एमपीएल बनाम भारतीय राष्ट्रपति, नेपाल सरकार को जनकपुर सुरक्षा चुनौती हरदम सताती है

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कैलाश महतो,परासी, २१ अक्टूबर |
२०४० आषाढ ५ गते के दिन नेपाल के खेलकुद कवर्ड हल काठमाण्डौं में नेपाल द्वारा आयोजित राष्ट्रिय खेलकुद प्रतियोगिता में राणा कालिन नेपाल तथा अंग्रेज कालिन भारत के प्रसिद्ध एवं चर्चित व्यक्तित्व सप्तरी के भारदह निवासी सुखदेव सिंह (वही सुखदेव सिंह जिन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के योद्धात्रय जयप्रकाश नारायण, डा.राम मनोहर लोहिया और सुर्यनारायण सिंह को सप्तरी के तत्कालिन सदरमुकाम हनुमान नगर जेल से उस जेल को तोडकर वि.स.ं २००१ में बाहर निकाला था । उन तीनों योद्धाओं को भारत में राज कर रहे अंगे्रजों के हुकुमत से तत्कालिन राणाशाही ने उन्हें गिरफ्तार करके जेल में रखा था । सुखदेव सिंह तत्कालिन नेपाली काँग्रेस के एक सशक्त नेता तथा उसके सशस्त्र क्रान्ति के एक प्रमुख नेता रहे । उनके कार्य से भयभित और आक्रोशित राणाशाही के रक्षादल ने उनके घर पर आक्रमण की, आग लगायी और सारी सम्पत्ति लुट ली । नेपाली काँगे्रस के प्रचार प्रसार तथा हनुमाननगर में पंचायती व्यवस्था के विरुद्ध प्रजातन्त्र का झण्डा फहराने के कारण शाही नेपाली सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर हमेशा हमेशा के लिए गायब कर दी ।) के सुपूत्र राम सिंह ने भाग लिया था । उन्होंने ५५ किलो ग्राम वजन उठाने के प्रतियोगिता में नेपाल प्रथम होते हुए गोल्ड मेडल प्राप्त की थी । तत्कालिन खेलकुद मन्त्रालय और विभाग दोनों ने कोरिया में होने बाले अन्तर्राष्ट्रिय खेलकुद में भाग लेने के लिए छनौट कर दी थी । लेकिन तत्कालिन नेपाल खेलकुद के राष्ट्रिय अध्यक्ष रहे राजा बीरेन्द्र के बहनोई शरदचन्द शाह ने उनके मधेशी रङ्ग के कारण उन्हें तिरष्कार और बेइज्जती के साथ छनौट से बाहर कर दिया । उन्होंने अपने पास रहे वंशज के नागरिकता दिखाया । मगर जबाब रहा, “मूँजी देशी साला † तँ भारतीय कालेले नागरिकता लिंदैमा नेपाली हुन्छस् ?”
अपमानित राम सिंह ने वहीं पर अपना नागरिकता को फाड डाला और अपने मेडल के साथ वे दिल्ली पहुँचे । भारत से खिलाडी छनौट हो जाने के कारण कोरिया में होने बाले अन्तर्राष्ट्रिय खेल में तो भाग नहीं ले पाये । मगर उसके बाद सन् १९८८ में दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में हुए दो दिवसीय साउथ एशियन तेक्वान्दो कराँते प्रतियोगिता में वे भारत के तरफ से भाग लिए और सवर्ण पदक हासिल किए ।
सन् १९८९ में बंगलादेश में होने बाले अन्तर्राष्ट्रिय कराँते प्रतियोगिता बंगलादेश में भूचाल आ जाने के कारण दिल्ली के सत्यवती कॉलेज में सम्पन्न उसी खेल में राम सिंह ने फिरसे स्वर्ण पदक जिता ।
एक ही वंशानुगत गुण रहे मधेशी और बिहार तथा यूपी लगायत के भारतीय खिलाडी सारी दुनियाँ कोे टक्कर दे सकता है । मगर नेपाल के शासन में मधेशी दयनीय हो जाता है । उसे खेलकुद समेत में या तो वर्जित किया जाता है या उसे पिछे धकेलकर रखा जाता है चाहे वह सारे नेपाली खिलाडियों से तेज ही क्यूँ न हो ।
