एक अच्छी पहल :श्रीमन नारायण

shrimannarayanनेपाल सदभावना पार्टी एवं संघीय सद्भावना पार्टी के बीच हुई एकीकरण के बाद अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या अन्य मधेशवादी दल भी इसी राह पर चलेंगे या फिर अलग डफली और अलग राग ही अलापते रहेंगे ।
नेसपा और संसपा के एकीकरण का प्रयास पिछले सात महीनाें से चल रहा था । शर्त, बेशर्त तथा आखिर में मामुली शर्तो पर यह एकीकरण संभव हो पाया । एकीकरण के बाद पार्टी का नाम नेपाल सद्भावना पार्टी ही होगा जबकि इसके अध्यक्ष अनिल झा होंगे । वहीं सह अध्यक्ष श्रीमती सरिता गिरी होंगी । पार्टी का नाम, झण्डा, चुनाव चिन्ह सभी नेसपा का ही रहेगा । इस एकीकरण के बाद जँहा एक ओर संविधान सभा मे नेपाल सदभावना पार्टी का प्रतिनिधित्व अब मुमकिन हो पाया है वहीं अनिल झा उस ऐतिहासिक एवं गौरवशाली पार्टी के अध्यक्ष बनने में सफल हुए हैं जिसका नेतृत्व कभी गजेन्द्र नारायण सिंह किया करते थे या फिर श्रीमती आनन्दी देवी सिंह तथा सरिता गिरी ने किया था । अथक प्रयत्नो के बावजूद अन्य लोग इस एकीकरण अभियान मे सफल नहीं हो पाये थे । तथा अलग चुनाव चिन्ह लेकर उन्हे राजनीति करनी पड़ी । सदभावना नामधारी संगठन देश में अभी भी है परन्तु गजेन्द्र नारायण सिंह तथा आनन्दी देवी सिंह की नेतृत्व वाली पार्टी तो वही है जिसका चुनाव चिह्न पंजा है । anil jha and sarita giri
इस एकीकरण से एक और नेसपा को संसद मे विगत २४ वर्षो से प्रतिनिधित्व करने का क्रम फिर से जुड़ गया है वहीं पार्टी यह दावे के साथ कह सकती है कि पेड़, सूर्य एवं हल के वाद पंजा छाप ने भी लगातार २४ वर्षो से संसद मे पं्रतिनिधित्व किया । इस एकीकरण से एक लाभ यह भी हुआ की मधेश के विभिन्न गांवो मे हजारों ऐसे लोग हैं जो गजेन्द्र बाबु की पार्टी तथा नेसपा के साथ जुड़ना चाह रहे थे परन्तु पार्टी की जर्जर संगठनात्मक अवस्था के कारण वे लोग खामोश रहना अधिक पसन्द करते थे । परन्तु अब उनकी दुविधा भी समाप्त हो गई है तथा लोग इससे जुड़ने लगे थे ।
मधेशवादी दलाें की एक कमजोरी यह भी रही है कि एक नेसपा को छोड़ बाकी मधेशवादी दल एवं उसका नेतृत्व जातिवाद के आरोपों से मुक्त नहीं रहा । मधेशवादी दल नाम के तो मधेशवादी हैं परन्तु व्यवहार मे जातिवाद हावी है । यही कारण रहा है कि बहुत कम समय में ही फोरम एवं तमलोपा जैसे दलो को विभाजन से दो–चार होना पड़ा ।
