एमाले, माओवादी, नयाँ शक्ति के बीच एकिकरण है या बृहत ब्राह्मण एकता सम्मेलन ? अमरदीप मोक्तान

फोटो साभार अ.पो.

अमरदीप मोक्तान, डाडा खर्क ,दोलखा |  काठमाडौँ १७ गते मंगलबार २०७४ को साँम ५ बजे काठमाडौ स्थित खचाखच भरे हुए राष्ट्रिय सभागृह हल मे एमाले ,माओवादी केन्द्र और नया शक्ति पार्टी बीच बृहद बाम एकता की अवधारणा को मुर्त रुप देते हुए तीन पार्टी बीच एकीकरण हुआ है । नेपाल मे स्थिरता विकाश शान्ति सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए नया और बृहद विचार अंगिकार राजनैतिक शक्ति की अत्यन्त आवस्यकता महसूस किये गए समय मे तीन पार्टी बीच एकीकरण पश्चात नेपाली राजनीति के विशालकाय शक्ति की एकजुटता से सर्व हितचिन्तक राजनीतिक पार्टी को जन्म होना उदय होना एकजुट होना सकारात्मक बात है | लेकिन दुर्भाग्य क्या है कि अपने मात्री मातृ दल / पार्टी बीच चर्चा परिचर्चा मन्थन चिन्तन बगैर तिन पार्टी के शिर्सस्थ ब्राह्मण बाहुल्य नेता की चौकड़ी द्वारा लोकमान सिंह कार्की विरुद्ध अविश्वाश प्रस्ताव दर्ता कराते समय अवलम्बन सर्जिकल स्ट्राईक की तरह अचानक तीन पार्टी की एकीकरण घोषणा होना उल्लेखित पार्टी के निरंकुशता को उजागर करने के साथ इस एकीकरण से राष्ट्र के भविस्य मे अच्छे परिणाम प्राप्ति की आशा करना बेमानी होगी और यह अप्राकृतिक एकीकरण के प्रति हमेशा सन्देह बना रहेगा ।

तीन पार्टी एकीकरण कार्यक्रम मे सर्वप्रथम बोलने का अवसर पानेवाले नयाँ शक्ति पार्टी के संयोजक डा. बाबुराम भट्टराई ने बिभिन्न पार्टी बिच की एकता को एतिहासिक आवश्यकता की संज्ञा देना हास्यास्पद है । उन्होने इतिहास के कालखण्ड मे एक पुस्ता द्वारा भूगोल का एकीकरण और दुसरे पुस्त द्वारा लोकतन्त्र स्थापना किया गया और अब आने वाले पुस्ता द्वारा प्रगतिशील समुन्नत समाजवाद की ओर देशको ले जाने पर बल दिया । माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड ने एकता ऐतिहासिक आवश्यतकता अनुशार निर्देशित होना कहा । तीन दलबिच की सहमती घोषणा सभा मे बोलते हुए माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड ने एकबद्ध कम्युनिष्ट पार्टी निर्माण के लिए निरन्तरता मे क्रमभंग की संज्ञा दी । ‘राजनीति कुछ हद तक संभावनाओं का खेल है , राजनीति मे सम्भव नही दिखने वाली बात भी सम्भव होते है तो कतिपय संभव दिखने वाले बात भी असम्भव हो जाते है और । हर्ष कि बात यह है कि नेपाली जनता प्र्त्यक्ष रुप मे देख रही है आज असम्भव बात सम्भव हो रहा है । एमाले अध्यक्ष केपी ओली ने कम्युनिष्ट दलबीच की एकता राष्ट्रियता, अखण्डता को उपर उठाने के उद्देश्य के लिए किया गया है और इस एकीकरण से राष्ट्र को एकजुट बनाने का उद्घोष किया । केपी ओली ने कहाँ अबकी राजनैतिक यात्रा सत्ता न होकर राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि देश मे सुशासन, सदाचार, भौगोलिक एकता कायम कराते हुए इन्द्रधनुषी राष्ट्रिय एकता कायम करने पर बल दिया ।

एमाले माओवादी नया शक्ति पार्टी बीच राष्ट्रिय हित के लिए एकता एवं सहमति मे हस्ताक्षर करने की बात कही गई | लेकिन कटु सत्य यह है कि उल्लेखित कार्यक्रम ने सम्पूर्ण नेपाल को बिल्कुल प्रतिनिधित्व नही किया था । संबिधान के मूल मर्म समावेशी समानुपातिक शब्द पर क्रुर रुप से किया गया प्रहार स्पस्ट रुप मे दिख रह था । यधपि तिन पार्टी बीच के एकीकरण को बृहद बाम एकता की संज्ञा दी गई लेकिन उल्लेखित कार्यक्रम का परिद्रिस्य विशुद्ध ब्राह्मण राजनैतिक एकता सम्मेलन जैस आभाष हो रहा था यह कहने में कोई अतिसियोक्ति नही होगी । तीन पार्टी के वरिष्ट नेताओ ने सम्बोधन के क्रम मे आदिवाशी जनजाती मधेसी दलित साभी वर्गो के साझा हित करने की उद्घोष की |  लेकिन मंच के अग्रपंक्ति मे दाहिने क्रम से क्रमशः कृष्णबहादुर महरा, रामबहादुर थापा, नारायणकाजी श्रेष्ठ, बाबुराम भट्टराई, केपी शर्मा ओली प्रचण्ड, माधव कुमार नेपाल, वामदेव गौतम, झलनाथ खनाल और भीम गौतम विराजमान के दृश्य ने आगामी दिन की राजनीतक परिद्रिस्य का पूर्वानुमान स्पस्ट हो गया । तीन पार्टी एकीकरण के कार्यक्रम का संचालक एमाले के नेता विष्णु पौडेल कर रहे थे और एकीकरण दस्तावेज वाचन करने का कार्य माओवादी नेता जनार्दन शर्मा प्रभाकर ने किया । एकीकरण कार्यक्रम मे आदिवासी, जनजाती, मधेशी दलित को हस्ताक्षर ,दस्तावेज वाचन ,कार्यर्क्रम संचालन एवं सम्बोधन करने से वन्चित् कर उक्त कार्यक्रम ने भविष्य के राजनैतिक संकेत एवं घोर निरंकुशतन्त्र के स्मरण को जिवन्त कर दिया ।

