“एक मधेश प्रदेश” मधेशियों के लिए ही उपयुक्त नहीं – शंकरलाल श्रेष्ठ

काठमांडू । नेपाल के लिए गणतन्त्र के मसिहा कहलाने वाले रामराजा प्रसाद सिंह अभी इस दुनियाँ में नहीं रहे । लेकिन उनके द्वारा गठित ‘नवजनवादी मोर्चा’ नामक पार्टी अपने अस्तित्व की लडाइँ लड रही है । जब रामराजा प्रसाद सिंह जिवित थे, उस समय में भी रामराजा प्रसाद की तरह इस पार्टी ने अपने पहचान राष्ट्रिय राजनीति में बुलन्द नहीं कर सकी । अब उस पार्टी को आगे बढाने की जिम्मेवारी पार्टी के अन्य कार्यकर्ता और रामराजा प्रसाद के अनुयाईयों के कंधे पर आ गया है । इस तरह की जिम्मेवारी लेनेवालो में से एक पार्टी महासचिव शंकरलाल श्रेष्ठ भी है । समसामयिक राजनीतिक विषय पर श्रेष्ठ के साथ हिमालिनी डटकम के लिए लिलानाथ गौतम से हुई बातचित का सरसंक्षेप यहाँ प्रस्तुत है ः–हिमालिनी ः अब तो रामराजा प्रसाद इस दुनियाँ में नहीं है, ‘नवजनवादी मोर्चा’ को कैसे आगे बढाने को सोचे रहे है ?

श्रेष्ठ ः– अभी हम शोक में ही है । कुछ नहीं कर पा रहे है । पार्टी को कैसे आगे बढ़ाया जाए, पार्टी के अन्दर छलफल जारी है ।

हिमालिनी ः अभी इस पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष डा. मनोज सिंह है । हमारे यहाँ कोई भी मधेशी नेता पार्टी के नेतृत्व करेगा तो वह क्षेत्रीय पार्टी में सिमित होते नजर आती है । नवजनवादी मोर्चा भी अन्य मधेशवादी पार्टी की तरह क्षेत्रीय पार्टी ही रहेगी या राष्ट्रिय पार्टी ?

श्रेष्ठ ः हमारे पार्टी न पहले कभी क्षेत्रीय पार्टी था, न भविष्य में रहेगा । हम इस को राष्ट्रीय पार्टी के रुप में स्थापित करेंगे ।

हिमालिनी ः अभी संविधानसभा पुनःस्थापना की बात हो रही है ? इस में आप की पार्टी की धारणा क्या है ?

श्रेष्ठ ः नेपाली जनता नए संविधान की प्रतिक्षा में थी । लेकिन संविधानसभा विघटन हुआ और संविधान जारी नहीं हो पाया । अभी के राजनीतिक निकास के लिए ज्यादा से ज्यादा १–२ महनों के लिए संविधानसभा पुनस्थापना होना आवश्यक है । उसी समय में विवादित विषय पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति होना चाहिए और उस को संविधान में लिपिवद्ध करके संविधान जारी करना चाहिए ।

हिमालिनी ः संघीयता, उस के सिमांकन, शासकीय स्वरुप जैसे विषय में सहमति नहीं बन पा रहा है । पुनःस्थापना के बाद भी इस में सहमति हो जाएगा, इस का क्या ग्यारेन्टी है ?

श्रेष्ठ ः ग्यारेन्टी तो नहीं है, लेकिन जितना विषय में सहमति जुट सकता है, उसको संविधान में लिपिवद्ध करके जारी करना ही चाहिए । और विवादित विषयों को लेकर निर्वाचन तथा जनमत संग्रह में जाना उचित रहेगा, ताकि नवनिर्वाचित जनप्रतिधियों को इस में निर्णय करने का अधिकार रहेगा ।

हिमालिनी ः भावी निर्वाचन संसद या संविधानसभा किस का होना चाहिए ?

श्रेष्ठ ः संविधान जारी होने के वाद बाँकी विवादित विषयों पर निर्णय करने का अधिकार देकर संसद का निर्वाचन करना ही उचित रहेगा ।

हिमालिनी ः सब से ज्यादा संघीयता को लेकर राजनीतिक दलों के बीच सहमति नहीं बन पाई है । आप के विचार में नेपाल में कितना संघीयता होना चाहिए ।

श्रेष्ठ ः हिमाल, पहाड और तराई तीन संघीय प्रदेश बनाकर उस के अन्दर आवश्यकता अनुसार उप–प्रदेश बनता तो उचित रहता । लेकिन राजनीतिक अवस्था ऐसा नहीं है । इसलिए जातीय, भाषिक और भौगोलिक आधार में ज्यादा से ज्यादा नौ प्रदेश बनाने से उचित होगा ।

हिमालिनी ः मधेशी दल ‘तराई एक प्रदेश’ की बात कर रहे है और अन्य दल इस के विरोध में दिखते है । आप के विचार में तराई में कितना प्रदेश होना चाहिए ?

श्रेष्ठ ः ‘तराई एक प्रदेश’ मधेशियों के लिए ही उपयुक्त नहीं हो सकता । सभी प्रदेश के सम्पूर्ण आर्थिक नियन्त्रण केन्द्र सरकार करता है । अगर पहाड में अनेक और तराई में एक ही प्रदेश बनाएंगे तो आर्थिक वितरण पहाडी क्षेत्रों में ज्यादा जाएगा । और, तुलनात्मक रुप में तराई को थोड़ा ही बजेट विनियोजित हो सकता है । अगर ऐसा हो गया तो यह मधेशी जनता के लिए ही घातक हो सकता है । मेरे विचार में राजनीतिक और भाषिक दृष्टि से भी ‘मधेश एक प्रदेश’ उपयुक्त नहीं हो सकता । हम देख रहे है कि मधेश में मिथिला, भोजपुरा, अवध, थारुहट प्रदेश के लिए आन्दोलन हो रहे है । अगर उन लोगों का भावना हम लोग नहीं समेट पाएंगे तो मधेश में विद्रोह भी हो सकता है ।

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