एक शाम हिंदी के नाम- बाक़ी काम तमाम : मुरली मनोहर तिवारी

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मुरली मनोहर तिवारी, वीरगंज, ९ जनवरी । १० जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। विदेशों में सभी दूतावास कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। विडम्बना ही है कि ये कार्यक्रम महज़ खानापूर्ति के लिए आयोजित किए जाते है, इसका कारण है कि दूतावास के पास हिन्दी में योगदान देने वालों से ना ही कोई संपर्क है ना ही कोई सम्बन्ध। बस कुछ चले हुए नाम वाले और कुछ रोज़ मिलने वालों को बुला कर “एक शाम हिंदी के नाम- बाक़ी काम तमाम”। आश्चर्य तो तब होता है, जब विदेशों में भारतीय दूतावास में हिन्दी में बात करने पर अंग्रेजी में जबाब मिलता है। हिन्दी में बोलने वाला भाषण भी अंग्रेजी में नोट बनाकर पढ़ा जाता है। हिन्दी दिवस के दौरान कई कार्यक्रम होते हैं, लेकिन अगले दिन सभी हिन्दी को भूल जाते हैं।

विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित – प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनो की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन १० जनवरी १९७५ को नागपुर में आयोजित हुआ था, इसी लिए इस दिन को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने १० जनवरी २००६ को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में १० जनवरी २००६ को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था जबकि हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष १४ सितम्बर को मनाया जाता है। हिन्दी दिवस और विश्व हिन्दी दिवस में ही विरोधाभाष है।

हिन्‍दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। हिन्दी का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा ही हिन्दी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा है कि युग-युग में इसका नाम परिवर्तित होता रहा है। कभी ‘वैदिक’, कभी ‘संस्कृत’, कभी ‘प्रकृत’, कभी ‘अपभ्रंश’ और अब – हिन्दी। हिन्दी का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है और ये सफर आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल, छायावाद, प्रगतिवाद से होते हुए यहा तक पहुच पाया है।

वर्ष १९१८ में महात्मा गांधी ने इसे जनमानस की भाषा कहा था। जब स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर १४ सितंबर १९४९ को काफी विचार-विमर्श के बाद  राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और अंग्रेज़ी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस कारण हिन्दी पर भी अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा।

वर्ष १९९१ में भारत में नव-उदारीकरण की आर्थिक नीतियाँ लागू की गई। इसका जबर्दस्त असर पड़ा भाषा की पढ़ाई पर। अंग्रेजी के अलावा किसी दूसरे भाषा की पढ़ाई समय की बर्बादी समझा जाने लगा। हिन्दीभाषी घरों में बच्चे हिन्दी बोलने से कतराने लगे, या अशुद्ध बोलने लगे। घर-परिवार में नई पीढ़ियों की जुबान से मातृभाषा उजड़ने लगी। अब तो हिन्दी जुमलों में सिमटने लगी है, “अच्छे दिन आने वाले है”, “सबका साथ सबका विकास”, “चाय पर चर्चा”, खाट पर चर्चा” वगैरह- वगैरह।

हिन्दी को अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है। यह और भी कम होती जा रही है। इसके साथ ही हिन्दी भाषा पर अंग्रेजी के शब्दों का भी बहुत अधिक प्रभाव हुआ है और कई शब्द प्रचलन से हट गए और अंग्रेज़ी के शब्द ने उसकी जगह ले ली है। जिससे भविष्य में भाषा के विलुप्त होने की भी आशंका अधिक बढ़ गई है।हिन्दी तो अपने घर भारत में ही दासी के रूप में रहती है, फिर दूसरे देश में कौन पूछने वाला है ?

लज़्ज़ास्पद है कि, वाराणसी में स्थित दुनिया में सबसे बड़ी हिन्दी संस्था आज बहुत ही खस्ता हाल में है। जब भारत में ही हिन्दी का गला घोंटा जा रहा हैं तो कल्पना किया जा सकता है कि नेपाल में हिन्दीभाषी को कितने जद्दोजहद करने पड़ते होंगे। सम्पूर्ण विश्व में भाषा बोलने में हिन्दी का चौथा स्थान है। हिन्दी भाषा बोलने के अनुसार अंग्रेज़ी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी भाषा होने के बावजूद, हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को १७७ देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए १२९ देशों का समर्थन क्यों नहीं जुटाया जा सकता ?

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