…. एक ढूंढो लाखों मिलते हैं

मुकुन्द आचार्य:यरों के लकड दादा मिर्जा गालिब ने फरमाया थाः वेवकूफों की कमी नहीं गालिव । एक ढूंढो हजार मिलते हैं । खुदानखास्ता गर वे जिन्दा होते तो आज के दौर में फरमाते- बेइमानों की कमी नहीं गालिब । एक ढंूढो लाखों मिलते हैं । आज का माहौल ऐसा खुशनुमा है, जिधर देखों बर्ेइमानों की नईर्-नई फसलें पनप रही हैं । फलफूल रही हैं । खैर… !
मेरी अकल मारी गई थी, जो मैं ऐसे माहौल में कुर्छर् इमानदार लोगों को ढूढेने निकल पडा । एक कहावत है न- मूंड मूंडाते ओले पडे । समाज जिसे नम्बर वन चोर कहता है- वही मिल गया । उस वेवकूफ को भी आज ही मिलना था ।
मिलते हीं मैंने प्रश्न दागा- तिवारी जी, सुनता हूँ, आप बहुत हर्ीर् इमान्दार शख्स हैं । अपनर्ीर् इमान्दारी का कोई कारनामा पेश कर सकते हैं – उन्होंने छूटते हीं कहा, जनाव एक दो बातें हो तो बताऊ । अपन के खाते में तोर् इमानदारी के ऐसे-ऐसे नायाब मोती भरे पडे है, आप सुनेगे तो आप के होस उडÞ जाएंगे । मैंने उन्हें हकीकत की जमी पे घसीटा- सुनाइए तो सही ! हम भी अपने कानों को पाक करलें ! गला साफ करते हुए तिवारी जी ने फरमाया- मैंने आज की तारीख तक तीन सौ से ऊपर गरीब बेसहारा लडÞकियों और आरतों को खाडी मुल्कों में सैर सपाटे के लिए भेज दिया । इस नेक काम के वास्ते खुदा ने अपनी दरियादिली दिखाते हुए मुझे छप्पर पाडÞके दौलत दी । मैं खुदा का शुक्रगुजार हूँ । खुदा का दिया, आज मेरे पास सब कुछ है । वैसे तो लोग मुझ पर तोहमत लगाते हैं कि तिवारी जी लडकियों को औरत बनाकर विदेश भेजते हैं । अरे बरखुदरदार ! जो लडÞकी यहाँ से काम करने के वास्ते दूसरे मुल्कों में जाएगी, वहाँ के मर्द भी तो कली को फूल बनाने के गुर बखूवी जानते हैं । बेहतर तो यही होगा, हम खुद लडÞकियों को औरत बनाकर क्यों न निकासी करें । इस में गलत क्या है, भैये – जो तालीम गैर मुल्कों में कोडेÞ की मार पे दी जाती है, उससे बेहतर तालीम हम मुहब्बत के साथ यहीं मुहैया करा देते हैं तो इस में इतनी हाय तौवा मचाने की जरुरत क्या है – मेरी समझ में तो कुछ नहीं आता । खुदा जानता है, हम तो सिर्फखिदमतगार-मददगार हैं – और क्या !
पीण्ड छुडÞाने के लिए मैने मक्खनवाजी की, खुदा आप को सलामत रखे । आप जैसे नेकदिल इन्सान को बदनाम करते हुए लोगों को तनिक भी शरम नहीं आती । इन शैतानों को तो दोजख में भी जगह नहीं मिलेगी । जन्नत की तो बात ही छोडिÞए । तिवारी जी की तारीफ में कसीदा गढÞकर मैं वहाँ से खिसक लिया । वे चाय पिलाने के लिए छटपटाते रह गए । दिल ने मुझे खबरदार किया, पाप की कमाई वालेसे चाय मत सुडÞको ।
एक दूसरे जनाव नमूदार हुए । उनके चार मंजिला दौलतखाने में, हर कमरे में जुआ खेलाया जाता है । जिसकी किस्मत मारी गई है, वह हंसते हुए आता है और रोते हुए जाता है । कोई मंुह लटकाते हुए आता है और जाते वक्त में ऊँट की तरह शिर उठाए जाता है । एसे ही एक बन्दे ने जुआखाना चलाने वाले की जवान लडÞकी को ही उठा ले गया । माँ-बाप ने भी मुहल्ले में मिर्ठाईयाँ बांटी, चलो शादी के दस लाख तो बच गए । शादी की परेशानियों से भी बच गए । आम का आम गुठली का दाम !
इनसे बातचीत की तो बोले, मैं तो समाजसेवी ठहरा । कोई हारता है तो कोई जीतता है । यह तो उनकी तकदीर की बात है । मैं क्या जुएखाने की आमदनी अकेले खाता हूँ – बिलकुल नहीं । पुलिसवालों को, पार्टर्ीीालों को देते दिलाते बचता ही कितना है जी ! ले देकर दो जून की रोटी नसीब हो जाती है । और क्या…. समझिए खुदा के करम से मेहनत-मजदूरी करके गुजारा कर रहे हैं ।
इतने में इस देश के एक नामचीन रहनुमा -नेता) दिखाई पडेÞ । मैं उनके पीछे हो लिया । मिजाजपुरसी के बाद मैंने पूछा, आजकल आप किस पार्टर्ीीी नाव में सवार हैं – नेता जी ने कुछ देर मुझे घूरते हुए मेरा इरादा पढÞ लिया । कुटिल मुस्कान के साथ उन्हों ने फरमाया- वैसे तो लोग मुझे मौसम की तरह बदलनेवाला बताकर खामखा बदनाम करते रहते हैं । इस बात में माना कि कुछ सच्चाई है, मगर मेरी भी तो कुछ मजबूरियां हैं । जरा आप खुद गौर फरमाईए ।
इस छोटे से देश में ढेÞर सारी पार्टियाँ हैं । देश की खिदमत करने के लिए, दश को हर मामले में बुलन्दी तक पुहँुचाने के लिए हर पार्टर्ीीे अपने-अपने अजीवोगरीब दावे और नुस्खें हैं ।
मैंने उन्हे बीच में ही टोका, फिर भी देश की हालत तो बद से बदतर होते जा रही हैं… ।- आप लोग करते क्या हैं – नेता जी ने दो मिनट में मुझे दूसरी बार घूरा और कहा, देखो जी । मैं तो सुबह एक पार्टर्ीीें तो शाम को दूसरी पार्टर्ीीें घुस जाता हूँ । सभी पार्टर्ीीालों से अच्छा रिश्ता है । सियासत करने वालों में ऐसी खूबी तो होनी ही चाहिए । नहीं तो बेचारा भूखों न मर जाय !
मैंने कहा, सियासत में आप की पकडÞ अच्छी है । फिर भी आप आजतक मन्त्री नहीं बन पाए । ऐरे-गैरे मन्त्री बनकर झंडा फहराते हुए मजे मार रहे हैं । और आप…! नेता जी ने तीसरी बार घूरते हुए कहा, देखो जी मन्त्री जो मजे मार रहे हैं, तो उनके कन्धों पर जिम्मेदारियों की गठरी भी है । और मुझे देख लो । कोई काम नहीं, फिर भी मजे मन्त्रियों की तरह ! आम खाने से मतलब रखो । पेडÞ गिनने से क्या फायदा ! न जाने देश किधर जाएगा, कहते हुए वे एक रंगीन रेष्टुरेन्ट में घुस गए । और मुझसे कह गए- आप का तो कुछ चलता नहीं है, इसीलिए आप चलते बनिए !

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