एमाओवादी एवं मधेशवादी क्यों हारे

रमेश झा:२०६३/०६४ जनआन्दोलन और मधेश आन्दोलन के बाद संविधानसभा निर्वाचन सम्पन्न हुआ। इस सभा में नयी शक्ति के रूप में एमाओवादी एवं मधेशवादी पार्टर्ीी्रतिष्ठित हर्ुइ। ये सारी शक्तियाँ लगभग ५ वषोर्ं के लिए सत्ता प्राप्ति की दौडÞ में निर न्तर लगी रही और सत्ता सुख भी भोगती र ही। संविधान निर्माण के सर्न्दर्भ में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप प्रथम संविधानसभा अकालकवलित हो गई। दूसरी संविधानसभा का निर्वाचन संपन्न कराने के लिए राजनीतिक पार्टियों के बीच बडÞी रस्साकसी हर्ुइ। किस राजनीतिक पार्टर्ीीे नेतृत्व में दूसरी संविधानसभा सम्पन्न हो – कोई भी बडÞी शक्ति किसी दूसरे के नेतृत्व में निर्वाचन कराने के लिए तैयार नहीं हर्ुइ। फलस्वरूप एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड द्वार ा प्रस्तावित राजनीतिक इतर व्यक्ति सर्वोच्च अदालत के प्रधानन्यायाधीश खिलराज रेग्मी के नेतृत्व में गठित मन्त्रिमण्डल को निर्वाचन रमेश झा @ का सम्पर्ूण्ा दायित्व सौंप दिया गया।madheshi leaders madhesh khabr

विश्व में सम्भवतः आजतक किसी भी देश में दूबारा संविधानसभा निर्वाचन कराने का रर्ेकर्ड नहीं है। पर नेपाल ने ऐसा रर्ेकर्ड अपने नाम कर लिया। चुनाव के अन्तिम क्षणों तक राजनीतिक द्वन्द्व चलता रहा- चुनाव होगा या नहीं। इसका मुख्य कारक तइभ्व था- मोहन वैद्य वाली पार्टर्ीीहित ३३ पार्टर्ीीारा निर्वाचन बहिष्कार कर ना। इस के कारण नेपाली सेना को सुरक्षार्थ आगे लाया गया। बहिष्कारवादियों द्वारा वाधाएँ भी खडÞी की गई लेकिन जनता ठान चुकी थी कि हम मतदान करके अपना और अपनी सन्तति के भविष्य को सुनिश्चित करेंगे। ७५% से अधिक मतदान ने प्रमाणित कर दिया कि आम जनता क्या चाहती है। अब राजनीतिक पार्टियों को संविधान निर्माण करना ही होगा, अन्यथा जनता अपने मतदान रूपी ब्रहृमास्त्र से बडÞी से बडÞी शक्ति को भी आहत और पर ास्त कर सकती है।

अब प्रश्न उठता है- एमाओवादी एवं मधेशवादी पार्टियों की शक्ति दूसरी संविधानसभा निर्वाचन में क्यों पस्त हो गई एमाओवादी एवं मधेशवादी क्यों हारे – मधेशवादी पार्टियों के नेता लोग टुकडÞो में विभक्त हो कर सत्तासीन होते रहे और पुस् त-दर-पुस्त के लिए मोटी रकम जमा कर ते रहे। सत्ता सुख के सामने कभी मधेश की चिन्ता नहीं हर्ुइ और सत्ता स्वार्थ के कारण मधेशवादी नेताओं को यह भी कभी ख्याल नहीं आया कि भविष्य में चुनाव में जाना होगा तो क्या होगा – नेपाल जैसे बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक समुदाय में पर ापर्ूवकाल से स्थापित आपसी सहिष्णुता को भंग करके क्षणिक स्वार्थ के लिए जातीय आधार पर संघीयता निर्माण कर ने की कुत्सित मानसिकता ही एमाओवादी की असफलता का पहला कारण है। हिमालिनी l दिसम्बर/२०१३ ढ विश्लेषण – क्या निर्वाचन में धाँधली हर्ुइ कह देने से जनता मान जाएगी – हमारी आदत रही है कि जब हम हार जाते हैं, तब हम अपने को बचाने के लिए कोई न कोई बहाना बना कर पतली गली का रास्ता अपनाने की कोशिश करते हंै।

