एनएसजी की चर्चा, एमटीसीआर में पूर्ण सदस्यता और मोदी की मंजिल

वीरेन्द्र केएम
हमारे अहम पड़ोसी देश भारत और चीन दोनों के उपर हम नेपालियों की नजर होना कोई बड़ी बात नही है, और यह जरुरी भी है कि हमारी नजरें इन पर हों क्योंकि यह जानने का हमारा अधिकार और फर्ज दोनों है कि आखिर ये दोनों पड़ोसी क्या कर रहे हैं और इससे हमें कितना फायदा या नुकसान है । इस धु्रवसत्य यथार्थ को भी हम नही नकार सकते कि चीन के तुलना में भारत के साथ अपनापन ज्यादा है, और इस लिए भी क्योंकि भारत के साथ सिर्फ एक पड़ोसी का नाता नही है, भारत के साथ सदियों से रोटी बेटी का भी सम्बन्ध है, नेपाल के हजारों लोग भारत मे रोजगार के सिलसिला में हंै और भारत के हजारों लोग रोजगार और नौकरी के सिलसिले में नेपाल में हैं । हमारी कितनी ही बेटियांँ उसपार शादी करके जीवन निर्वाह कर रही हैं तो वहाँ की कई बेटियाँ हमारे यहाँ बहू बन के आई हैं । सीमा क्षेत्र में सामान्य घास भी इधर के लोग उधर से लाते है और उधर के लोग इधर से ले जाते हैं । यानी पब्लिक टू पब्लिक सम्बन्ध बना हुआ है । लेकिन चाइना के साथ सिर्फ एक पड़ोसी का सम्बन्ध है, और हम बिना स्वीकृति उसके देश में जा नहीं सकते न ही वो बिना स्वीकृति हमारे देश आ सकते हैं । यानी पड़ोसी तो हैं लेकिन मतलब बाले । ये तो हुई ये दोनों देशों के साथ हमारे नाते रिश्ते की बात । इस महीने एनएसजी यानी न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की काफी चर्चा रही, अखिर क्या है ये एनएसजी ? क्यों हुई इतनी बडी चर्चा ? आइए इसपे चर्चा करतें हंै ।
अहिंसा में आस्था रखने और एटमी हथियार न बनाने का संकल्प लेने वाले भारत ने जब पहली बार परमाणु विस्फोट किया तो उसकी नाकेबंदी करने के लिए ही १९९४ में एनएसजी का गठन हुआ और आज अगर भारत उसी संगठन का सदस्य बनना चाह रहा है तो यह अपने आप में अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय सिद्धांत और व्यवहार में मौलिक परिवर्तन करने जैसा है । किंतु खुशी की बात यह है कि भारत वैसा करने के करीब पहुंच रहा है । ४८ सदस्यीय एनएसजी में ३८ देश स्पष्ट तौर पर भारत के पक्ष में हैं, जबकि चीन के साथ अन्य नौ देशों के विरोध और ना–नुकुर के चलते भारत के इस अभियान को झटका लगा है ।
ताशकंद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग से मुलाकात का भी फायदा नहीं हुआ, क्योंकि चीन अपने रवैए को नियम सम्मत बता रहा है । उसका कहना है कि अगर भारत को नियमों का अपवाद बनाया गया तो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा ।
यह तो नहीं कहा जा सकता कि न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में प्रवेश पाने का भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सारा प्रयास विफल हो गया, लेकिन यह जरूर है कि अभी चीन ने नियम का हवाला देकर भारत का दाखिला रोक दिया है । यह दिक्कत भारत के सिद्धांत और व्यवहार में अंतर रहने के कारण उपस्थित हुई है ।
प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में १९९६ में दूसरा परमाणु विस्फोट करके भारत ने जब कई प्रकार की पाबंदियों का सामना किया और उसे तोड़ने में अमेरिकी नागरिक परमाणु संधि के साथ कामयाबी मिली, तब भी चीन संधि के विरुद्ध था । उसने यही सवाल उठाया था कि अगर अमेरिका भारत के साथ ऐसी संधि कर सकता है तो पाकिस्तान के साथ क्यों नहीं, लेकिन बाद में चीन इस मोर्चे पर परास्त हुआ । भारत ने पाकिस्तान की तुलना में अपने को एक जिम्मेदार एटमी शक्ति के रूप में प्रमाणित किया और इसी का परिणाम है कि अमेरिका और उसके समर्थक देश भारत को एनएसजी में शामिल करने के पक्ष में खड़े हैं । बस यहां एनपीटी के हस्ताक्षरी होने का नियम आड़े आ रहा है ।
