Sun. Sep 23rd, 2018

ऐतिहासिक तथ्य को गलत व्याख्यान करतें हैं डा. सी. के. राउत : डी. के. सिंह

बारा, जून ३, २०१८ । स्वतंत्र मधेस गठबंधन के संस्थापक-संयोजक डा सी के राउत ने सामाजिक संजाल के फेसबुक पेज पर ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर रख रहे हैं। खुद को मधेस का मसीहा सिद्ध करने के क्रम में यहाँ की अधिकांश अनपढ और पिछड़े लोगों के बीच कूतथ्यों एवं कुतर्कों के आधार पर प्राचीन भाषा, साहित्य, इतिहास, परम्परा से जुड़े तथ्यों को जातीयता से जोड़कर गलत ढंग से रखने का कार्य राउत द्वारा किया जा रहा है। ये बातें मधेस विषय पर निरन्तर शोधकार्य एवं सामाजिक-राजनीतिक अभियान चला रहे डी. के. सिंह द्वारा सप्रमाण तथ्य रखते हुए कहा गया।
डा. सी. के. राउत द्वारा किये गये बयानबाजी का सबूत
कुछ दिनों पहले डा सी के राउत अपने फेसबुक पेज से तिरहुता लिपि की प्राचीनता पर अपनी विद्वता का शिकार बनाते हुए इसे बंगाली लिपि को तोड़-मरोड़कर बनाने की बातें कही थी।
डी. के. सिंह सप्रमाण राउत की दाबी को खारिज करते हुए कहतें है कि, ” 1992 ई. में बारा जिला की ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक नगरी सिम्रौनगढ में उत्खनन से प्राप्त एक शिलालेख के अध्ययन में एक स्थानीय शिक्षक के सहयोग से इटालिन पुरातत्वविद् मैसिमो विडा द्वारा अध्ययन से इस बातका खोज हुआ है कि इस शिलालेख में उद्धृत लिपि तिरहुताक्षर है। इस शिलालेख का टुकड़ा जिसकी लम्बाई -16 से.मि. और चौड़ाई 12.3 से.मि. है, इसके बारे में नेपाल पुरातात्त्विक विभाग की पत्रिका “Ancient Nepal” 1993 ई. के अक्टुबर/नवम्बर अंक में A Fragmentary Inscription From Simraungarh, The Ancient Maithila Capital शीर्षक अन्तर्गत प्रकाशित की गई है। इसमें केवल 7 लाइन खण्डित रुप में मिला था, जो कि चारों तरफ से अपुर्ण थी।”
पुनः 2018 मई 15 तारीख के दिन बारा जिला निवासी अभियानी डी. के. सिंह सहित सहयोगीजन भरत साह, उमेस कुशवाहा लगायत सिम्रौनगढ नगरपालिका मेयर बिजय शंकर   यादव लगायत वडा अध्यक्ष लोग और अन्य  मिलकर ग्रामीणों की उपस्थिति में नगरपालिका के जेसीवी से उत्खन्न करने के क्रम में दूसरा एक और खण्डित शिलालेख का टुकड़ा मिला, जिसकी लम्बाई 29.5 से. मि. और चौड़ाई 15 से. मि. है उसके अलावे  एक शिवलिङ्ग भि मिला है। उसी क्षेत्र में यह सारी प्रमाण मिलने के बाद भी ऐतिहासिक तथ्यों की अस्तित्व को मिटाने की मनसा से झूठे अभिव्यक्ति देते डा. राउत मधेसी जनता को गुमराह करते रहने का आरोप उन्होंने लगाया।
