एक नहीं दो नहीं छः छः उप- प्रधानमन्त्री, इतिहास के पन्नों पर जम्बो – निकम्मों का मुलम्मा ही रह जाएगी ?

गंगेश मिश्र, कपिलवस्तु, ९ नोभेम्बर |
” जनता की छटपटाहट देखाई नहीं देती, आँखें हैं फिर भी।
लोगों के करुण क्रन्दन सुनाई नहीं देते, कान हैं फिर भी।”

PHOTO: BALKRISHNA THAPA CHHETRI

अद्भुत, अद्वितीय नेपाल सरकार की कहानी है ये। इस सरकार ने विश्व पटल पर इतिहास रचते हुए, एक नहीं दो नहीं छः छः उप- प्रधानमन्त्री दिए हैं। अब छः पहिए कि गाड़ी पर सवार हमारे प्रधानमन्त्री जी, कितनी दूर तक जायेंगे; ये तो समय ही बताएगा। एक बात तो तय है कि सरकार की नजदीकी दृष्टि थोड़ी कमजोर है, नाकाबंदी तो दिख जाती है। पर देश के अन्दर, जनता द्वारा भोगी जा रही कठिनाईयों पर दृष्टि नहीं पड़ पा रही। बयानबाजी का दौर जारी है, अनाप सनाप वक्तव्य दिए जा रहें है; पद की गरिमा का भी खयाल नहीं है इन नेताओं और मन्त्रियों को।  अभी ओली सरकार के दो उप- प्रधानमन्त्री द्वय चित्र बहादुर के सी और सी पी मैनाली ने कहा है कि भारत, नेपाल से तराई के भू-भाग को खण्डित करना चाहता है। प्रधानमन्त्री जी कहते हैं, भारत द्वारा किया गया नाकाबंदी; मानवता के खिलाफ है। अब सोचने वाली बात ये है, कि समस्या का समाधान कैसे हो ? देश को वर्तमान स्थिति से कैसे निकाला जाय ? किन्तु सरकार है, जो अपना ही गाए जा रही है।
देश को पटरी पर लाने के लिए, मधेश की माँग को संबोधित करना ही पड़ेगा, सरकार अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकती। सरकार को अपनी पीठ खुद ही थपथपाने वाली प्रवृत्ति को छोड़ देना चाहिए। जैसा कि हमारे प्रधानमन्त्री जी ने कहा “अधिकार के दृष्टिकोण से नेपाल के इस संविधान में, अन्य किसी भी देश से कही ज्यादे अधिकार दिया गया है।” क्या ये बड़बोलापन नहीं है, अरे भाई मधेशी पगला गया है।तीन महीने से अधिकार के लिए ही तो लड़ रहा है। ऐसी बचकानी बातें समस्या को और जटिल बना
देंगी।सरकार को चाहिए वार्ता का अनुकूल वातावरण बनाए और इमानदारी पूर्वक, मधेश के हक़ और देश के हित में कार्य करे। अन्यथा यह सरकार, इतिहास के पन्नों पर जम्बो – निकम्मों का मुलम्मा ही रह जाएगी।
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