ऐतिहासिक भूलों का परिणाम

कैलास दास:२०६४ साल के संविधान सभा चुनाव में मधेशी दलों ने प्रत्यक्ष में ४३ और समानुपातिक मंे ४० सीट प्राप्त कर के नेतृत्व का मौका पाया था। वहीं ०७० के संविधान सभा चुनाव में प्रत्यक्ष में केवल १२ और समानुपातिक में ३८ सीट प्राप्त कर लज्जास्पद परिणाम का सामना करना पडÞ र हा है। यह ऐतिहासिक भूलों का परिणाम ही कहा जाएगा। अगले चुनाव में ८३ सीट आया था और इस चुनाव में केवल ५० सीटों में सीमित हो गया। भूल कहां, कब और किस से हर्ुइ भले ही पहले उन्हंे एहसास नहीं हुआ हो परन्तु आज उसका परिणाम उनको सोचने को विवश कर रहा है।

महात्मा गाँधी ने एक तोता पाला था। उसे रोज सिखाते थे कि शिकारी आयेगा, दाना डालेगा, लोभ से उस में फंसना नहीं तोता भी गाँधी की बातो को रट लिया। एक दिन गाँधी जी ने तोते की परीक्षा लेने के लिए उसे पिंजरे से आजाद कर दिया। तोता उडÞ कर जंगल चला गया और एक डÞाल पर बैठ कर गाँधी जी के सिखाए हुए शब्दों को रटने लगा। जब शिकारी ने तोता की बात सुनी तो उसे आर्श्चर्य लगा और वह निराश हो गया। वह सोचने लगा, हम गलत जगह पर आ गए हैं।

आज का दिन हमारा बेकार हो जायेगा। लेकिन उसने अपना कर्तव्य नहीं छोडÞा। पहले जाल बिछाया, फिर दाना डाल कर खुद छिप गया। कुछ ही क्षणो में गाँधी जी का तोता भी उस जाल में आ प+mसा। कहने का मतलव है मधेशी दलों ने भी खसवादी शासकों के विरोध में नारा तो जरूर दिया। किन्तु उन्हीं की सरकार में रहकर गाँधी जी के तोते की तरह वे प+mसते चले गए। उन्हे राजनीतिक विलासिता, लालच और प्रलोभन देकर विभाजित कर दिया गया।

उस समय मधेशवादी दल चौथे स्थान में थे। माओवादी, काँग्रेस और एमाले तीनों में से किसी को सर कार बनाने के लिए मधेशवादी दल को अलग करना सम्भव नहीं था। अन्ततः किसी न किसी प्रकार पाँच वर्षतक मधेशी नेता सरकार में जमे रहे। उस वक्त सरकार गिराना और बनाना आम बात बन गई थी। एमाओवादी की सर कार हो वा एमाल े की, दाने ा ंे न े मधशे ी दला ंे क े साथ वह चाल चली जिसम ंे मधशे वादी दल प+mस कर खुद विभाजित होते गए।

०६४ से ०७० तक एमाले और एमाओवादी की सर कार बनी थी आरै दाने ा े सरकार म ंे मधशे वादी दल के नेतागण किसी न किसी पद पर विर ाजमान रह।े सत्ता म ंे रहकर मधशे क े मद्दु ा ंे का े सम्बोधन किया या नहीं, यह एक अलग बिषय ह,ै परन्त ु खसवादी शासका ंे द्वारा बनु े जाल का एक ही लक्ष्य था मधशे वादी दला ंे का े विभाजित करना। इधर मधेशवादी दलों ने कभी भी महसूस नहीं किया कि हम क्यो विभाजित हो रहें हैं। मन्त्री पद के लिए लालच देना, सांसदों को पैसे देकर अपनी सरकार गठन करना, आनन-फानन में सरकार में रखना, यह सिर्फएक साजिस थी। इसके वावजूद भी इस तरह राज्य सत्ता के बिलासिता में मधेशी नेता डूब गए कि जिस नेतृत्व के लिए वह सत्ता में आये थे, उसके लिए कौन सी कदम चलना चाहिए, वही भूल गए। सत्ताधारी पार्र्टर्ी के गुणगान कर ने लगे और सत्ता से बाहर होते ही मधेश में बन्द हड्ताल, नारेबाजी, तोडÞफोडÞ करना कर वाना उनके लिए आम बात हो गई।

मधशे क े तीन दला ंे पर मधशे ी गवर्  कर ते थे। मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल, तरर् ाई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीौर सद्भावना पार्टर्ी, जब बहमु त स े सरकार म ंे गर्इ  ता े यहा ँ कि जनता को सबसे ज्यादा खुशी हर्ुइ। मधेश आन्दोलन को सफलता बहुत ही जल्द मिलेगी, ऐसा विश्वास होने लगा। किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। ले दे कर वही ढाक के तीन पात। हअु ा य ूं कि ०६४ क े चनु ाव पश्चात ् जब सरकार बनी ता े मधशे म ंे अशान्ति फलैर् गई। किन्तु इसे न्यूनीकरण करने के लिए कोई आवाज मधशे वादी दला ंे न े नही ं उठार्इ। नते ा जब-जब सरकार स े हट े व े मधशे म ंे आकर भू िमगत समहू ा ंे स े बातचीत कर हा-े हल्ला मचाने लगे; यह जानते हुए कि हत्या, हिंसा, लूटपाट, जैसी घटना से मधेशी जनता खुद परशे ान थी।

सत्ताधारी नते ाआ ंे द्वारा बन्द हडताल की पीडÞा और भूमिगत समूह द्वारा हत्या हिंसा की पीडा से मधेश तबाह हो चुका था। इसी भूल को सबसे बडÞी भूल कही जा सकती है। वि.स. २०६३/०६४ में आन्दोलन हुआ जो मधेश के अधिकार के लिये केन्द्रित था। मधेश के अधिकार की लडर्Þाई है और हम लडेगें, ऐसा जुनून मधेश आन्दोलन में अवश्य देखा गया था। सच्चाई भी यही थी। इसी आन्दोलन से मधेशी जनअधिकार फोर म नेपाल का उदय हुआ। उसके बाद तर्राई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी आई। नेपाल सद् भावना पार्टर्ीीो मधेश की प्रथम पार्टर्ीीोने के नाते पहले से ही मौजूद थी।

madheshi-janta_hindi-magazine madheshi leadersमधेश आन्दोलन के मुद्दों को गम्भीरता से न लेने का परिणाम अभी दिख रहा है। जितना वक्त आरोप(प्रत्यारोप और विभाजित होने में लगाया है, उससे बहुत कम समय और श्रम संगठित होकर चलने में लगाया गया होता तो आज ये दिन देखने नहीं पडÞते। हरेक व्यक्ति के मुंह में एक ही बात है- मधेशी दल मोर्चाबन्दी और संगठित होकर चलते तो जिस तरह प्रत्यक्ष में घिनौने सीट आए, वह तो नहीं होता। मुद्दा एक है, फिर एक होकर लडÞना क्यों नहीं सीखा – इस चुनाव में छोटे बडÞे सभी को करीब लाखों रूपैये खर्च हुए हैं। लेकिन उपलब्धी रही शून्य। यह क्षति भी हमर ी ही क्षति है। अर्थिक और राजनीतिक हार दोनों क्षति बहुत मायने रखती है। अभी आवश्यकता है- मधेशी नेता जिस किसी भी दल म ंे हा,ंे मधशे ी मद्दु ा ंे का े सम्बाधे न करन े क े लिए अपन े ही पार्टर्ी  म ंे दवाव बनाव।ंे अभी मधशे वादी दल वा पहाडीÞ दल म ंे लडनÞ े लडÞाने की घडÞी नहीं है। अभी तो विकास एवं अधिकार सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

 

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