एमाले की राष्ट्रवादिता और पूर्व राजा की तत्परता कई अंदेशों को जन्म देती है : श्वेता दीप्ति

कल तक पूर्वराजा सिर्फ पर्वत्योहारों पर शुभकामना देते हेए दिखाई देते थे आज प्रेसविज्ञप्ति निकाल कर राष्ट्र को कमजोर करने और राष्ट्रीय गौरव को मिटाने की साजिश का दावा कर अपनी चिन्ता व्यक्त कर रहे हैं । किन्तु इनकी यह भावना पिछले मधेश आन्दोलन के समय क्यों नहीं दिखी जब मधेशी भेड़ बकरियों की तरह मारे जा रहे थे ? क्या उस वक्त सद्भाव खतरे में नहीं था ? क्या वो मरने वाले नेपाली नहीं थे ? तभी इनकी ओर से प्रेसविज्ञप्ति क्यों जारी नहीं हुई थी ? चलो मान लिया जाय कि देर से ही सही उन्हें नेपाल और नेपालियों की चिन्ता हो रही है ।
राप्रपा का एकीकरण, पूर्व राजा की सजगता  अभी अभी जन्म लिए लोकतंत्र÷गणतंत्र के लिए कई सवाल खड़ा कर रहा है । कहावत है दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा होता है यह हमारे नेताओ को समझना होगा । क्योंकि एक ओर एमाले की राष्ट्रवादिता और दूसरी ओर पूर्व राजा की अचानक की तत्परता कई अंदेशों को जन्म दे रही है । एकतरफा शासन और खसवादी सोच से प्रभावित पक्ष अपनी पूर्व स्थिति में ही देश पर शासन करना चाह रहे हैं ।
श्वेता दीप्ति, काठमांडू , २३ दिसिम्बर | कहते हैं इतिहास अपने आपको दुहराता है । बस वक्त के अनुसार पात्र बदल जाते हैं । किन्तु नेपाल  के सन्दर्भ में यह बात थोड़ी अलग है । क्योंकि यहाँ इतिहास अभी इतिहास के पन्नों में नहीं सिमटा है । अभी न तो सदियाँ ग’जरी हैं और न ही पीढि़याँ । इतिहास बनने बाली घटना अब भी यहाँ के सर्वसाधारण के दिलों में और उनके मस्तिष्क में जिन्दा है । चाहे वो दरबार कांड के बाद का परिदृश्य हो, जन आन्दोलन हो या फिर राजतंत्र को विदा करने की लड़ाई हो । इन तीन घटनाओं को याद करने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटने की आवश्यकता अब तक नहीं पड़ी है क्योंकि, इन तीनों से सम्बद्ध अधिकांश पात्र हमारे सामने हैं । बस इन घटनाओं से प्राप्त उपलब्धियों की परिभाषा बदलती जा रही है ।
king-amale
देश में अब तक जितने भी परिवर्तन हुए उसमें मधेश की समान भूमिका रही है । देश पर जान गँवाने वाले मधेश की मिट्टी के भी थे । किन्तु आज जब उसी मधेश को अधिकार देने की बात सामने आ रही है तो अचानक राष्ट्रवाद, विखण्डन और राष्ट्रीय गौरव ये तीनों शब्द शिद्दत के साथ देशप्रेमियों को याद आने लगे हैं । हालात यह है कि जिस राजतंत्र को हटाने लिए देश की समस्त जनता ने अपनी जान लगा दी थी आज वही दो टुकड़ों में बँट गए हैं और एक बार फिर उनकी सोच पर राजतंत्र हावी हो रही है । आज देश के उसी अहम हिस्से की, जो वर्षों से विभेद का शिकार रही चाहे वो राजतंत्र हो, पंचायत शासन हो या लोकतंत्र,  जुवान खुल गई है । इसलिए मधेशी समुदाय नजरों को खटकने लग गई है । कल तो उसकी आवाज देश के अन्य समदाय के साथ थी तो राष्ट्रवाद खतरे में नहीं था । किन्तु, आज जब उसकी आवाज खुद उसके अस्तित्व के लिए निकल रही है तो सभी राष्ट्रचिन्तकों को देश का अस्तित्व खतरे में दिखाई देने लगा है ।
यह भी देखें  