मधेशवादी दल चले थे मधेश मे नेपाली कांग्रेस एवं नेकपा एमाले का विकल्प बनने तथा माओवादी के प्रभाव को रोकने परन्तु पद एवं सत्ता की लालसा के कारण वे सभी उपरी तौर पर तो मधेशी एकता का नारा देते थे परन्तु आन्तरिक रूप में एक दूसरे की टांग खिंचाई मे केन्द्रित हो कर रह गए । संगठन विस्तार के नाम पर एक दूसरे के संगठन को कमजोर करना तथा आरोप प्रत्यारोप भी एक दूसरे पर ही करने लगे नतीजतन अपनी विश्वसनीयता गँवाने लगे और मधेश की जनता भी बडेÞ दलो पर ही भरोसा करने लगी । बहुत कम समय में मधेशवादी दलों ने विश्वसनीयता गंवा दी । पहली संविधान सभा मे इसके सभासदों ने कतिपय अच्छे काम भी किए । सरकार में रहकर बढि़या काम भी हुआ है, परन्तु इसका प्रचार लोगाें तक सही तरीके से नहीं हो पाया । बड़े दलाें के नेता एवं कार्यकर्ता इनके उपर तमाम सारे आरोप लगाते रहे परन्तु आरोपों का खण्डन करने के बजाय ये लोग एक आपस मे ही लड़ते रहे । वर्तमान अवस्था यह है की मधेशवादी दल बड़े दलो का पिछलग्गु बन कर ही राजनीति करना चाहते हंै । कोई दल नेपाली कांग्रेस का करीबी है तो कोई एमाले का । एमाओवादी के नेतृत्व मे तो सभी दल आन्दोलन में है ही । बडेÞ दलो से सहानुभूति समर्थन एवं सहयोग की उम्मीद रखना घातक साबित हो रहा है । मधेशवादी दल बड़े दलाें के साथ नजदीकी बनाने के बजाय अगर आपस में एकजूट होकर एक सशक्त मोर्चा बनाते हंै तो यह कहीं अधिक कारगर साबित हो सकता है ।
क्या कारण है कि वि.सं.२०६३।०६४ के मधेश आन्दोलन सरीखा यह आन्दोलन प्रभावकारी सावित नही हो पा रहा है ? इस ओर मधेशी दलाें का ध्यान जाना चाहिए ? अभी भी अगर सभी मधेशी दल एकजूट होकर मोर्चा बनाए तो उनका आन्दोलन प्रभावकारी साबित हो सकता है ।
नेसपा एवं ससपा एकीकरण के बाद अब अन्य मधेशवादी दलो को भी इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए । जिन्हें जिन्दगी भर अध्यक्ष बने रहने की चाहत है तथा एक क्लब की तरह पार्टी को चलाना चाहते हैं उन्हे तो शायद अप्रिय ही लगेगा परन्तु जिन्हें सचमुच मधेशियों की चिन्ता है वे जरूर ही एकीकरण का प्रयास करना चाहेंगे । संविधान सभा के चुनाव में मिली असफलता के बाद नेपाली कांग्रेस एवं नेकपा एमाले के नेताओ के व्यंग वाण वैसे ही मधेशवादी दल के कार्यकर्ताआें का मनोबल कमजोर किए हुए है । नेताओं के पास भी एमाले नेताओं के सवालाें का माकूल जबाव नहीं होता है । ऐसी अवस्था मे एकजुटता ही इन्हें बचा सकती है । पद और कुर्सी की लालच नेपाली कांग्रेस एवं एमाले के नेताओ में भी है परन्तु इनके नेताओं के पास गजब की हजम क्षमता है मधेशवादी दलों के नेता खुलकर सरकार पर आरोप नही लगा पा रहे हंै । काठमाण्डु की मीडिया तो इनके विरोध में है ही । मधेश के गांवो में जाकर भी वे अपनी बांते नही कह पा रहे हैं । संघीयता जो की मधेशवादी दलो के लिए जीवन मरण का प्रश्न है । इसके लिए उन्हें तीन मोर्चा पर काम करना होगा । पहला नेसपा के तरह पार्टी एकीकरण करना इसका सिर्फ ओर सिर्फ मधेशवादी दलो की मोर्चा ओर तीसरा हाल के तीस दलीय मोर्चा में अपनी भूमिका को नेतृत्वदायी बनाना । सबसे बेहतर विकल्प तो एकीकरण ही है ।

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