एशिया के पांच महत्वपूर्ण घटना में मधेश आंदोलन

मुरलीमनोहर तिवारी, बीरगंज ,११ जनवरी |

२०१५ में एशिया के पांच महत्वपूर्ण घटना में मधेश आंदोलन को रखा गया है। उसी आंदोलन के शीर्ष नेता राजेन्द्र महतो पर हमला हुआ। ये मधेश के आन-बान-शान पर हमला है। ये सरकार की घृणित सोच को नंगा करने वाली घटना है। इस पर क्षमा मांगने के वजाय गृहमंत्री का गुमराह करने वाला वक्तव्य लज्जास्पद है। इस पर भी बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां एस.पी. का वयान आया की राजेन्द्र महतो दाल-भात खा रहे है। ये निर्लज्जता की हद है।

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कुछ बाते सोचने पर मज़बूर करती है। ये हमला जोगबनी नाका पर क्यों हुआ ? बिरगंज में क्यों नहीं हुआ ? बिरगंज में राजेंद्र महतो रोजाना नाका पर बैठते थे। बिरगंज में हमारी आबादी ज्यादा है, इसलिए प्रशासन को ऐसी हिम्मत नहीं हुई। दूसरे बिरगंज नाका बंद होने के बाद सारा दारोमदार जोगबनी नाका पर है, इसलिए सरकार ने ऐसी चाल चली, की ये बंद ना हो पाएं। अब ये चुनौती आंदोलनकारी की है, की किसी भी तरीके से जोगबनी नाका ठप्प किया जाए।

आंदोलन पांच महीने पूरा करने की तरफ बढ़ रहा है। परन्तु सफलता की कोई किरण नजर नहीं आती। ओली सरकार राजेंद्र महतो को दण्डित करना चाहती थी, उसने अपना गुस्सा निकाला। गुस्सा ही निकालना था, तो मार ही देतें, इस बुजदिल सरकार को मार देने का साहस भी नहीं हुआ। अगर वे शहीद हो जाते तो लाला लाजपत राय की पूर्णाबृति हो जाती। जो नेपाल को उखाड़ फेकने वाला अंतिम क़दम साबित होता।

सरकार को दमन करना है, करेगी ही, जबाब आंदोलनकारी को देना है। पर ये कैसा जबाब हुआ की जहां इस घटना के खिलाफ मधेश में आग लग जाना चाहिए था, जहां आंदोलन के शीर्ष नेता को लक्ष्य बना कर रोजाना जोगबनी नाका पर बैठना चाहिए था, वही ये नेता घायल राजेन्द्र महतो को देखने तक नहीं गए। देखना तो दूर फ़ोन करने का ज़हमत तक नहीं किए। एकमात्र तमरा अभियान ने तत्क्षण इसकी निंदा की।

इसका बिरोध करने के उलट उपेन्द्र यादव ने इसे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का हथकंडा करार दिया। गौरतलब है की जोगबनी नाका उपेन्द्र यादव के जिम्मे था, वहा वे कुछ भी उल्लेखनीय नहीं कर पाएं। अपनी कमजोरी छुपाते हुए बिना इजाजत जोगबनी नाका पर जाने के लिए राजेन्द्र महतो का आलोचना भी किए। क्या इनके और सरकारी वक्तव्य में कोई फर्क दिखता है ?

विचारणीय है की राजेन्द्र महतो का कद बढ़ने का अर्थ है, उपेन्द्र यादव का कद घटना। दोनों एक दूसरे के टांग खिंचाई में लगे है। दोनों में जो जीतेगा महंथ ठाकुर से भिड़ेगा। पहले ही काला झंडा के नाम पर नक्कली एकता दिखाकर दूसरे मधेशी दल के पहचान को रोका गया, लेकिन एकता नहीं हुआ, फलस्वरूप अलग-अलग आंदोलन हो रहा है। सद्भावना ने आंदोलन का एकलौती कार्यक्रम जारी किया। अब तो अलग देश का कार्यक्रम भी शुरू हो चूका है।




जहा अभी मधेश में पहाड़ी दल बहिष्कृत है, वही नया शक्ति के नाम पर घुसपैठ की कोशिश हो रही है। बाबुराम भट्टराई संविधान सभा में मधेश के लिए कुछ नहीं किए, ना ही मधेश के समर्थन में पहाड़ में समर्थन जुटाने का कार्य किया, बस आंदोलन के बहती गंगा में अपनी नौका पार लगाना चाहते है। नेपाल में कुछ भी नया नहीं होता इस कारण “नया” शब्द बहुत आकर्षित करता है। “नया नेपाल”, “नया संविधान”, “नया शक्ति”। सबकी अपनी- अपनी डफली अपना अपना राग, अब सोचिए क्या ये आंदोलन है ?

एक सामान्य सी बात है अगर एक कट्ठा खेत जोतना हो तो ट्रेक्टर से १५ मिनट, बैल से एक घंटा, कुदाल से एक दिन और खुरपी से तिन दिन लगेगा। ये आंदोलन खुरपी से हो रहा है। अगर किसी रोग को ठीक करने में पांच महीना लगे फिर भी रोग ठीक ना हो तो कमी डॉक्टर में है। पंद्रह दिन में सफल होने वाला आंदोलन पांच महीना में सफल नहीं हुआ, इसका अर्थ है कमी इनमें है, शीर्ष नेता ही आंदोलन के कमजोर कड़ी है। यहाँ आंदोलन नहीं राजनीती हो रही है। इन्हें बदलो फिर मधेश बदलेगा और आंदोलन सफल होगा।
जय मधेश।।

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