एमाले माओवादी नया शक्ति की एकीकरण पहाडी ब्राह्मण मात्र की एकता न होकर इसका विस्तार तराई मधेश मे भी देखा गया और इस् बात की पुस्टि एमाले माओवादी पार्टी ने राज्य तन्त्र मे पहाडी ब्राह्मण बर्चस्व स्थापित किया मधेशी को दास बनाया , मधेश को उपनिवेश बनाया कह कर हमेशा जी भर कर गाली देने वाले राजपा के वरिष्ठ नेता हृदयेश त्रिपाठी सहित विके गुप्ता, पशुपतिदयाल मिश्र, ईश्वरदयाल मिश्र और जगदीश शुक्ला सहित बहुसंख्यक मधेशी ब्राह्मण ने सुर्य चिन्ह लेकर चुनाव लड्ने की घोषणा मे हस्ताक्षर कर एमाले , माओवादी , नया शक्ति का एकीकरण बृहद बाम एवं राष्ट्रभक्त शक्ति की एकता न होकर आगामी दिन मे हिमाल पहाड तराई में होनेवाले चुनाव पश्चात अपने निहित स्वार्थ सिद्धि एवं राजनीतक भागबन्डा के निमित्त समग्र ब्राह्मण बीच एकता प्रतित होती है ।

निसन्देह नेपाल के विकाश समृद्धि के लिए राष्ट्रभक्त शक्ति की एकता अति आवस्यकता के रुप मे महसूस की गई है और तीन पार्टी एकीकरण के संदेश को सकारात्मक रुप में लिया जा सकता है और लेना भी चाहिए लेकिन नेपाली जनता ने बारम्बार छ्द्म्वेशी नेता द्वारा धोका देने के कारण यह एकीकरण भी सन्देह के दायरा मे आ गया है । बिपी कोइराला के आव्हान मे शसस्त्र क्रान्ति मे संलग्न और सहादत देने वाले नेपाली ने क्या प्राप्त किया ?। ,४६ /४७ के जन आन्दोलन में जान गवाने वाले अंगभंग होकर अपाहिज जिन्दगी जीने को बाध्य लोगो ने क्या प्राप्त किया ? माओवादी आव्हान मे किए गए जनयुद्ध जान की आहुति देनेवाले १७ हजार होनहार नेपाली की सहादत से राष्ट्र ने क्या प्राप्त किया ? नेपाली जनता का बलिदान से राष्ट्र मे सुख समृद्धि तो नही आई लेकिन राणा शाह की तरह परिवर्तन के प्रत्येक कालखण्ड मे जंग बहादुर के तरह नया वंश का अवस्य उदय हुआ है उदाहरण स्वरूप काँग्रेस पार्टी मे कोइराला , देउवा , केसी , महत वंश , एमाले मे खनाल , ओली , पोख्रेल, नेपाल वंश उसी प्रकार माओवादी मे दाहाल और भट्टराई वंश का उदय हुआ है ।

एमाले माओवादी नया शक्ति पार्टी बीच एकीकरण की सफलता और असफलता चाल और चरित्र पर निर्भर होगा । नेताओ के बहुरुपिया चरित्र ,भाषण और नीति नियम कि बातो से नेपाली जनता उकता चुकी है नेपाली जनता बहुत ज्यादा दुख पिडा भोग चुकी है देख चुकी है । अब उप्रान्त नेताओ द्वारा राष्ट्र को सही पथ मे मार्गदर्शन एवं सफल होने के लिए मस्तिस्क मे विशालकाय महल जैसा स्थान बनाकर बैठे हुए पुरातनवादी निरङ्कुश चिन्तन रुपी विष बृक्ष को हमेशा के लिए जड से उखाड फेकना होगा । तीन पार्टी के एकीकरण के प्रारम्भिक चरण मे ब्राह्मण एकता सम्मेलन जैसा दृश्य की पुनरावृति पर अंकुश लगना होगा । समुन्नत नेपाल निर्माण के निमित्त सम्पूर्ण नेपाल प्रतिबिम्बित संरचना वर्तमान समय आवस्यकता है । एकीकृत पार्टी भविस्य मे नेपाल राष्ट्र के लिए अति आवस्यक ज्वलन्त विषय बारे चिन्तन मनन एवं कार्यवनयन कृति है या नही नेपाली जनता उत्सुकता पुर्वक प्रतिक्षारत रहेगी ?

अमरदीप मोक्तान

 

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