एमाओवादी पार्टर्ीीौर मधेशवादी पार्टियाँ यही कर रही हैं, जो अनुचित है। किसी भी खेल में किसी को हार किसी को जीत मिलती है। हारने पर हतास मानसिकता अच्छी नहीं होती। हारने पर हमें चाहिए कि हम अपने भीतर झाँकें, आत्मालोचन करें, ऐसा करने पर ही भविष्य का रास्ता तय हो सकता है। एमाओवादी और मधेशवादी पार्टियों की ऐसी दयनीय स्थिति क्यों हर्ुइ, आईए इस पर कुछ विचार करें- उक्त दो मुख्य शक्तियों की शक्ति में ह्रास आने के अनेक कारण विद्यमान हैं। ०६३/०६४ के बाद नवोदित शक्तियाँ एमाओवादी और मधेशवादी दलों में हुए विभाजन को हम ले सकते हैं। विभाजन के कारण नेतृत्व वर्ग के प्रति शंका होना स्वाभाविक है, मधेशवादी दल का अस्तित्व ही इस निर्वाचन परिणाम से खतरे में पडÞ गया है। मधेशवादी जनता समझ गई है कि हमारे प्रतिनिधि लोग मधेश के लिए कम अपने लिए ज्यादा सोचने वाले हैं।

इसी का परिणाम है कि प्रथम संविधानसभा में निर्वाचित हो जाने वाली मधेशवादी पार्टियों के नेता लोग टुकडÞो में विभक्त हो कर सत्तासीन होते रहे और पुस्त-दर-पुस्त के लिए मोटी र कम जमा करते रहे। सत्ता सुख के सामने कभी मधेश की चिन्ता नहीं हर्ुइ और सत्ता स् वार्थ के कारण मधेशवादी नेताओं को यह भी कभी ख्याल नहीं आया कि भविष्य में चुनाव में जाना होगा तो क्या होगा – २०६४ के निर्वाचनपर्ूव मधेश आन्दोलन द्वारा स्थापित र ाजनीतिक वादे पूरे किए गए या नहीं। यदि वादे पुरे नहीं हुए तो हम क्या जबाव देंगे – एक मधेश एक प्रदेश के बदले कई प्रदेश की वकालत करने की बात का उल्लेख घोषणा पत्र में करना, नागरिकता समस् या के सर्न्दर्भ में चुप्पी साधना, प्रशासनिक क्षेत्र में समानुपातिक समावेशिता के प्रति उदासीन होना, मधेश में मधेशवादी दलों के बीच जातीय समीकरण बैठाना, तथा मधेश के मुद्दों के प्रति मधेशवादी दलों के बीच कार्यगत एकता का न होना ही वर्तमान हार के प्रमुख कारण हैं। जो जो मधेशवादी पार्टर्ीी्रथम संविधानसभा में बडी शक्ति के रूप में आई, और सत्तासमीकरण का प्यादा बनकर सत्ता बदलती रही फलस्वरूप मधेशवादी प्यादा अपने अस्तित्व को भी नहीं बचा पाए। जनता ने सबक सिखा दी कि तुम हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते तो तुम भी हमारे लिए कुछ नहीं हो। अब एमाओवादी के सर्न्दर्भ में विचार करने पर लगता है कि सबसे बडÞी शक्ति तीसरी शक्ति के रूप में कैसे आई।

इस के पीछे अनेकानेक कारण हैं। नेपाल जैसे बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक समुदाय में परापर्ूवकाल से स्थापित आपसी सहिष्णुता को भंग करके क्षणिक स्वार्थ के लिए जातीय आधार पर संघीयता निर्माण कर ने की कुत्सित मानसिकता ही एमाओवादी की असफलता का पहला कारण है। जातीय राज्य का नारा बुलन्द करने से संख्यात्मक दृष्टि से अल्पसंख्यक ब्राहृमण, क्षत्रीय लोग एमाओवादी से रुष्ट होना भी इस पार्टर्ीीी हार का कारण है। प्रथम संविधान में अप्रत्याशित जीत से मदान्ध हो तत्कालिन प्रधान सेनापति कटुवाल को पदच्युत कर ने का प्रयास, देवाधिदेव पशुपतिनाथ के पार म्परिक पुजारी भट्ट को बदलने का प्रयास, जिसके चलते कुछ दिनों तक पशुपतिनाथ की दैनिक या विशेष पूजाअर्चना भी बाधित हर्ुइ। इन्ही सब कारणों से माओवादी के प्रति जनता में वितृष्णा के भाव पनपने लगे। एमाओवादी पार्टर्ीीी एक विशेषता अवश्य रही है कि जनता को लुभाने के लिए लाँलीपाप बंाटती है। लेकिन माओवादी का हवाई किला कभी नहीं बन सका।