कार्तिक २ गते के दिन जनकपुर में होने बाले एमपीएल (मधेश प्रीमियर लिग) को नेपाल सरकार द्वारा न होने देना भी राम सिंह की घटना को पूनरावृति करने की कोई मनोवैज्ञाािक रणनीति तो नहीं है ? सोंचनीय अवस्था है । मधेश के आन्दोलन और राजनीति को नापसन्द करने बाला नेपाली शासन मधेशी खिलाडी को नापसन्द करना स्वाभाविक है । क्यूँकि मधेशी यूवा ने नेपाल सरकार और उसके नश्लवादी खेल चिन्तन को चुनौती देकर मधेश और मधेशियत को अन्तर्राष्ट्रियकरण करने की साहस जो जुटा ली है । वहीं दूसरी तरफ नेपाल सरकार को जनकपुर सुरक्षा चुनौती हरदम सताती रहती है ।
मोदी जब जनकपुर घुमने की बात करें तो सुरक्षा खतरा बन जाती है । सि.के.राउत द्वारा एमपीएल का उद्घाटन होने का खबर सुन भर लें तो सुरक्षाकर्मीयों की पसीना छुट जाती है । अब भारत के राष्ट्रपति महोदय जनकपुर जानकी माता की दर्शन हेतु आने की खबर है । नेपाल सरकार की सारी सुरक्षा नीति और क्षमता फिरसे कहीं चारो खाने चित न हो जाये †
नेपाल सरकार की सुरक्षा खतरा की चिन्ता की जो कायरतापूर्ण दलिल है, उससे दो बातों की शंका होती है । पहला, मधेश का जनकपुर मधेश दोहन का एक प्रतिक है जो भारत को नेपाल दिखाना नहीं चाहता । दूसरा, मधेश आन्दोलन की बढती जनलहर को नेपाल रोकने का अनायाश कोशिश कर रहा है जो अब उसके हैसियत से बाहर है । और वैसे भी नेपाल सरकार यह प्रमाणित करता है कि मधेश का सुरक्षा अब उसके वस में नहीं है । जब वह मधेश और उसकी आयामों की सुरक्षा नहीं दे सकता तो मधेश पर शासन करने की कोई हैसियत उसकी नहीं रह जाती ।
नेपाल सरकार अपने को जितना भी चतुर और दुरदर्शी मान लें, जनकपुर में होने बाले मधेश प्रीमियर लिग को रोकना मधेश आजादी के लिए उतना ही ज्वालामखी का काम किया है जितना वहाँ खेल सम्पन्न होने देने से भी नहीं हो पाता । हर हाल में जित मधेश की होनी तय है ।
नेपाल सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि मधेश जिसको अपना अतिथी मानता है, वह उसका भगवान् होता है । और अपने अतिथी को सम्मान, सत्कार और सुरक्षा किसी सरकारी सुरक्षा संयन्त्र से ज्यादा ही देने का हैसियत रखता है जो नेपाली सुरक्षाकर्मीर्यों से कभी संभव ही नहीं हो सकता । क्यूँकि वह मधेश को सुरक्षा देने नहीं, लुटने और दोहन करने आया है । मिथिलावासी, जनकपुरबासी और सारा मधेश इस बात से होशियार रहें कि भारत के राष्ट्रपति का जनकपुर आगमन को कहीं नेपाली सुरक्षापन का बिमारी न लग जाये । अपने भ्रमण के दौरान जनकपुर और लुम्बिनी इन दोनों मधेशी धार्मिक स्थलों के इर्दगिर्द के जिलों से आपके स्वागत में आने बाले सारे प्रशासक, सुरक्षा निकाय और अन्य अधिकारियों का रङ्ग और रुप को भी देखें और मनन करें कि मधेश में ही मधेशियों की भागिदारी क्यूँ नहीं ? सामान्य लोगों को भी देखें और अध्यन करें कि नेपाली और मधेशियों में किसकी उपस्थिति और शान शौकत मजबूत है ? मधेशियों का मनपनु, विराटपन, सहलेशपन, शुद्धोधनपन, दङ्गीशरणपन, शहादत अलि खानपन, मुकुन्द सेनपन और उनकी शान कयूँ, कैसे और किसने गायब कर दी ? ये बहादुर नेपाली सुरक्षाकर्मी कहीं यह साबित न कर दें कि वे वीर नहीं, बहादुर ही हैं । क्यूँकि भारतीय लोग भारत में रात में पहरा देने बाले, चौकीदारी करने बाले नेपाली को ही बहादुर कहते हैं ।

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