कल तक पूर्वराजा सिर्फ पर्वत्योहारों पर शुभकामना देते हेए दिखाई देते थे आज प्रेसविज्ञप्ति निकाल कर राष्ट्र को कमजोर करने और राष्ट्रीय गौरव को मिटाने की साजिश का दावा कर अपनी चिन्ता व्यक्त कर रहे हैं । संविधान संशोधन की महत्तवपूर्ण समय में उन्हें यह लग रहा है कि राष्ट्रीय एकता और जनता की भावना के ऊपर प्रहार हो रहा है । इतिहास को कलंकित कर स्वार्थ की राजनीति करने वाले से उन्हें परेशान कर रही है । उन्हें लग रहा है कि नेपाल को अस्थिरता और अराजकता की आग जला रही है, नेपाली के बीच आपसी सद्भाव खत्म हो रहा है, तराई, पहाड़ और हिमाल की एकता को तोड़ने का भगीरथ प्रयास किया जा रहा है ।  एक सजग नागरिक के नाते उनकी चिन्ता बिल्कुल जायज है, होनी भी चाहिए क्योंकि वो स्वयं इतिहास और नेपाल दोनों के एक महत्वपूर्ण पात्र के रुप में स्थापित हैं । किन्तु इनकी यह भावना पिछले मधेश आन्दोलन के समय क्यों नहीं दिखी जब मधेशी भेड़ बकरियों की तरह मारे जा रहे थे ? क्या उस वक्त सद्भाव खतरे में नहीं था ? क्या वो मरने वाले नेपाली नहीं थे ? तभी इनकी ओर से प्रेसविज्ञप्ति क्यों जारी नहीं हुई थी ? चलो मान लिया जाय कि देर से ही सही उन्हें नेपाल और नेपालियों की चिन्ता हो रही है । किन्तु यह चिन्ता पूर्व राजा के रूप में क्यों ? देश की चिन्ता उन्हें देश की खुली राजनीति में नेता के रूप में क्यों नहीं ला पा रही ? राजतंत्र और राजा का तमगा उतार कर वो जनता के नेता के क्यों नहीं बन पा रहे ? देश के कुछ राजावादी सोच के लोग यह मानते हैं कि राजतंत्र ही विकल्प है । किन्तु राजतंत्र ही देश का भला कर सकता है यह नारा क्या आज के सन्दर्भ में समयोचित है ? अगर पूर्व राजा का नेतृत्व ही देश का कल्याण कर सकती है तो उन्हें सर्वप्रिय नेता के रूप में क्यों नहीं आना चाहिए ? नेपाल की कुछ जनता का समर्थन उन्हें आज भी प्राप्त है । आज राजतंत्र वापस लाकर क्या कल हमें पूर्व युवराज पारस को राजा के रूप में स्वीकारना होगा ? आवश्यकता तो इस बात की है कि उन्हें राजतंत्र और राजा के रूप में नहीं बल्कि लोकतंत्र के नायक के रूप में जनता का नेतृत्व करना चाहिए ।
किन्तु आज अगर विदेशियों की साजिश का डर दिख रहा है तो उनका  सिंगापुर की यात्रा के बाद इस तरह सामने आना क्या माना जाएगा ? राप्रपा का एकीकरण, पूर्व राजा की सजगता  अभी अभी जन्म लिए लोकतंत्र÷गणतंत्र के लिए कई सवाल खड़ा कर रहा है । कहावत है दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा होता है यह हमारे नेताओ को समझना होगा । क्योंकि एक ओर एमाले की राष्ट्रवादिता और दूसरी ओर पूर्व राजा की अचानक की तत्परता कई अंदेशों को जन्म दे रही है । एकतरफा शासन और खसवादी सोच से प्रभावित पक्ष अपनी पूर्व स्थिति में ही देश पर शासन करना चाह रहे हैं । उन्हें समावेशी या संघीयता का मसला रास नहीं आ रहा और यही वजह है कि बेवजह का डर दिखाकर, राष्ट्रवादी सोच को हवा देकर और विखण्डन का हौव्वा खड़ा कर देश को सदियों से चली आ रही सोच के साथ ही चलाना चाह रहे हैं । यह सोच निःसन्देह घातक सिद्ध हो सकती है । आज भी यहाँ मधेश को स्वीकार नहीं करने वाले पक्ष हैं उनके अनुसार न मधेश है और न ही मधेशी । सरकार, मधेशी पार्टियाँ इन सबके विरुद्ध जनता को खड़ा करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है और आश्चर्य तो यह है कि यही वो लोग हैं जो खुद विखण्डन को न्योता देकर सरकार और मधेश पर इसका आरोप लगा रहे हैं । इनकी यह सोच देश को एक भयावह राह पर धकेल चुकी है जिसका परिणाम देशहित में कभी नहीं हो सकता ।
 

 

Loading...

Leave a Reply

1 Comment on "एमाले की राष्ट्रवादिता और पूर्व राजा की तत्परता कई अंदेशों को जन्म देती है : श्वेता दीप्ति"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
wpDiscuz
%d bloggers like this: