीकृत प्रतिनिधि पार्टर्ीीी मधेश की असली प्रतिनिधि पार्टर्ीीो सकती है। यह सही है कि सभी मधेशी पार्टियों को एक स्थान पर नहीं लाया जा सकता है और न तो इसका यह अर्थ है कि एकीकरण के बाद मधेश में कोई दूसरी मधेशी पार्टर्ीीहेगी ही नहीं। तमलोपा, मजफो नेपाल और सद्भावना का एकीकरण होने के बाद एकीकृत पार्टर्ीीें कोई और मधेशी पार्टर्ीीमाहित ही न हो सकेंगे ऐसा भी नहीं है। इस एकीकरण में आने के लिए नई पार्टर्ीीो भी स् वागत है। कुछ लोग एकीकरण के इस प्रयास के प्रतिक्रिया स्वरुप सामानान्तर एकीकरण का डÞर भी दिखा रहे हैं जब कि डरने की कोई बात नहीं। दूसरी एकीकृत पार्टर्ीीा निर्माण भी सकारात्मक कदम ही होगा। विभाजन के न्यूनीकरण में यकीनन वह भी एक योगदान ही होगा। l

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