ऐसा देश है मेरा

कोई भी “टेसन” (स्टेसन) लगाता हँु रेडियो पर उन्हीं के बारे मे समाचार सुनने को मिलता है और यही कारण है कि मैंने आजकल समाचार सुनना कम कर दिया है । पूछने पर मनसुर बेहिचक बोले कि वो अपना बहूमुल्य वोट सूरज छाप यानि की नेकपा एमाले को देते आ रहे है । परंतु अगले चुनाव मे वो पुनर्विचार कर सकते हैं कि अपना मत किस पार्टी को दे ।


कृषि–प्रधान देश नेपाल को “रेमिट्यान्स पर आधारित देश” बनाकर सनिफ मनसुर जैसे कृषक को कब तक निराश कर के आन्दोलित करने की निकृष्ट योजना बनाते रहेंगे काठमाण्डु के अदूरदर्शी कुलीन


रणधीर चौधरी
चाह कर भी राजनीति के बारे में सोचने और लिखने से अलग नही रख पा रहा हुँ अपने आप को । दृढ़ था की अब राजनीतिक बिषयों पर नहीं लिखुंगा । सामाजिक तथा विकास के मुद्दों पर ही अपनी कलम चलाउंगा । इसी क्रम में पिछले महीने अपने घर जलेश्वर नगरपालिका वार्ड नं १६ मे रहने बाले एक कुशल कृषक सनिफ मनसुर से मुलाकात हुई मेरी । जिनकी उम्र ७० बर्ष है । मनसुर की एक अलग पहचान है समाज में । पिछले पचास बर्ष से वे अपने कांधे पे रेडियो लटका कर चलते हैं । कहीं हों उनका रेडियो बंद नही होता । समाचार और चित्रहार के शौकीन मनसुर देश की राजनीति के बारे में भी बारीकी से सोचते रहते है ।
मेरा पहला सवाल था उनसे, क्या आप केपी शर्मा ओली को पहचानते हैं ? उनका जबाब आया, हाँ सुनने में आता है कि नेपाल के प्रधानमंत्री हंै ओली । मैने पूछा । सुनने में आता है ? फिर उन्होंने कहा, जी हाँ । क्योंकि जब से ओली प्रधानमंत्री बने है बहुत ज्यादा चर्चा मे दिख रहे हंै मधेश में । कोई भी “टेसन” (स्टेसन) लगाता हँु रेडियो पर उन्हीं के बारे मे समाचार सुनने को मिलता है और यही कारण है कि मैंने आजकल समाचार सुनना कम कर दिया है । पूछने पर मनसुर बेहिचक बोले कि वो अपना बहूमुल्य वोट सूरज छाप यानि की नेकपा एमाले को देते आ रहे है । परंतु अगले चुनाव मे वो पुनर्विचार कर सकते हैं कि अपना मत किस पार्टी को दे ।
कैसा देश है मेरा ?
मधेश या कहें तो सम्पूर्ण नेपाल के कृषक ज्यादा से ज्यादा अन्न उपजाना चाहते हैं । लाख सिंचाई की व्यवस्था ना होने के बाबजूद भी कृषि के प्रति उन लोगों का आकर्षण बढ़ता दिखाई दे रहा है । वैसे तो हमारे नेतागण भी नेपाल को एक कृषि प्रधान देश कहने मे अपनी शान समझते हैं । प्रति वर्ष बजट मे कृषि के लिये आकर्षक बजट भी विनियोजन किया जाता है । परंतु उस बजट का निवेश कहाँ होता है, अल्लाह जाने ! देश विकास की अन्य जरियाें का हाल भी वैसा ही है । कर्मठ युवा लोगों के लिये सरकार उदार जरुर दिखाई देती है । तभी तो शायद ब्रेनड्रेन (मस्तिष्क पलायन) में सरकार ने विशेष सुविधा की घोषणा की है, वैदेशिक रोजगार मे भिसा टिकट का अनुदान दे कर ।