कतिपय आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक नीति द्वारा अपने शासनकाल में स्पष्ट दिशा निर्देश कर ने के बजाय जनता को दिग्भ्रमित करने में पार्टर्ीीयस्त रही। खासकर शिक्षा के क्षेत्र में अवंाछित विरोध एमाओवादी द्वारा बहुत हुआ। निजी विद्यालयों का अपने शासनकाल में उन लागों ने प्रबल विरोध किया। लेकिन सुधार कुछ नहीं कर सके। जनयुद्ध के समय आधुनिक शिक्षा को बर्ुर्जुवा शिक्षा कह कर निम्नमाध्यमिक तथा माध्यमिक विद्यालयों में लागू की गई नैतिक तथा संस्कृत शिक्षा का प्रबल विरोध किया गया। जनयुद्ध के समय तो कही कही माँ-बाप के श्राद्ध तक रोक दिए गए। इससे लगता है कि एमाओवादी की सांस्कृतिक तथा शिक्षा नीति अस्पष्ट एवं नाकारा है। इसके अतिरिक्त एमाओवादी की पर ाजय का दूसरा प्रमुख कारण है, पार्टर्ीी अर्न्तर्कलह। जिसके कारण मोहन वैद्य के साथ चालिस-पैतालिस प्रतिशत कार्यकर्ता निकल कर एक दूसरी पार्टर्ीीना डाली। फलस्वरूप एमाओवादी की प्रबल शक्ति दो भागों में विभाजित हो गई।

चुनाव की तिथि तय होने के साथ ही वैद्य पक्ष द्वारा चुनाव बहिष्कार करने का निश्चय करने के साथ ही प्रचण्ड पक्षीय पार्टर्ीीौर स्वयं प्रचण्ड को हराकर सबक सिखाने की रणनीति अपनाई गई, जिसका प्रतिफल आज देखा जा रहा है। नेपाल में माओवादी विचारधारा के प्रादर्ुभाव के साथ ही सम्भ्रान्त वर्ग को अपमानित करने की रणनीति अपनाई गई थी, जिससे ब्राहृमण-क्षत्रीय समुदायों के ऊपर विविध आरोप-प्रत्यारोप लगा कर अपमानित करने के प्रयास किए गए। सम्भ्रान्त वर्ग ने एमाओवादी पार्टर्ीीे प्रतिशोध लेने के लिए मतदान में अपना ब्राहृमस्त्र उस पार्टर्ीीो नकार कर चलाया गया। दूसरी, संविधानसभा में अपनाई गई मतदाता नामावली दर्ता प्रक्रिया तथा फोटो सहित परिचयपत्र वाली पारदर्शी प्रक्रिया भी एमाओवादी की हार में मूलभूत कारण दिखाई देता है, साथ ही इस बार के चुनाव में मतदान करने वाले योग्य व्यक्तियों का नाम मतदाता नामावली में समाविष्ट नहीं हो पाया । जिससे बहुत सारे लोग मतदान करने से ही बंचित र ह गए, जिसका दुष्परिणाम एमाओवादी पार्टर्ीीथा इसके नेताओं की हार के रूप में देखा जा सकता है।

एमाओवादी ने अपने उत्थानकाल से ही अपने नारों में धार्मिक, भाषिक, वर्गीय, जातीय, क्षेत्रीय तथा अल्पसंख्यक समुदायों के लाभ तथा उसके उत्थान की बात करने में ही समय गंवाया। आर्थिक, शैक्षिक, सांस् कृतिक तथा पारम्परिक मध्यम वर्गीय एवं उच्च वर्गीय समुदाय के प्रति उपेक्षा भाव के कारण भी एमाओवादी को चुनावी संग्राम में मंुहकी खानी पडÞी है। इस प्रकार देखा जाय तो चुनावी संग्राम में हरेक पार्टर्ीीो यह विचार करना होगा कि हरेक मतदाता हमारा भविष्य निर्धारक है। किसी भी वर्ग, लिंग, क्षेत्र, जाति, समुदाय की उपेक्षा करके चुनाव नहीं जीता जा सकता है। चुनाव निर्वाचन परिणाम आने के बाद सभी दलों को चाहिए कि भावी संविधान निर्माण में नेपाली जनता की आकांक्षा को कदर कर ते हुए यथा समय संविधान निर्माण प्रक्रिया को साकार रूप प्रदान किया जाए, जिस में सब पक्षों, विचारों, समुदायों और क्षेत्रों की सहभागिता आवश्यक है।

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