भारतीय कुछ बिश्लेषकों की माने तो भारत तेजी से उभरती हुई आर्थिक शक्ति है, इसलिए उसकी लंबी उपेक्षा तो संभव नहीं है, लेकिन सवाल समय रहते उद्ेश्य पूरा होने का है । अब भारत के पास यही उपाय है कि वह चीन को विश्वास में लेने की कोशिश जारी रखते हुए ब्राजील, आस्ट्रिया, न्यूजीलैंड और तुर्की जैसे देशों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करें, क्योंकि इस समूह का सदस्य बने बिना भारत का एटमी ऊर्जा का सपना अधूरा रह जाएगा ।
मोदी की एनएसजी मंजिल
हालांकी इस समय भारत की विदेश नीति एक बहुत ही अहम मुकाम पर है, उसकी दो कूटनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं पर फैसला होना है । एक है, शंघाई सहयोग संगठन की पूर्ण सदस्यता, जिसके बारे में ताशकंद में होने वाले शिखर सम्मेलन में निर्णय होना है । इस समूह में चीन, रूस और मध्य एशिया के तमाम देश शामिल हैं । आसार हैं कि भारत को इस महत्त्वपूर्ण एशियाई मंच की पूर्ण सदस्यता मिल जाएगी । अलबत्ता चीन के एतराज के चलते एनएसजी की राह जरूर कठिन दिखती है । भारतीय मीडिया के मुताविक हालांकि चीन ने अपने रुख में कुछ नरमी लाते हुए कहा है कि वह किसी के खिलाफ नहीं है, दरवाजे खुले हुए हैं, पर उसका बुनियादी रुख अब भी वही है जो पहले पहले था, यानी एनएसजी (न्यूक्लीयर सप्लायर्स ग्रुप) की सदस्यता किसी ऐसे देश को नहीं दी जानी चाहिए जिसने एनपीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न किए हों ।
गौरतलब है कि भारत उन थोड़े से देशों में शामिल है जो इस संधि में शामिल नहीं है । लेकिन चीन की आपत्ति के बावजूद भारत ने एनएसजी की सदस्यता के लिए आवेदन कर दिया है जिस पर दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में होने वाली एनएसजी की बैठक में फैसला होना है । अपना पक्ष मजबूत करने के लिए भारत ने कोई कसर नहीं छोड़ी है । पिछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने कई देशों को अपने एतराज वापस लेने के लिए वहां के राष्ट्राध्यक्षों से बात की, भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भी इस मामले में कोई दो दर्जन देशों के विदेशमंत्रियों को भारत का पक्ष समझाया । एनएसजी के मामले में भारत की कूटनीतिक कठिनाइयाँं समझी जा सकती हैं । अमेरिका जरूर खुल कर भारत की तरफदारी कर रहा है, पर भारत को रूस का भी सक्रिय समर्थन हासिल करना है, जबकि रूस और पश्चिमी खेमे के संबंध इन दिनों अच्छे नहीं चल रहे हैं । भारतीय मीडिया की माने तो अमेरिका या रूस का समर्थन काफी नहीं होगा, चीन का भी राजी होना जरूरी है, क्योंकि एनएसजी में आम सहमति से फैसला होना है ।
कुछ लोगों का खयाल है कि अगर एनएसजी की सदस्यता मिल भी जाती है, तो इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि एनएसजी ने २००८ से ही भारत को परमाणु ईंधन और तकनीक के आयात की छूट दे रखी है । पर जैसा कि भारतिय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है, कमरे के बाहर बैठने और कमरे के भीतर बैठ कर निर्णय प्रक्रिया में शामिल होने में काफी फर्क है । अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल जाती है तो वह भी इस नियमन व्यवस्था में साझीदार हो जाएगा ।