न जाने कब तक नेपाल मे प्रतिक्रियावादियो का दबदबा बना रहेगा । कब तक खास समुदाय का वर्चस्व हावी रहेगा । सिमांतकृत एवं अल्पसंख्यको को कब तक उनके हक अधिकाराें से वंचित कर रखा जायगा । संविधान निर्माण को महीने हो चुके हैं परंतु उसके कार्यान्वयन के बारे मे सोचने पर डर लगता है । ऐसी हालात में कुछ लोग यह भी कहने लगे हैं कि नेपाल ही एक ऐसा देश है जो बगेर संविधान के चल रहा है और मेरा व्यक्तिगत मानना है कि नेपाल ही एक मात्र ऐसा देश है जिसको कोई भी चला सकता है । नेपाल को जिस पथ पर चलाया जा रहा है शायद इसमे दक्षता की नही बल्कि धुर्तता की आवश्यकता ज्यादा है । अगर आप की पकड़ नेपाल बार एसोसियसन में हो, ब्यूरोक्रेट, पत्रकार और चाकर पुँजीवाद (क्रोनिक केपिटलिष्ट) से है तो आप इस देश को एकलौते ढंग से चला सकते हैं । कोई भ्रम में ना रहे । अभी की ओली सरकार, उपर उल्लेखित गुटो के सहारे चल रही है ।
नेपाल मे कम्यूनिष्टीकरण करना ओली का मकसद पहले से दिखाई दे रहा था । शायद यही कारण हो सकता है कि एक पड़ोसी को चिढा कर जहाँ कि डेमोक्रेटस की सरकार है और दूसरे से रिश्ते को मजबूत करने की रणनीति तय किया गया है जहाँ पर कम्यूनिस्ट की सरकार है । इस सरकार को उपर वाला सदबुद्घि दे और नेपाल को सही राह ।
हम नहीं सुधरने वाले
आज आन्दोलन मधेश की गलियारो से उपर उठ काठमाण्डौ तक पहुँच गया है । सिर्फ मधेशी की आवद्घता रहने बाले आन्दोलन में आज थारु, मुसलमान, जनजाति लगायत का एक मजबूत एलायन्स बन गया है । अन्तर्राष्ट्रीयकरण इस से ज्यादा नहीं हो सकता मधेश का । आन्दोलन के सम्बन्ध में प्रधानमंत्री का बयान कि सड़क पर कैसा तमाशा चल रहा है । ऐसी बयानबाजी ही सनिफ मनसुर जैसे इनोसेन्ट एमाले को प्यार करने वालों के दिल में नफरत पैदा कर रही है । थोड़ी बहुत राहत की साँस ले रहे थ, खेतीपाती में ध्यान केन्द्रित करने के प्रयास मे लगे मधेशियों को फिर से क्रोधित कर रहे है हमारे प्रधानमंत्री अपने उलजुलुल बयानबजी से । सीमांतकृतों को हक ना दे कर सत्ता टिकायी जा सकती है । परंतु अभी के माहोल में उनको हक ना देना वा संविधान से सम्बन्धित मुद्दाें का संबोधन न करना देश को विकास और समृद्धि की दुनिया से अलग रखना होगा ।
देश में राजनीति से अलग हो के जुड़े हुए अलग नागरिक जो पेशा या व्यवसायी के माध्यम से देश विकास में अपना योगदान करना चाहते हैं, वे भी आन्दोलित महसूस करने लगे हैं । आखिर कब तक ऐसा चलेगा ? कृषि–प्रधान देश नेपाल को “रेमिट्यान्स पर आधारित देश” बनाकर सनिफ मनसुर जैसे कृषक को कब तक निराश कर के आन्दोलित करने की निकृष्ट योजना बनाते रहेंगे काठमाण्डु के अदूरदर्शी कुलीन ।

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