इससे पहले भी राउत ने फेसबुक पेज पर लिखे कई पोस्टों में प्रदेश २ के लोगों की भाषा मैथिली तथा नामकरण मिथिला से मधेस की भाषा, नाम, पहिचान आदि समाप्त होने का निराधार आशंका का प्रसार करते मैथिलीभाषी पर दरभंगिया, मनुवादी, मिथिला पाग दूसरों पर जबरदस्ती लादने की कई सारे कूतथ्यों सहित मैथिली भाषा २-३% ब्राह्मण-कायस्थ-भुमिहार-राजपुतादि आदि ऊँचे वर्गों की भाषा मात्र रहने की बात प्रसार करते मधेसी समुदाय के लोगों के बीच एक विभाजनकारी षड्यन्त्र सी के राउत के विचारों से दिखा था। सिंह ने राउत की मानसिकता पर सवाल खड़ा करते कहा है कि उन्होंने जान-बुझकर ऐसे शब्दों प्रयोग कर मधेसी युवाओं को जातिवादिता की गड्ढे में धकेल रहे हैं जिसके कारण सोशल मीडिया में मैथिली या मिथिला-तिरहुत आदिकी बातें करनेवालों को कई तरह के उपनामों से ट्रोल करने का कार्य कर आपसी एकता खंडित किया जा रहा है।
जबकि एक समय स्वयं मिथिला से होने की और मातृभाषा मैथिली होनेकी बात अपने पुस्तक में लिखकर स्वीकार करनेवाले डा. सी. के. राउत खुद हैं, फिर कौन से कारण से अपने ही कही बातों से अब वो पीछे हँट रहे हैं – यह खुद में ही एक बड़ा सवाल है और दुर्भाग्यपूर्ण भी है। बार-बार अपने पोस्टों से जातीय सद्भावना बिगाड़ने के लिये २-३% लोगों को छोड़कर आगे जाने की बातें करते हैं जिसमें ब्राह्मण, भुमिहार, कायस्थ, राजपुत आदि पड़ते हैं।
सिंह सीधा सवाल पूछते हुए राउत से जिज्ञासा रखतें हैं कि क्या प्रमाण है आपके पास जो तिरहुता लिपि बंगाली लिपि को तोड़-मरोड़कर बनाया गया है ? आप अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु मधेसी समुदाय के बीच क्यों जातीय द्वेष प्रसार करने का कार्य कर रहे हैं ? क्या आपका मिशन पूरा करने का यही रुतबा रहेगा ? आपकी बातों को आँख मुंदकर मान लेते हैं उसे सिर्फ अपनी संगठन में स्थान देते हैं बाकी पर विभिन्न आरोप लगाकर चरित्र हत्या करनेवाला हत्यारा भी बनते हैं। यदि नहीं तो सभीको एकजुट रखने के लिये, सभी का कल्याण हो इसके लिये आपके पास क्या योजना है ? ऐसे कई बड़े और महत्वपूर्ण प्रश्न सिंह द्वारा राउत के सम्बन्ध में उठाया गया है।
डि. के. सिंह सम्पुर्ण मधेसी जनता से आह्वान करते कहते हैं कि समय पर डा सि के राउत के कुविचार और  मधेसी समुदाय एक आपस में विभाजन का षड्यन्त्र सभी लोग समझें और अपनी मूल्य, विरासत, इतिहास के साथ किसी प्रकार का दुर्भावना किसी में झूठे तथ्यों के सहारे नहीं पनपने दें। अपने दिमाग और विवेक से काम लेना सही रहेगा क्योंकि राज्य के विभेद में पड़कर समस्त मधेसी नेपाल में पिछड़ चुके हैं, मधेस की समग्रता २५० वर्ष का दमन, शोषण और विभेद का विरोध से है। एक तरफ संविधान में असमान अधिकार हेतु संघर्ष और दूसरी ओर अपनों में जातियता के आधार पर अन्तर्विभाजन का षड्यन्त्र, आखिर यह क्या संकेत करता है ! इसपर सभी लोग गंभीरता से मनन करें। डा. सी. के. राउत मधेस की स्वतंत्रता का नारा देते हैं अधिकार संपन्नता के लिये बात करते , लेकिन झगड़ा लगाते हैं जाति-पाति के नामपर; इससे उनकी विद्रुप मानसिकता जगजाहिर हो चुका है।
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