‘मिसाइल कंट्रोल टेक्नोलाजी रिजीम’ मे उपलब्धियां
इस महीने के शुरू में भारत को ‘मिसाइल कंट्रोल टेक्नोलाजी रिजीम’ की सदस्यता हासिल हुई । अब उसका अगला निशाना एनएसजी है । अगर सोल में होने वाली बैठक में भारत का आवेदन खारिज हो जाता है, तब भी उसकी मुहिम बंद नहीं होगी । अगर आवेदन स्वीकार कर लिया जाता है, तो शायद भारत का अगला बड़ा कूटनीतिक लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता हासिल करना होगा ।
एनएसजी का सदस्य न बन पाने से भारत की जो राजनयिक किरकिरी हुई थी उसकी एक हद तक क्षतिपूर्ति मिसाइल टेक्नोलाजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) का ३५ वां पूर्ण सदस्य बनने से हो गई है । भारत अब न सिर्फ ऐसी उच्च स्तरीय मिसाइल प्रौद्योगिकी पा सकेगा, जो उसके लिए वैसे आसान नहीं थी बल्कि उनका व्यापार भी कर सकेगा । ऐसे में रूस के साथ हो रहा ब्रह्मोस मिसाइल का उत्पादन व्यावसायिक रूप से लाभकारी होगा । भारत की यह कामयाबी भले एनएसजी जैसी नहीं है, लेकिन चीन जैसे देशों के लिए संदेश जरूर है कि वे भारत का रास्ता लंबे समय तक नहीं रोक सकते । भारत सामरिक रूप से उनसे भले पीछे है, लेकिन ज्यादा दिन वह स्थिति भी नहीं रहने वाली है । भारत को यह सफलता इसलिए भी मिली, क्योंकि एमटीसीआर की हेग आचार संहिता को मानने की घोषणा करने के बावजूद चीन इसका सदस्य नहीं है । इस अभियान में अमेरिकी सहयोग से यह भी साबित होता है कि नाभिकीय प्रौद्योगिकी से संबंधित विभिन्न समूहों में भारत को शामिल कराने के लिए अमेरिका प्रतिबद्ध है और आस्ट्रेलिया समूह व वाइजनर प्रणाली में भी जल्दी ही भारत को भागीदार बनाया जाएगा ।
हालांकि, भारतीय मीडिया की माने तो एमटीसीआर ५०० किलोग्राम पेलोड ले जानी वाली उन मिसाइलों को नियंत्रित करने का दावा करता है, जिनकी रेंज ३०० किलोमीटर है और साथ ही यह ड्रोन जैसे यूएवी के प्रसार को रोकने का संकल्प जताता है लेकिन इस संगठन के प्रयासों का दुनिया पर मिला जुला असर पड़ा है ।
भारतीय मीडिया के मुताविक अगर अर्जेंटीना, ग्रिस, इराक, दक्षिण अफ्रीका और ताइवान के मिसाइल कार्यक्रम इससे प्रभावित हुए हैं तो चीन, ईरान, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान इस संगठन से बाहर रहकर इसकी हिदायतों का उल्लंघन करते रहे हैं । भारत का रिकार्ड इस मामले में बेहतर है कि उसने बाहर रहते हुए भी मिसाइल प्रौद्योगिकी का प्रसार नहीं किया और अब सदस्य बन जाने के बाद जिम्मेदारी और बढ़ गई है । संगठन के सदस्य देश मिसाइल प्रौद्योगिकी के लेनदेन में कुछ स्वतंत्र व्यवहार भी करते हैं और नियमों का उल्लंघन करने वाले देशों पर आवश्यक तौर पर पाबंदी नहीं लगाते । किंतु अमेरिका इस मामले में सख्त है और वह ऐसे देशों पर पाबंदी लगाता है । इस मायने में एमटीसीआर का सदस्य बनना भारत के हित में है, क्योंकि इससे भारत और अमेरिका का रणनीतिक सहयोग और सघन होगा । भारत इन्हीं स्थितियों का लाभ उठाते हुए एक दिन एनएसजी में भी अपनी जगह बनाएगा इसमें किसी प्रकार का संदेह दिखाई नहीं पड़ता ।
विपक्षी नही बल्कि अपने ही सहयोगी से आलोचना
