Sun. Sep 23rd, 2018

एक ओर मधेशियों की लाशे गिरती रही, दूसरी ओर व्यापारी माफिया मालामाल बनते रहें

मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु),बीरगंज, ७ मार्च |

मधेश आंदोलन की असफलता हम पचा नहीं पा रहे है। आंदोलन की जितनी कमजोर कड़ियाँ रही है, उनका पड़ताल करना, उन्हें उजागर करना हमारा कर्तव्य बनता है। हमने इसे अभियान के रूप में लिया है। आंदोलन के दैरान रोज रात को बिरगंज के आदर्श नगर चौक पर तस्करी का माल इकठ्ठा होता था, फिर वही से दूसरे जगह भेजा जाता था। जिस समय बैंक बंद थे, पैसे कहा से आते थे ? कौन इस पर लगानी करता था ? बाजार बंद होने के समय नेपाली रुपया, भारतीय रुपया में कैसे बदलता था ? आइए इसकी पड़ताल करते है।

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दारुका का सोने का कारोबार है, ये चीन से सोना मंगाते है। चीन के सोने में गुणवत्ता और सस्ता होता है। इसे पिघला कर गहना बनाना फायदेमंद होता है। ये सोना तस्करी के माध्यम से भारत भी भेजते है। हाल में ही इनका तस्करी का पांच किलो सोना भारत के सुगौली में पकड़ा गया था। ये सोना ले-देकर कालाधन सफ़ेद भी करते है। दूसरे है जैन बंधू जो हवाला के माध्यम से पैसे पहुचवाते है। दोनों नेपाली-भारतीय रुपया सतही के माफिया है, और ईनके कार्य से राजस्व का जो घाटा होता है, सो अलग।

बंद के दौरान जब बैंक बंद थे, व्यपारियों को माल मंगाने के लिए भारतीय रुपए की जरूरत पड़ी। दारुका ने नेपाली रुपया के बदले सोना दिया, व्यपारियो ने ये सोना ख़ुद तस्करी कराकर भारत पहुँचाया, जो व्यपारी तस्करी कराने में असमर्थ थे, उनसे दारुका ने अतिरिक्त रकम लेकर सोना पहुचवाया। जिनके पास पैसे थे उन्होंने जैन बंधुओ से हुंडी-हवाला के द्वारा पैसे भेजवॉए। तब जाकर रक्सौल में व्यपारियो का माल-सामान आया।

रक्सौल में माल आ जाने के बाद इनलोगो ने राजू पटेल और इनर यादव नाम के बदमाशो से संपर्क किया। इन बदमाशो ने रक्सौल से सटे गांव-टोल परेउवा, परसौनी, डंकन रोड, भेलाही, सहदेवा-महदेवा से अपने गुर्गो को तैयार किया, जिसमे महिलाये और बच्चे तक शामिल थे। पहले और अभी भी इनके गैंग की ये औरते- बच्चे रक्सौल से मुज्जफरपुर और गोरखपुर तक ट्रेन के टॉयलेट में माल-सामान की तस्करी करते है। बंद के दौरान दिनभर ये औरते-बच्चे नदी के रास्ते सारे माल का कार्टून लाकर आदर्श नगर के गोदाम में पहुचाते।

जो बड़े और भारी सामान थे वे रात को सायकल, रिक्शा और टाँगा से आदर्श नगर गोदाम में पहुचता था। जिस दिन माल ज्यादा लाना होता था, उस दिन योजनाबद्ध तरीके से इनके गुंडे मितेरी पुल पर हंगामा, झगड़ा करते थे, उस समय सब का ध्यान मितेरी पुल पर होता था। झगडे के कुछ घंटो में पूरा बिरगंज मितेेरी पुल पर जमा हो जाता, और बाक़ी सारे तस्करी के रास्ते से ध्यान हट जाता। फिर बड़ी चालाकी से माल पास हो जाता। इस काम में बिरगंज और रक्सौल के थाना- पुलिस की मिलीभगत रहती थी।

आदर्श नगर के गोदाम में माल जम्मा होने के बाद, वहा भन्सार, राजस्व, प्रशासन के एजेंट उन सामान का कमीशन वसूलते और अपने कोड में कुछ पर्ची बना कर देते, उस कोड को दिखाने पर आगे के रास्ते में माल को कोई नहीं पकड़ता था। जब आधी रात हो जाती तो ये सारा माल ट्रक पर लोड़ करके आगे भेज दिया जाता था।s-2

गौरतलब है की ये माल इतने बड़े पैमाने में आते थे की पुरे छौ महीने के आंदोलन में पुरे नेपाल में माल पहुचता रहा। पर्सा- बारा इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के बहुतायत फैक्ट्री चलता ही रहा। नेपाल की सम्पूर्ण आपूर्ति ठप्प करने के उद्देश्य के नाकाबंदी किया गया। मगर इन व्यपारी और माफियाओ के तस्करी के कारण आंदोलन असफल हो गया। एक तरफ मधेशियों की लाशे गिरती रही, दूसरे तरफ माल-सामान का कार्टून गिरता रहा। आश्चर्य तो तब और ज्यादा होता है, जब ये माफिया आंदोलन में करोडो कमाते रहे और आंदोलन समाप्त होने पर शहीद परिवार को दस हजार का सहयोग करके वाहवाही ले रहे है। आंदोलन फिर होगा, उसमे भी यही खेल होगा, इसलिए हरेक मधेशी का कर्तव्य बनता है, ऐसे नकाबपोश, हैवान को बेनक़ाब करे।
                       जय मधेश।।

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