हांलाकि भारत के लोकसभा मे प्रमुख प्रतिपक्षी दल नही है, लेकिन काग्रेस सहित विपक्षी दल अवश्य हंै और लोकसभा मे सीमित संख्या में ही सही प्रधानमन्त्री मोदी को कड़ी आलोचना और विरोध को भी झेलना पड़ता है, इस समय भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी को कुछ अपने ही सहयोगी नेता से भी आलोचना झेलनी पडी है । भारतीय मीडिया के मुताविक पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने एनएसजी की सदस्यता पाने के लिए देश के पुरजोर प्रयासों पर नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं थी और भारत को ‘आवेदक’ के तौर पर इस समूह में शामिल नहीं होना चाहिए ।
पार्टी में दरकिनार कर दिये जाने के बाद मोदी सरकार की अकसर आलोचना करने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा कि भारत को एनएसजी की सदस्यता स्वीकार नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसे जो जरूरत थी, पहले ही पा चुका है । सोल में आयोजित पूर्ण सत्र से पहले भारत ने कई देशों के साथ अपना पक्ष रखा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कमान संभालते हुए ताशकंद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सम्मेलन से इतर चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात कर इस संबंध में सकारात्मक फैसला करने का आग्रह किया था । चीन, भारत जैसे एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले देशों को एनएसजी में शामिल नहीं करने के अपने फैसले पर कायम रहा । अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विदेश मंत्री रहे सिन्हा ने मोदी सरकार की विदेश नीति के कई पहलुओं और खासतौर पर पाकिस्तान से निपटने के तरीके के खिलाफ अपने विचार रखे हैं ।
चीन की है ये दलील
भारतीय मीडिया के मुताविक चीन का कहना है कि जब तक भारत और पाकिस्तान सदस्य देशों के बनाए गए नियमों का पालन नहीं करते, तब तक वह उनकी सदस्यता का समर्थन नहीं करेगा । ताशकंद में कल पीएम मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकÞात कर भारत के दावे पर निष्पक्ष होकर सोचने की अपील की थी, बावजूद इसके चीन के रवैये पर कोई असर होता नहीं दिख रहा है । इस बीच अमेरिका अब भी भारत के समर्थन में खड़ा है । उसका कहना है चीन और भारत के बीच अच्छे संबंध हों और दोनों के बीच जो भी मतभेद हैं उन्हें सुलझाने की कोशिश करें ।
पाकिस्तान के राष्ट्रपति भी मिले
भारतीय मीडिया को माने तो, इधर, पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने भी चीनी राष्ट्रपति से मिलकर एनएसजी में पाकिस्तान की एंट्री के दावे का समर्थन करने की अपील की, बावजूद उसके पाक पर कोई चर्चा नहीं हुई ।
भारत को एनएसजी सदस्यता की जÞरूरत क्यों ?
भारतीय जानकारों के मुताविक इस मे सदस्यता यदि भारत को मिल जाती है तो यह निम्न जरुरत है जो पूरी करने मे भारत को आसानी होगी ।
१. स्वच्छ ऊर्जा का लक्ष्य पाने में मदद मिलेगी
२. २०३० तक ४० फीसदी बिजली गÞैर परंपरागत ईधन से
३. न्यूक्लियर एनर्जी निर्यात करने पर भी नजÞर
४. सदस्य बनने से न्यूक्लियर तकनीक बेच सकेगें
५. परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भारत को विस्तार मिलेगा
लेकिन भारत के विरोध में है यह देश
भारतीय मीडिया के मुताविक यह देश जो कि भारत के विरोधी हैं और इसको कैसे निपटाना है यह सोचना जरुरी है । विरोधी देशों में १. चीन २. न्यूजÞीलैंड ३. आस्ट्रिया ४. तुर्की ५. आयरलैंड ६ ब्राजÞील ७ स्विट्जÞरलैंड है ।
लेखकः केएम भारतीय मीडिया एबीपी न्यूज नेटर्वक के नेपाल प्रतिनिधि है ।

loading...